
पेप्टिक अल्सर का आयुर्वेदिक उपचार Publish Date : 27/12/2025
पेप्टिक अल्सर का आयुर्वेदिक उपचार
डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा
कभी-कभी पेट में हल्की जलन होना एक सामान्य बात है परन्तु जब जलन बार-बार होने लगे, खाली पेट चुभन महसूस होने लगे या खाना खाते ही सीने के बीच में खिंचाव-सा महसूस हो तो यह साधारण अम्लता नहीं होती। कई लोग इसे बस “खट्टापन” समझकर टाल देते हैं पर भीतर कहीं न कहीं यह चिंता भी बनी रहती है कि आखिर शरीर ऐसा क्यों कर रहा है। पेट अचानक इतना संवेदनशील क्यों महसूस होने लगा। सुबह उठते ही जलन, थोड़ी देर भूखे रहो तो चुभन और रात में सोते समय भी पेट का बेचैन-सा होना— यह सब संकेत हैं कि पेट की कोमल परतें थक चुकी हैं।
आयुर्वेद कहता है कि जब पित्त अपनी सीमा से बाहर बढ़ जाता है तो वह अग्नि को अस्थिर करके पेट की परतों को जला देता है। यह जलन धीरे-धीरे एक सूक्ष्म घाव का रूप ले सकती है जिसे आधुनिक भाषा में पेप्टिक अल्सर कहते हैं। यह कोई अचानक बनने वाली समस्या नहीं है बल्कि शरीर लंबे समय से संकेत दे रहा होता है कि उसका संतुलन टूट चुका है। आज की अपनी इस पोस्ट में हम आपको बताएंगे कि पेप्टिक अल्सर वास्तव में होता क्या है, इसके आधुनिक और आयुर्वेदिक कारण क्या हैं और आप अपने दिन में कौन-से छोटे बदलाव करके पेट को आराम दे सकते हैं।
पेप्टिक अल्सर क्या है?

पेप्टिक अल्सर पेट, भोजन नली या आंत के शुरुआती हिस्से की भीतरी परत पर बना एक छोटा सा घाव होता है। यह घाव अक्सर वहीं बनता है जहाँ अम्लता अधिक होती है। कई बार यह हल्की जलन से शुरू होकर दर्द, चुभन और भारीपन में बदल जाता है। कुछ लोगों को खाना खाने से थोड़ी देर राहत मिलती है जबकि कुछ को भोजन के बाद जलन और भी बढ़ जाती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि घाव किस हिस्से पर है और पित्त कितना उग्र है।
आयुर्वेद में इस स्थिति को पित्त प्रकोप से उत्पन्न विकार माना जाता है। जब पित्त तेज़ हो जाता है तो वह पेट की कोमल परतों को जलाने लगता है। यह जलन धीरे-धीरे घाव का रूप लेती है। इसलिये केवल जलन कम करना ही उपचार नहीं है, मूल कारण यानी पित्त को शांत करना और परतों की मरम्मत करना ज़रूरी है।
पेप्टिक अल्सर क्यों होता है?
आज की भागदौड़ भरी दिनचर्या में पेट सबसे पहले प्रभावित होता है। आप शायद ध्यान भी न दें पर भोजन का समय, नींद की अनियमितता, तनाव और दवाओं का सेवन— सब मिलकर पेट की सुरक्षा परत को कमज़ोर कर देते हैं।
1. खाली पेट चाय या उत्तेजक पेय
खाली पेट ये पेय सीधे पित्त बढ़ाते हैं। पेट की परत इस तीक्ष्णता को सँभाल नहीं पाती और घाव बनने लगते हैं।
2. मसालेदार और तीखे खाद्य पदार्थ
अत्यधिक मसाले पित्त के ताप को और बढ़ाते हैं जिससे पेट की सतह कमजोर होती जाती है।
3. दर्दनाशक दवाओं का बार-बार सेवन
कई दवाएँ पेट की प्राकृतिक सुरक्षा परत को कम करती हैं जिससे अल्सर बनने की संभावना बढ़ जाती है।
4. तनाव और मानसिक दबाव
तनाव सीधे पाचन को प्रभावित करता है। पित्त असंतुलित होने लगता है और पेट की परतों पर प्रभाव पड़ता है।
5. भोजन का अनियमित समय
कभी-कभी बहुत देर से खाना खाना, कभी बहुत जल्दी, कभी भोजन छोड़ देना— यह सब अग्नि को अस्थिर कर देता है।
आयुर्वेद की दृष्टि — पित्त की उग्रता, अग्नि की अस्थिरता और मन का प्रभाव
आयुर्वेद पेप्टिक अल्सर को केवल पेट की बीमारी नहीं मानता। यह पित्त, अग्नि और मन— तीनों के असंतुलन का परिणाम है।
1. पित्त का बढ़ना
पित्त का गुण है तेज़, उष्ण और तीक्ष्ण। जब यह अधिक बढ़ता है तो पेट की सतह को काटने जैसा प्रभाव डालता है। यही स्थिति अल्सर को जन्म देती है।
2. अग्नि का असंतुलन
अग्नि कभी बहुत तेज़ हो जाए या अचानक मंद हो जाए तो भोजन सही से पच नहीं पाता। इस अनियमितता से अम्लता बढ़ती है और परतों पर दबाव पड़ता है।
3. मन का अस्थिर होना
मन में बोझ, चिंता या बेचैनी— यह सब पित्त को और उत्तेजित करते हैं। यही कारण है कि तनाव वाले लोगों में अल्सर तेज़ी से बढ़ता है।
आयुर्वेद कहता है कि जब तक पित्त, अग्नि और मन को संतुलित नहीं किया जाता तब तक अल्सर का उपचार अधूरा ही रहता है।
पेप्टिक अल्सर के लक्षण— शरीर किन संकेतों से आपको चेतावनी देता है
अल्सर धीरे-धीरे बनने वाली समस्या है और शुरू में यह साधारण अम्लता जैसा लग सकता है। कई लोग पेट की हल्की जलन को सामान्य मानकर महीनों बिताते रहते हैं पर शरीर भीतर लगातार संकेत देता रहता है कि उसकी कोमल परतें तनाव में हैं। कभी खाली पेट जलन उठती है, कभी भोजन के तुरंत बाद चुभन महसूस होती है और कभी सीने के मध्य में ऐसा लगता है जैसे कुछ खुरच रहा हो। यह सारी अनुभूतियाँ शरीर का तरीका है यह बताने का कि पित्त अपनी तीव्रता से बाहर जा चुका है।
कुछ लोग बताते हैं कि दर्द स्थिर नहीं रहता बल्कि कभी तेज़ कभी हल्का हो जाता है। कुछ को सुबह पेट खाली होने पर चुभन बढ़ जाती है। कुछ लोगों को रात में सोते समय पेट में खिंचाव जैसा लगता है। इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करना स्थिति को और जटिल बना सकता है।
अल्सर के प्रमुख लक्षण
- खाली पेट जलन।
- भोजन के बाद चुभन।
- सीने के मध्य में खिंचाव।
- खट्टे डकार।
- पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द
- उल्टी जैसा मन होना।
- भूख तो लगना पर खाते ही असहजता बढ़ जाना।
ये लक्षण पेट की भीतरी सतह की संवेदनशीलता और पित्त की उग्रता दोनों की ओर संकेत करते हैं।
पेप्टिक अल्सर के प्रकार

अल्सर जहाँ बनता है और जिस कारण से बनता है उसी के अनुसार उसका स्वभाव भी बदल जाता है। आयुर्वेद इस भिन्नता को समझकर उपचार तय करता है ताकि समस्या को जड़ से शांत किया जा सके।
1. गैस्ट्रिक अल्सर
अल्सर पेट की भीतरी परत पर बनता है। इस स्थिति में भोजन न करते समय दर्द अधिक होता है। हल्का भोजन लेने पर कुछ समय के लिये आराम मिल सकता है पर कुछ घंटों बाद जलन फिर लौट आती है।
2. ड्यूओडिनल अल्सर
यह छोटी आँत के आरंभिक हिस्से में बनता है। रात के समय दर्द बढ़ने की संभावना होती है। प्रातःकाल पानी पीने पर भी हल्की चुभन महसूस हो सकती है।
3. दवा-जन्य अल्सर
लंबे समय तक दर्दनाशक या कुछ अन्य दवाएँ लेने से पेट की सुरक्षा परत पतली हो जाती है। यह पतलापन घाव बनने की प्रक्रिया को तेज़ कर देता है।
4. तनावजन्य अल्सर
लगातार चिंता या मानसिक दबाव भी अल्सर की जड़ बन सकता है। ऐसे अल्सर में दर्द के साथ बेचैनी भी महसूस होती है।
पेप्टिक अल्सर को बढ़ाने वाले कारण
पित्त का बढ़ना इस रोग की मुख्य जड़ है। पित्त उष्ण, तीक्ष्ण और चंचल गुण वाला है। जब आपके भोजन, दिनचर्या और मन की स्थिति इन गुणों को बढ़ाती है तब अल्सर तेज़ी से बढ़ता है।
1. खाली पेट तीक्ष्ण पेय
खाली पेट चाय, कॉफी या अत्यधिक गरम पेय पेट की सतह पर तीक्ष्ण प्रभाव डालते हैं।
2. मसालेदार भोजन
बहुत तीखा, तला हुआ या गरम स्वभाव वाला खाना पित्त को उग्र करता है।
3. तनाव और मानसिक बेचैनी
तनाव पाचन को तुरंत प्रभावित करता है। पित्त अस्थिर होकर परतों को नुकसान पहुँचाता है।
4. देर से भोजन करना
लंबे विराम से पित्त जमा होकर तीक्ष्ण हो जाता है जिससे पेट की परत क्षतिग्रस्त होती है।
5. रात में भारी भोजन लेना
रात का भारी खाना अग्नि को असंतुलित करता है। इससे पित्त और तीक्ष्ण होकर पेट को प्रभावित करता है।
पेप्टिक अल्सर में उपयोगी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ
अल्सर में वे औषधियाँ सबसे अधिक उपयोगी मानी जाती हैं जो पेट में शीतलता लाएँ, पित्त को संतुलित करें और परतों की मरम्मत में सहायक हों।
1. यष्टिमधु
यष्टिमधु पेट पर एक प्राकृतिक सुरक्षा-परत बनाती है। यह जलन कम करती है और घावों के भरने की गति बढ़ाती है।
2. शतावरी
शतावरी की तासीर शीतल होती है। यह पित्त को शांत करती है और पेट की संवेदनशील परतों को राहत देती है।
3. आमलकी
आमलकी अग्नि को संतुलित करती है और पित्त की उग्रता कम करती है। यह अल्सर में विशेष लाभकारी है।
4. गिलोय
गिलोय शरीर की गर्मी को कम करती है और आंतरिक सूजन को शांत देती है।
5. धनिया
धनिया का जल पेट में ठंडक लाता है। यह पित्त की तीक्ष्णता कम करता है।
6. त्रिफला
त्रिफला अग्नि को स्थिर रखते हुए पाचन मार्ग को संतुलित करता है ताकि पित्त अपनी सीमा में रहे।
लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।
