
भुने हुए चने का सेवन करने से हो सकता है कैंसर का खतरा Publish Date : 04/12/2025
भुने हुए चने का सेवन करने से हो सकता है कैंसर का खतरा
डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा
बाजार में बिकने वाले भूने हुए चने में ऑरामाइन पाया गया है जो कि एक ऐसा जहरीला केमिकल है, जिसका सेवन करने से कई तरह के कैंसर विकसित हो सकते हैं।
भुने हुए चने अक्सर एक हेल्दी स्नैक माने जाते हैं, लेकिन बाजार में मिलने वाले भुने हुए चने आपको कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे में भी डाल सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाजार में मिलने वाले इन चनों में ऑरामाइन नाम का एक केमिकल होता है, जो उन्हें चमकदार और पीला दिखाने के लिए मिलाया जाता है।
कई रिसर्च और विशेषज्ञों का कहना है कि यह केमिकल सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इससे लिवर, किडनी और ब्लैडर कैंसर का खतरा बढ़ सकता है, साथ ही नर्वस सिस्टम की बीमारियां भी हो सकती हैं।
इस मुद्दे पर अब राजनीतिक बहस छिड़ गई है। राज्यसभा एमपी प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और फूड प्रोसेसिंग मंत्री चिराग पासवान को एक चिट्ठी लिखकर इस गंभीर खतरे से निपटने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की मांग की है। शिवसेना (UBT) MP प्रियंका चतुर्वेदी ने लिखा कि हाल के सबूत बताते हैं कि ‘ऑरामाइन’, जो कपड़ों और चमड़े के लिए इस्तेमाल होने वाला एक इंडस्ट्रियल डाई है, को भुने हुए चनों का रंग निखारने के लिए गैर-कानूनी तरीके से मिलाया जा रहा है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है और इस मामले की पूरे देश में सख्ती से जांच की जानी चाहिए।

बता दें, FSSAI के नियमों के तहत, ऑरामाइन और ऐसे दूसरे इंडस्ट्रियल रंग पूरी तरह से बैन हैं। फ़ूड सेफ़्टी एक्ट 2006 के तहत सिर्फ मंजूर फूड कलर ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
ऑरामाइन O क्या है?
ऑरामाइन एक इंडस्ट्रियल डाई है जिसका इस्तेमाल कपड़ों और लेदर को रंगने के लिए किया जाता है। ऑरामाइन व् भारत में एक अलाउड फूड एडिटिव नहीं है और इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से टेक्सटाइल और लेदर प्रोसेसिंग जैसी इंडस्ट्रीज में किया जाता है। जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंटल साइंसेज में छपे 2025 के एक रिसर्च आर्टिकल में कहा गया है कि ऐसे डाई के लंबे समय तक संपर्क में रहने से सेहत को गंभीर खतरा हो सकता है। ऑरामाइन O के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कई तरह के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है, जिनमें ब्लैडर और लिम्फैटिक ट्यूमर शामिल हैं।
लंबे समय तक संपर्क में रहने से लिवर और ब्रेन को नुकसान, रिप्रोडक्टिव टॉक्सिसिटी और न्यूरोटॉक्सिक असर भी होते हैं जो सेंट्रल नर्वस सिस्टम को दबा देते हैं। इन नतीजों से पता चलता है कि लोगों की सेहत की रक्षा के लिए फूड कलरिंग एडिटिव्स की सख्त मॉनिटरिंग और रेगुलेशन की तुरंत जरूरत है।
इसे कभी भी खाने में नहीं मिलाना चाहिए. इस केमिकल के कारण कई अन्य बीमारियां भी हो सकती हैं, जैसे कि
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प्रेग्नेंट महिलाएं और बच्चे खास तौर पर कमजोर होते हैं।
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लिवर कैंसर, ब्लैडर कैंसर और पेट के ट्यूमर का खतरा बढ़ सकता है।
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लिवर के काम पर असर पड़ सकता है और एंजाइम लेवल बढ़ सकता है, जिससे सिरोसिस हो सकता है।
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किडनी की फिल्टरिंग में दिक्कत आ सकती है।
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सिरदर्द, चक्कर आना और आम कमजोरी हो सकती है।
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बच्चों में उल्टी, पेट दर्द और डायरिया हो सकता है।
दरअसल, 2025 में, महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में हुए टेस्ट में कई भुने हुए चने के सैंपल में ऑरामाइन पाया गया है। यह समस्या खासकर स्ट्रीट फूड और लोकल मार्केट में आम है, जहां छोटे वेंडर पर कम नजर रखी जाती है। नवंबर 2025 के एक वायरल वीडियो में दिखाया गया कि मार्केट के चने दबाने पर पाउडर बन जाते हैं और अजीब तरह से चमकदार और पीले दिखाई देते हैं, जो ऑरामाइन की मिलावट का स्पष्ट संकेत है।
ऐसे घर पर मिलावटी चने की पहचान करें

असली भुने हुए चनेः छोटे, नैचुरली भूरे और सख्त होते है और दबाने पर टूटते नहीं हैं।
मिलावटी चनेः बड़े, चमकदार पीले, और दबाने पर पाउडर बन जाते हैं।
पानी का टेस्टः चनों को एक गिलास पानी में भिगोएं, अगर पीला रंग घुल जाता है, तो वह चना मिलावटी हैं।
रोस्टेड चना सेवन करने के लाभ:
भुने हुए चने में फाइबर भरपूर मात्रा में होता है। यह डाइजेशन को धीमा करता है और ज्यादा शुगर को ब्लडस्ट्रीम में जाने से रोकता है। इस वजह से, ब्लड शुगर लेवल तेजी से नहीं बढ़ता है। फाइबर भरपूर होने के कारण, यह गट हेल्थ को बेहतर बनाता है और डाइजेशन के लिए जरूरी बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करता है।
इसके चलते, पॉटी आसानी से होती है। इसके अलावा, यह फाइबर ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करता है। भुने हुए चने में प्रोटीन भी भरपूर होता है, जो मसल्स की ताकत बढ़ाता है। यह भूख भी कम करते हैं, जिससे आप पूरे दिन एक्टिव रहते हैं। पेट भरा होने से अनहेल्दी स्नैक्स खाने की इच्छा कम होती है। यह सभी बातें डायबिटीज मैनेजमेंट के लिए जरूरी हैं।
लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।
