भारत में क्षयरोग उन्मूलन के प्रयास      Publish Date : 31/08/2025

                      भारत में क्षयरोग उन्मूलन के प्रयास

                                                                                                                                                                         डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

क्षयरोग (टीबी) संक्रामक रोग होने के अलावा मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती के समान है। वर्ष 2023 में क्षयरोग के 28 लाख मामले भारत में सामने आए, जिनमें से करीब 32 हजार पीड़ितों की मौत हो गई। इन ताजा मामलों का संज्ञान और नियमित स्वास्थ्य देखभाल एवं अनुसंधान संबंधी भारत की योजनाएं क्षयरोग के उन्मूलन की दिशा में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं। स्वास्थ्य विज्ञान के विशेषज्ञों ने अपने इस लेख में इन्हीं महत्वपूर्ण बातों पर तथ्यपरक विचार के पाठकों के लिए साझा किए हैं।

क्षयरोग यानी टीबी (ट्युवरकुलोसिस) एक संक्रामक बीमारी है जो माइकोबैक्टीरियम ट्युवरकुलोसिस नामक वैक्टीरिया (जीवाणु) के कारण होती है। हवा में फैलने वाला यह वैक्टीरिया सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकता है। जब कोई टीबी से संक्रमित व्यक्ति खांसता या थूकता है तो यह जीवाणु हवा में फैल जाता है। कोई अन्य व्यक्ति जब उस हवा में सांस लेता है तो यह जीवाणु के संपर्क में आकर संक्रमित हो सकता है। टीबी संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने अथवा उसके द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं के संपर्क में आने से भी संक्रमण फैल सकता है।

कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, अपर्याप्त स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाएं, धूम्रपान और मद्यपान, मलेरिया और एचआईवी जैसी अन्य वीमारियों के संक्रमण जैसी स्थितियां टीबी फैलने के लिए अनुकूल होती हैं। वृद्धावस्था और वाल्यकाल में भी टीबी से संक्रमित होने का खतरा अधिक होता है।

भारत के साथ क्षयरोग यानी टीबी या तपेदिक का बहुत पुराना नाता रहा है और यही कारण है कि भारत विश्व में टीबी पर शोध करने और उस पर काबू पाने की नवीनतम योजनाएं तैयार करने में अग्रणी रहा है। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत से भारत में टीबी को सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक गंभीर चिंता का विषय माना गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में टीबी के लगभग 2.80 मिलियन (195 प्रति लाख आबादी) मामले प्रकाश में आए जिनमें 3,23,00 (22 प्रति लाख आबादी) मौतें दर्ज की गई। भारत में क्षयरोग के उन्मूलन का आशय इस बीमारी को पूरी तरह से समाप्त करना रहा है।

दूसरे शब्दों में क्षयरोग के मामलों, उसमें होने वाली मौतों और इस बीमारी से जुड़े खर्च को 2015 के स्तर की तुलना में 90% और 95% तक गिरावट लाना है। वर्ष 2015 में भारत में टीबी से पीड़ित रोगियों की संख्या 3.13 मिलियन (237 प्रति लाख आबादी) थी, जिनमें 4,24,000 (32 प्रति लाख आवादी) लोग मौत का शिकार हुए थे। भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार टीबी ग्रस्त 35% परिवारों द्वारा किया गया व्यय उनके सामर्थ्य से कई गुना विशाल था।

हाल ही में सम्पन्न एक अध्ययन के अनुसार भारत में टीबी के 39% प्रतिशत मामलों में प्रत्यक्ष लक्षणों की उपस्थिति नहीं थी जबकि इसके पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2022 में ऐसे मामलों की संख्या 50% से अधिक थी। यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2023 में विश्व में टीबी ग्रस्त 27.5% रोगी और बहुऔषध प्रतिरोधी यानी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी से ग्रस्त 47% नए रोगी भारत से प्रकाश में आए थे तथा विश्व में टीबी से होने वाली 22% मौतें भारत में हुई थीं।

महामारी के दौरान एक प्रमुख बाधा के बावजूद भारत मेंवर्ष 2022 तक टीबी से जुड़ी कुछ सेवाएं पूर्व स्तरों तक स्थापित कर ली गई, जबकि अन्य रोगों से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं महामारी पूर्व स्तरों से बहुत अधिक बढ़ाई गई।

टीबी उभरने के लिए जिम्मेदार स्थितियां

                                                      

टीबी उभरने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार स्थितियों में सम्मिलित हैं: कुपोषण, एचआईवी, डायबिटीज़, सिलिकोसिस, मादक द्रव्यों के व्यसन से जुड़ी बीमारियां, धूम्रपान और अल्कोहल (मदिरा) का सेवन। किसी व्यक्ति का बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई 18.5 किलोग्राम/वर्ग मीटर (<18.5Kg/m2) से कम होने पर उसे कुपोषित माना जाता है। टीबी उभरने में सामाजिक- सांस्कृतिक-आर्थिक स्थितियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जैसे कि निर्धनता, लिंग, अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा, अपर्याप्त आवास व्यवस्था, विस्थापन, जेल, स्वास्थ्यसुविधाओं की अपर्याप्त पहुंच तथा भेदभाव। टीबी से ग्रस्त व्यक्ति की न केवल समय से पहचान करने के लिए वल्कि विशेष चिकित्सा व्यवस्था एवं इलाज की सफलता के लिए उससे जुड़ी समग्र स्थितियों को ध्यान में रखना अनिवार्य हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्यों यानी सस्टेनेवल डेवलपमेंट गोल्स को लेकर प्रतिवद्धता के अंतर्गत भारत का उद्देश्य वर्ष 2015 में टीबी की घटनाओं की तुलना में 80% और इससे होने वाली मौतों में 90% तक गिरावट लाना है। इसके अलावा वर्ष 2030 तक टीबी के कारण परिवारों द्वारा किए जाने वाले व्यय को शून्य करना भी है। हालांकि, वर्ष 2018 में इस लक्ष्य को प्राप्त करने की अवधि वर्ष 2025 के भीतर ही निर्धारित की गई है।

टीबी के लिए तरह-तरह की स्थितियां ज़िम्मेदार होती हैं। इसे देखते हुए भारत में टीबी दूर करने की सफलता अन्य सतत् विकास लक्ष्यों यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स से सीधे जुड़ी हुई है जिसके अंतर्गत व्यापक स्तर तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने, कुपोषण और निर्धनता दूर करने तथा सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाने जैसी गतिविधियां सम्मिलित हैं।

टीबी उन्मूलन की दिशा में भारत के प्रयास

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत टीबी के संबंध में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम यानी नेशनल टीबी एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) का संचालन किया जा रहा है। इस कार्य के संचालन में केंद्रीय टीबी प्रभाग यानी सेंट्रल टीबी डिवीज़न की भूमिका एक शीर्ष तकनीकी संस्था के रूप में है। इसके अंतर्गत सामुदायिक स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों एवं विशेषज्ञ समितियों की सहायता के साथ-साथ तकनीकी विशेषज्ञों तथा राज्य के स्वास्थ्य केंद्रों उपकेंद्रों द्वारा सेवाएं प्रदान की जा रही हैं।

संपूर्ण देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत केंद्रीय और राज्य सरकारों की स्वास्थ्य प्रणाली के माध्यम से राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, टीबी के लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए निजी क्षेत्रों और अन्य संबद्ध मंत्रालयों को राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम से जोड़ा जा रहा है। भारत में वर्ष 2023 में राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए वार्षिक बजट में 3113 करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान की गई थी।

टीबी से होने वाली मौतों में कमी लाने की चुनौतियां

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में 1,10,000 टीबी के नए ऐसे रोगी थे जिनमें टीबी की दवाइयां वेअसर थीं यानी उनमें मौजूद वैक्टीरिया में दवाइयों के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न हो गया था। हाल ही में भारत सरकार द्वारा औषध प्रतिरोधी टीबी से ग्रस्त सभी रोगियों के लिए BPaL/M नामक एक नए औषध विधान की शुरुआत की गई है, जिसकी उपचार सफलता दर सामान्य औषध विधान की तुलना में 86% से 88% तक अधिक है, यही नहीं, इलाज की अवधि 18 से 24 महीने से घटकर 6 महीने हो गई है और दवाइयों की दैनिक खुराक 14 टेवलेट से घटकर 3 हो गई है। BPaL/M विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मान्यता प्राप्त औषध प्रतिरोधी क्षयरोग यानी ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस के इलाज के लिए प्रयुक्त औपचियों का एक 6 माह का मुखीय विधान (ओरल रेजिमेन) है जो स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए भी किफायती साबित हुआ है। इस रेजिमेन में शामिल दवाइयां हैं वेडाक्विलीन, प्रेटोमैनिड, लिनेज़ोलिड और मॉक्सीलॉक्सेसिन (वैकल्पिक, यदि लुरोक्विनोलोंस के प्रति प्रतिरोध हो)।

पोषण परामर्श/न्यूट्रिशनल काउंसलिंग, क्षयरोग (TB) के रोगियों के पोषण की जांच के साथ शुरू होता है

  • पोषण की स्थिति जाननाः क्षयरोग (TB) के रोगी की ऊंचाई, वजन और बीएमआई (Body Mass Index) का आकंलन।
  • क्षयरोग के रोगियों के लिए आहार और उपयुक्त भोजन।
  • क्षयरोग के रोगी वर्तमान मे क्या भोजन ले रहे हैं और उनको कैसी भूख लगती है।

पोषण संबंधी आकलन के आधार पर क्षयरोग के रोगियों को निम्नलिखित जानकारी दी जा सकती है:

  • क्षयरोग के रोगियों को एक दिन में तीन बार भोजन और बार-बार हल्का भोजन/नाश्ता करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • भोजन की मात्रा बढ़ाए बिना ऊर्जा और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  • चपाती या चावल में तेल, मक्खन या घी मिलाने से आहार में ऊर्जा की मात्रा बढ़ सकती है।
  • अंकुरित/स्प्राउट्स, भुना हुआ चना, मूंगफली, दालें, तले हुए या भुने हुए रूप में नाश्ते के रूप में ली जा सकती हैं। दूध व अंडे को आहार में शामिल करना चाहिए।
  • रोगियों की शाकाहारी/मांसाहारी प्रणाली के आधार पर आसानी से उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों के उपयोग पर जोर दिया जाना चाहिए।

टीबी का मुकाबला करने में पोषण की भूमिका

टीबी का मुकाबला करने में पोषण को अत्यंत महत्वपूर्ण पाया गया है। टीबी के बेहतर इलाज के लिए भारत सरकार द्वारा टीबी से पीड़ित सभी रोगियों के पोषण स्तर को बढ़ाने के उद्देश्य से उनके इलाज की संपूर्ण अवधि तक उनको दी जाने वाली राशि 500 से बढ़ाकर 1000 कर दी गई है। इसके साथ भारत सरकार द्वारा 18.5 कि ग्राम/ वर्गमीटर से कम बीएमआई वाले सभी टीबी ग्रस्त रोगियों को राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन योजना के अंतर्गत इलाज के प्रथम दो महीनों तक निक्षय मित्र नामक एक घटक के रूप में एनर्जी डेंस न्यूट्रीशन सप्लीमेंटेशन (ईएनडीएस) की सहायता देने की घोषणा की गई है।

इसमें टीबी से पीड़ित रोगियों के परिवार के सदस्यों के पोपण स्तर को भी सुधारने का उद्देश्य है। निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर, डीबीटी) के माध्यम से लगभग एक करोड़ लाभार्थियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन योजना के अंतर्गत पहले से ही डिफ्रेशिएटेड केयर मैनेजमेंट (डीसीएम) नामक एक सरल और कम संसाधन से युक्त प्रयास अपनाया जा रहा है। यह पहल टीबी से ग्रस्त अत्यंत संवेदनशील लोगों (ऐसे लोग जो एचआईवी से पीड़ित हो), कुपोषित एवं मधुमेह से पीड़ित लोगों, पांवों में सूजन तथा मादक द्रव्यों के व्यसन से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त लोगों, वृद्धों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों, निर्धन एवं जनजातीय लोगों, टीबी ग्रस्त रोगियों के संपर्क में रहने वाले व्यक्तियों के साथ संपर्क स्थापित करने वाले व्यक्तियों में मौत की घटनाएं कम करने में सहायक साबित हुई है।

स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा सरल अनुकूलित और ज़रूरत के अनुसार निर्मित गाइडलाइंस के माध्यम से डीसीएम को कड़ाई से कार्यान्वित करने के परिणामस्वरूप ऐसे अतिसंवेदनशील लोगों की त्वरित पहचान कर उन पर निगरानी रखी जा सकती है तथा उपयुक्त गहन चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। तमिलनाडु सरकार तथा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के चेन्नई स्थित राष्ट्रीय जानपदिकरोग संस्थान (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी) द्वारा संयुक्त रूप से TN-KET (तमिलनाडु-केसानोइ एराप्पिला थिट्टम) नामक एक सफल कार्यक्रम आयोजित किया गया है।

डीसीएम (डिफ्रेशिएटेड टीबी केयर ऐंड मैनेजमेंट) कार्यक्रम की सफलता टीबीग्रस्त रोगियों के क्षेत्रों में उपजिला केंद्र स्तर के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम की नियमित भूमिका पर निर्भर करती है। इस समर्पित गहन सहायता कार्यक्रम के माध्यम से औपध प्रतिरोधी टीबी से ग्रस्त रोगियों, सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से कमजोर व्यक्तियों में मौत की घटनाएं कम की जा सकती हैं। यदि यह सुनिश्चित किया जाए कि टीबी से ग्रस्त किसी भी व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती होने से रोका नहीं जाए तो इससे होने वाली मौतें काफी हद तक घटाई जा सकती हैं।

टीबी के कारण लगभग 20% से 24% मौतें फेफड़ों की टीबी के अलावा अन्य अंगों के टीबी ग्रस्त होने से होती हैं, अतः राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में ऐसे लोगों को सम्मिलित किया जाना चाहिए जो फेफड़ों से इतर अन्य अंगों की टीबी से ग्रस्त हों, जिनकी प्रतिरक्षाशक्ति कमजोर हो, जिनकी प्रायः पहचान नहीं हो पाती अथवा जिनका उपयुक्त इलाज नहीं हो पाता। यह पहल टीबी से होने वाली मौतों में काफी गिरावट लाने में सहायक हो सकती है।

मौत से संबंधित स्वास्थ्य स्वयंसेवक की महत्वपूर्ण है। जिला कलेक्टर कार्यालय के तत्वावधान में टीबी से होने वाली मौतों का ऑडिट मातृ मर्त्यता यानी मैटर्नल मॉर्टलिटी के ऑडिट के समान ही किया जाना चाहिए ताकि मौत के लिए जिम्मेदार कारणों का मूल्यांकन किया जा सके तथा राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम का बेहतर कार्यान्वयन किया जा सके।

टीबी के मामलों का पता लगाने में स्वास्थ्य स्वयंसेवकों की भूमिका

  • स्वास्थ्य स्वयंसेवक (Health Volunteers), क्षयरोग के नियमित रूप से लोगों की जांच करने और नए मरीजों की पहचान करने में में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को क्षयरोग के बारे में जानकारी फैलाने के लिए समुदायों में विभिन्न मंचों, जैसे पंचायती राज संस्था, स्कूल आदि का उपयोग करना चाहिए। इस तरह के मीडिया का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को मरीजों के स्वास्थ्य को सुधार के उद्देश्य से सामुदायिक जागरूकता के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए।
  • नये रोगियों को खोजने के सक्रिय अभियान के दौरान स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को ज्यादा जोखिम वाले लोगों की क्षयरोग के लिए लक्षणों के आधार पर क्षयरोग के लिए स्क्रीनिंग जांच करनी चाहिए। इसके बाद पहचाने गए क्षयरोग (TB) संदिग्धों-प्रीसम्पटिव टीबी के मामलों को प्रयोगशाला में लेबोरेटरी जांच के लिए भेजा जाना चाहिए। यदि संदिग्ध की जांच रिपोर्ट में क्षयरोग पाया जाता है, तब रोगी का उपचार तुरंत शुरू किया जाना चाहिए।
  • स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन क्षयरोग के रोगियों ने इलाज शुरू कर दिया है- वे पूर्ण रूप से उपचार लें।
  • स्वास्थ्य स्वयंसेवको को जांच किये गए लोगों का रिकॉर्ड रखना चाहिए जिसमें बलगम की जांच के, निदान किए गए मामले और उपचार ले रहे रोगी आदि के आंकड़े शामिल होने चाहिए।

टीबी की यथासमय और सटीक पहचान आवश्यक

                                                       

बड़ी संख्या में टीबी ग्रस्त रोगी अपना उपचार कराना बीच में ही छोड़ देते हैं। ऐसे रोगियों का पता लगाने के लिए टीबी की जांच में अब लक्षणों की बजाय एक्स-रे परीक्षण पर भरोसा करना अनिवार्य है। जैसा कि एक्स-रे जांच में समुदाय में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी पहचान में आ जाएंगे जो टीबी से संक्रमित तो होते हैं पर लक्षण नहीं उभरते। एक्स-रे मशीनें देश-भर में निजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में उपलब्ध हैं।

राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत प्राप्त की गई नई एक्स-रे मशीनें मोबाइल मेडिकल वैन के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे बड़ी संख्या में लोगों की जांच की जा सकेगी और साथ ही साथ टीबी की पुष्टि करने वाली नैदानिक प्रणालियों पर बोझ भी घटेगा। एक्स-रे मशीनों में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर द्वारा मान्य 'एआई टीबी नैदानिक उपायों' यानी आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस युक्त टीबी नैदानिक उपायों को जोड़ा जाना चाहिए जिससे सुदूर दुर्गम क्षेत्रों की आवादियों में भी कुछ ही मिनटों में परिणाम प्राप्त हो जाएं।

कुछ राज्यों में पहले ही टीबी की एक्स-रे जांच के साथ-साथ क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरीडिज़ीज़ (सीओपीडी), लंग यानी फेफड़े के कैंसर और मधुमेह जैसी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की जांच की जा रही है।

भारत के राजनेताओं की टीबी के प्रति ठोस प्रतिवद्धता है, इसका लाभ उठाते हुए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम द्वारा संदिग्ध रोगियों की पहचान में न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट (NAAT) का प्रयोग वर्तमान में 21% से बढ़ाकर शत-प्रतिशत किया जाना चाहिए। NAAT की उपलब्धता का स्थान, दैनिक शिफ्टों की संख्या, नमूनों के परिवहन तथा सप्लाई चेन की दक्षता जैसी स्थितियों को अनुकूल वनाने के परिणामस्वरूप NAAT प्रक्रिया द्वारा शत-प्रतिशत परिणाम प्राप्त किए सकते हैं।

हाल ही में राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में 'पैथो डिटेक्ट' नामक NAAT के तीसरे प्लेटफार्म को जोड़ने तथा आई सीएमआर द्वारा टीबी की ओपेन NAAT प्रणालियों के सत्यापन के परिणामस्वरूप NAAT परीक्षण प्रक्रिया तथा भारत में टीबी अधिसूचना दर यानी टीबी नोटिफिकेशन रेट में वृद्धि होगी। ये स्थितियां योजना बनाने, सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने और कार्यक्रम की दक्षता की माप के लिए संकेतक हैं।

एचआईवी से ग्रस्त लोगों के लिए मूत्र (यूरीन) आधारित LAN तथा टीबी ग्रस्त वच्चों के लिए मल परीक्षण यानी स्टूल टेस्ट जैसे टीबी की पहचान हेतु प्रयुक्त नवीन साधनों की व्यापक उपलव्धता अतिसंवेदनशील टीबी ग्रस्त रोगियों के लिए अत्यंत सहायक होगी। जीभ के स्वैव (टंग स्वैव) परीक्षण, जिन पर कार्य किया जा रहा है, जैसी अन्य विधियों के प्रयोग से समय में कमी और परीक्षण दरों में वृद्धि हो सकती है।

व्यापकता में गिरावट

टीबी की व्यापकता में गिरावट लाने के लिए भारत द्वारा मौजूदा सभी साधनों का पूर्ण प्रयोग किया जाना आवश्यक है, जिन्हें देश में रोगियों की पहचान करने और उनके इलाज करने के लिए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में पहले से ही सम्मिलित किया गया है। इससे रोग के संचरण में अत्यधिक गिरावट आएगी। वर्तमान में देश में तथा देश से बाहर जिन वैक्सीनों के परीक्षण किए जा रहे हैं, उनके प्रयोग की संभावना तलाशने की जरूरत है। इनमें से कुछ वैक्सीनों से संबंधित आंकड़े संभवतः शीघ्र उपलब्ध हो जाएंगे। हालांकि, नई वैक्सीनों को इस कार्यक्रम में सम्मिलित करने में अभी भी समय लगेगा। इसे देखते हुए उन वैक्सीनों पर प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता को बल मिलता है।

पोपण के माध्यम से पर्याप्त ऊर्जा, प्रोटीनों और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। टीबी की व्यापकता को घटाने में पोपण की भूमिका ठीक एक वैक्सीन की तरह होती है। हाल ही में, वैश्विक स्तर पर मान्य झारखंड में संपन्न एक परीक्षण से पता चला है कि उपयुक्त पोषण के माध्यम से टीबी की व्यापकता में लगभग 50% तक की गिरावट लाई जा सकती है। पोषण से संपूर्ण स्वास्थ्य को कई तरह से बढ़ावा मिलता है।

केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रों के संयुक्त प्रयासों से संपूर्ण भारत की अतिसंवेदनशील आबादी के लिए पौष्टिक आहार की सुलभता सुनिश्चित की जा सकती है।

अवसर और नियोजन

इनमें से कई सरल गतिविधियों को राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत पहले से मंजूरी प्राप्त है, अतः उनके प्रयोग में तेजी लाई जा सकती है अथवा उनकी तत्काल शुरुआत की जा सकती है। टीबी के लिए नवीन राष्ट्रीय नीतिगत योजना के साथ अन्य कार्यक्रमों को जोड़ा जा सकता है, जिनको आगामी 5 वर्षों के लिए तैयार किया जाना चाहिए। इनके अतिरिक्त, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम को एकीकृत करते हुए टीबी की राष्ट्रीय नीतिगत योजना द्वारा वर्ष 2030 की अवधि तक के लिए हस्तक्षेप कार्यक्रमों को तैयार करने, वित्तीय व्यवस्था करने तथा इस कार्यक्रम के अंतर्गत निजी क्षेत्रों की उत्तम भागीदारी को प्रेरित करने का एक मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

सितंबर 2022 में 'प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान' की शुरुआत की गई जिसका उद्देश्य टीबी के खिलाफ लड़ाई में सामुदायिक भागीदारी और स्वामित्व को मजबूत बनाना है। इस कार्यक्रम में राजनीतिज्ञों, सरकारी अधिकारियों और गैर सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लगभग डेढ़ लाख से अधिक निक्षय मित्रों ने टीबी से प्रभावित व्यक्तियों की सहायता करने का संकल्प लिया है।

राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में प्रबंधकों को टीबी ग्रस्त लोगों से त्वरित प्रतिक्रिया (फीडयेक) प्राप्त करने, कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में सहायता मिलने, तथा समुदायों में गहरी पैठ वनाने के उद्देश्य से नागरिक समाज की भागीदारी को तत्काल विस्तृत करने की आवश्यकता है। मानसिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने और कलंक मिटाने पर भी नागरिक समाज की एक प्रमुख भूमिका हो सकती है। वरना ये स्थितियां टीबी ग्रस्त रोगियों की पहचान करने, इलाज पूरा होने तक उन्हें जोड़े रखने तथा इलाज के परिणामों को प्राप्त करने में बाधक होती हैं।

राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के स्टाफ, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, विकास से जुड़े सहयोगियों तथा मेडिकल कॉलेज द्वारा संचालित कार्यक्रमों की फील्ड में कड़ी निगरानी की आवश्यकता है। बड़े पैमाने पर यह कार्य जमीनी स्तर पर सदस्यता अभियान चलाने, संकेतकों पर आधारित रिपोर्टिंग करने तथा सभी स्तरों पर संरचित एवं नियमित समीक्षाओं के माध्यम से किया जा सकता है। इससे समस्याओं की पहचान एवं उनके समाधान ढूंढने तथा रोग पर निगरानी रखने वाले कार्यक्रमों को बेहतर बनाने की गहरी समझ उत्पन्न होगी। साथ ही इस कार्यक्रम से प्राप्त आंकड़ों को ताल-मेल के साथ अधिकतम प्रयोग में लाने से वांठित परिणाम अवश्य मिलेंगे।

टीबी से जुड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए टीबी की जांच और उसके इलाज के अवसरों को बेहतर बनाने हेतु भारत के कॉर्पोरेट जगत यानी भारत के नियमों एवं कानूनों के अंतर्गत कार्यरत व्यापारिक प्रतिष्ठानों और संगठनों की अधिकतम भागीदारी एवं उनकी प्रतिबद्धता की जरूरत होगी। इस आलेख में ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के इलाज के लिए वर्णित दवाइयों के सेवन का निर्णय स्वयं नहीं, बल्कि योग्य चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह में ही लिया जाना चाहिए।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।