बेहतर दृष्टि प्राप्त करने के संदर्भ में      Publish Date : 29/08/2025

                  बेहतर दृष्टि प्राप्त करने के संदर्भ में

                                                                                                                                            डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

वर्तमान आधुनिक युग में दृष्टि संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए सर्जरी की विभिन्न उन्नत तकनीकें प्रचलन में हैं। कुछ मामलों में तो प्रभावित व्यक्ति को चश्मे से भी छुटकारा मिल सकता है।

मोतियाबिंद का इलाज चिकित्सा जगत के सबसे पुराने इलाजों में से एक है। मोतियाबिंद की सर्जरी के बाद जहां पहले कुछ काम चलाने योग्य रोशनी मिलने भर से मरीज खुश हो जाता था, वहीं आज वह पहले से भी बेहतर दृष्टि का इच्छुक है।

अब यह संभव है कि हम मरीज को न केवल युवावस्था जैसी दृष्टि दे सकें बल्कि उसे चश्मे से भी छुटकारा दिला सकते हैं। आज विश्वस्तरीय अत्याधुनिक नेत्र केंद्रों पर यह टेक्नोलॉजी मौजूद है। क्या है यह टेक्नोलॉजी हमारे स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ0 दिव्यांशु सेंगर आपको बता रहें हैं इस टैक्नोलॉजी के विषय में सबकुछ-

कृत्रिम लेंस में क्रांति

                                                    

मोतियाबिंद का उपचार कराने वाले अधिकतर मरीज 40 वर्ष से अधिक आयु के ही होते हैं। इस उम्र में उन्हें पास के कार्य के लिए चश्मा लगाना पड़ता है। इस स्थिति को प्रैस्बॉयोपिया कहते हैं। कुछ मरीजों में इसके अलावा एस्टिगमैटिज्म यानी सिलिंड्रीकल पावर भी होती है। इन दोनों ही स्थितियों से निपटने के लिए अब से पहले मरीज को अच्छे से अच्छे उपचार के बाद भी चश्मे के ऊपर ही निर्भर रहना पड़ता था। परन्तु आजकल ऐसा नहीं है।

प्रैस्बॉयोपिया-सुधारः आज मल्टीफोकल लेंस प्रत्यारोपण के द्वारा पास व दूर की वस्तुओं व व्यक्तियों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पास के कामों के लिए चश्मे पर निर्भरता 90 से 95 प्रतिशत तक कम हो जाती है। हालांकि यह एक महंगा उपचार है पर निश्चित तौर पर अंततः मरीज युवावस्था जैसी दृष्टि प्राप्त कर इससे संतुष्ट भी हो जाता है।

एस्टिगमैटिज्म-सुधारः मरीज की अक्सर आंख में सिलिंड्रीकल दोष होता है और यह तभी हट सकता है, जब एक विशेष प्रकार के कृत्रिम लेंस (टोरिक) को मरीज की आँखों प्रत्यारोपित किर दिया जाए।

लेजर बॉयोमेट्रीः मल्टीफोकल हो या टोरिक लेंस यह दोनों ही जब तक मरीज की आंख की सही पावर के अनुरूप नहीं डाले जाएंगे, तब तक संपूर्ण सफलता भी नहीं मिल सकेगी। वर्तमान में लेजर बॉयोमेट्री का प्रयोग करके कृत्रिम लेंस की सटीक पावर निकालने के बाद ही प्रत्यारोपण कर पाना संभव होता है। इस उपकरण के अभाव में लेंस की पावर ऊपर-नीचे होने से चश्मा लगाने की आवश्यकता भी पड़ सकती है।

                                                      

दृष्टि संबंधी दोषों को दूर करने के संदर्भ में अधिकतर नेत्र केंद्रों में काउंसलर भी होते हैं। काउंसलर आपकी दिनचर्या, आंखों की स्थिति आदि के अनुरूप आपके लिए सबसे उचित कृत्रिम लैंस का चयन कराते हैं। सही चयन प्रक्रिया के आधार पर ही इस सर्जरी की सफलता सुनिश्चित हो पाती है। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि आप समय रहते सर्जरी कराएं। बहुत अधिेक मोतियाबिंद की स्थिति में इसका इलाज भी जटिल हो जाता है और आपको पूर्ण दृष्टि मिलने में समय अधिक लग सकता है और परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।