
गाँवों में कमाई का एक नया मॉडलः गोमूत्र बिक्री Publish Date : 01/09/2026
गाँवों में कमाई का एक नया मॉडलः गोमूत्र बिक्री
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
गोमूत्र से गाँवों में कमाई का एक नया मॉडल बनकर सामने आया है, इस व्यवस्था के अन्तर्गत 10 रुपये लीटर की दर से गोमूत्र की खरीदारी शुरू भी कर दी गई है।
बुलंदाहर में एफपीओ का पायलट प्रोजेक्ट, 15 गोमूत्र संग्रह केंद्र बनाए गए हैं; जिनमें प्रतिदिन 500 लीटर गोमूत्र एकत्र हो रहा है, 300 महिलाएं बनी शेयर होल्डर।
गो संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तीकरण और जैविक खेती के साथ जोड़ने की दिशा में प्रदेश के जनपद बुलंदशहर में एक नया प्रयोग शुरू किया गया है। बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव में किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के माध्यम से गोमूत्र की खरीद का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत किसान और पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा हैं। इस पहल के माध्यम से आसपास के 15 गाँवों को एक साथ जोड़ा गया है जिससे वर्तमान में प्रतिदिन करीब 500 लीटर गौमूत्र एकत्र किया जा रहा है।
इस नए मॉडल से गोपालकों को दूध के साथ गोमूत्र के माध्यम से भी अतिरिक्त आमदनी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस पायलट प्रोजेक्ट के सफल रहने पर इसे प्रदेश के अन्य हिस्सों में विस्तार देने की योजना है। साथ ही आगे गोमूत्र की खरीद की दर को 20 रुपये प्रति लीटर तक किए जाने की भी योजना तैयार की गई है।
गांव में ही बने हैं गोमूत्र संग्रह केंद्रः
गोमूत्र के संग्रह के लिए संबंधित गांवों में 200 लीटर की क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इससे पशुपालकों को गोमूत्र बेचने के लिए अपने गांव से कहीं अधिक दूर भी नहीं जाना पड़ेगा और गाँव में संग्रह तथा खरीद की व्यवस्था उपलब्ध हो जाती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर ही केन्द्र के होने से विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं को भी इस प्रोजेक्ट के साथ जोड़ना काफी आसान हो गया है।
गो संरक्षण, महिला रोजगार और प्राकृतिक खेती का एक नया मॉडल
गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, बुलंदशहर में शुरू किया गया यह मॉडल गो संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तिकरण और जैविक/प्राकृतिक खेती को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। गाँवों में गोमूत्र का संग्रह, महिलाओं को कमीशन और शेयर होल्डर के रूप में भागीदारी तथा एकत्र गोमूत्र से खेती के लिए उत्पाद तैयार कर उन्हें इन समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुँचाने तक की पूरी प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर विकसित की जा रही है। श्री गुप्ता के अनुसार गोमूत्र से तैयार उत्पादों को रासायनिक मुक्त खेती को बढ़ावा देने और खेती में सहायक बनाने के उद्देश्य से बढ़ावा दिया जा रहा है।
300 महिलाएं बनी हैं शेयर होल्डर
एफपीओ के माध्यम से चल रहे इस प्रयोग में करीब 300 महिलाओं को शेयर होल्डर बनाया गया है। महिलाओं को केवल संग्रह व्यवस्था से जोड़ने के बजाय इस आर्थिक मॉडल में भी शामिल किया गया है। इस प्रकार गोमूत्र संग्रह में सहायता करने वाली महिलाओं को प्रति लीटर दो रुपये का कमीशन भी दिया जा रहा है। इससे ग्रामीण महिलाओं के लिए गांव में रहते हुए अतिरिक्त आय का एक नया माध्यम तैयार हो गया है।
जड़ी-बूटी के माध्यम से तैयार किए जा रहे हैं खेती के उत्पाद
एकत्र किए गए गोमूत्र का उपयोग खेती के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार करने में किया जा रहा हैं। इस एकत्र गोमूत्र में विभिन्न जड़ी-बूटियों को मिलाकर खेती में इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इस प्रकार तैयार इन उत्पादों को समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जा रही है। इस मॉडल का उद्देश्य गोमूत्र आधारित उत्पादों को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि में रासायनिक उत्पादों के विकल्प के रूप में प्राकृतिक और जैविक खेती को प्रोत्साहित करना भी है।
दूध के साथ अब गोमूत्र भी बनेगा आय का स्रोत
ग्रामीण क्षेत्रों में गोपालन से होने वाली आय मुख्य रूप से दूध और दुग्ध उत्पादों पर ही निर्भर करती है। इस प्रयोग में गोमूत्र को भी एक आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र की खरीद से पशुपालकों को गोवंश से अतिरिक्त आय मिल सकती है। यदि भविष्य में खरीद की कीमत 20 रुपये प्रति लीटर तक हो जाती है तो यह आय का स्रोत और अधिक मजबूत हो सकता है। गोवंश से दूध के अलावा अन्य उत्पादों से आय प्राप्त होने पर पशुओं के संरक्षण और पालन एवं रखरखाव के लिए भी एक नया आर्थिक आधार मिलने की उम्मीद है।
जिला बुलंदशहर के नरसैना गांव में डॉ0 प्रवीण के नेतृत्व में शुरू किए गए इस पायलट प्रोजेक्ट के अनुभवों आधार पर इसे प्रदेश के अन्य जिलों में भी शुरू करने की तैयारी है। विस्तार होने पर विभिन्न गांवों में गोमूत्र संग्रह केन्दों का एक नेटवर्क विकसित किया जा सकता है। इससे पशुपालकों के लिए अतिरिक्त आय, महिलाओं के लिए स्थानीय रोजगार और गो-संरक्षण के लिए एक नया आर्थिक आधार तैयार होने की संभावना है। इसके साथ ही गोमूत्र आधारित उत्पादों के माध्यम से प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में भी यह मॉडल उपयोगी सिद्व हो सकता है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
