डीएनए के माध्यम से भी मानसिक बीमारियां आगे की जनरेशन में जाने की सम्भावनाएं      Publish Date : 30/10/2026

डीएनए के माध्यम से भी मानसिक बीमारियां आगे की जनरेशन में जाने की सम्भावनाएं

                                                                                                   डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

  • ऐसी कौन सी मानसिक बीमारियां हैं जो कि डीएनए के कारण आगे की जनरेशन में जा सकती हैं?

आज के समय में भी बहुत कम लोग ही ऐसे हैं जो कि जानते हैं कि अन्य बीमारियों की तरह मानसिक बीमारियां भी डीएनए के माध्यम से आगे की पीढ़ियों में भी फैल सकती हैं। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि यह डिजीज कौन सी हैं।

जिस तरह शारीरिक बीमारियां डीएनए के जरिए हमारी अगली जनरेशन जाती हैं, ठीक उसी प्रकार से ही मानसिक बीमारियां भी जाती हैं। जी हां, यही कारण है कि हमें सिर्फ अपनी फिजिकल हेल्थ पर ही नहीं, बल्कि अपनी मेंटल हेल्थ का भी पूरा ख्याल रखना चाहिए। यह उम्र के साथ बदलता है। जैसे कम उम्र में हम अपनी बॉडी बनाने पर ध्यान देते हैं लेकिन जैसे-जैसे उम्र और जिम्मेदारियां बढ़ती जाती है, हम अपनी मेंटल हेल्थ को इम्पोर्टेंस देना शुरू कर देते हैं।

                               

प्यारे लाल शर्मा जिला अस्पताल मेरठ, के मेडिकल ऑफिसर डॉ0 दिव्यांशु सेंगर हमें बताते हैं कि कई बार कोई चुपचाप पूछता है- ‘हमारे घर में पहले भी किसी को ऐसी दिक्कत थी, क्या यह आगे की जनरेशन में भी जा सकती है?’ अक्सर लोग मानसिक बीमारी के बारे में आज भी खुल के बात नहीं कर पाते हैं और फिर जब वह इसे आगे बढ़ता देखते हैं तो डॉक्टर के पास जाने में बहुत देर कर देते हैं।

लोगों को इस सवाल से डर क्यों लगता है?

जब हमने डॉक्टर सेंगर से पूछा कि क्या डीएनए के माध्यम से भी मेंटल डिजीज ट्रांसफर हो सकती हैं? तो उन्होंने बताया कि ‘क्योंकि इसमें ‘अगर’ छुपा होता है। अगर घर में किसी को डिप्रेशन रहा हो, अगर कोई बहुत घबराने वाला रहा हो, अगर किसी का मूड बहुत तेजी से बदलता रहा हो, तो मन सीधा निष्कर्ष पर पहुंच जाता है कि ‘शायद मेरे साथ भी ऐसा ही होगा।’ लेकिन क्या यह वास्तव में सच है?

क्या डीएनए के द्वारा भी मेंटल डिजीज ट्रांसफर हो सकती हैं?

इसके सम्बन्ध में डॉक्टर सेंगर कहते हैं कि इसका सच थोड़ा बीच का है। कुछ मानसिक स्थितियों में परिवार का प्रभाव देखा गया है- यह बात गलत कतई नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वही चीज आगे भी होगी ही। इसे ऐसे समझिए कि घर से आपको एक ‘झुकाव’ मिल सकता है, पर यह आपकी दिनचर्या तय करती है कि यह झुकाव आप पर कितना प्रभाव डालेगा।

आपके जीवन में यह कैसे दिखता है?

एक ही घर में दो बच्चे बड़े होते हैं। दोनों ने लगभग वही चीजें देखी होती हैं। फिर भी एक बच्चा छोटी-छोटी बातों से बहुत टूट जाता है, दूसरा उसी हालात में भी संभल जाता है। यह अन्तर केवल डीएनए के माध्यम से नहीं आता है। बीच में और भी बहुत कुछ चीजें हैं जो कि काम करती है।

किन परेशानियों में लोग यह सवाल ज्यादा पूछते हैं?

आम तौर पर लोग इन स्थितियों को जोड़कर देखते हैं जैसे-

  • लंबे समय तक रहने वाली उदासी।
  • मूड का बहुत जल्दी बदलना।
  • बिना वजह घबराहट या बेचैनी।
  • कुछ मामलों में हकीकत से अलग महसूस करना।
  • बच्चों में ध्यान लगाने में दिक्कत।
  • इनमें जीन का भी थोड़ा-बहुत रोल माना जाता है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है।

असली प्रभाव कहां से आता है?

डॉ0 सेंगर बताते हैं कि इसमें आपके घर का माहौल बहुत मायने रखता है। क्या आपको अपनी बात कहने की आजादी मिली है? क्या आपको सुना जाता है? या हर बार कहा गया- ‘इतना मत सोचो?’ धीरे-धीरे ऐसी ही बातें तय करती हैं कि आपके अंदर जो चल रहा है, वह ठीक होगा या बढ़ेगा।

कौन-कौन सी मानसिक बीमारियां अनुवांशिक हो सकती हैं?

डॉक्टर ने 6 ऐसी मानसिक बीमारियों के बारे में बताया है जो जेनेटिक्स के माध्यम से फैल सकती हैं-

अवसाद

अगर माता-पिता में से किसी को डिप्रेशन रहा है, तो बच्चों में इसका खतरा सामान्य से अधिक हो सकता है। यह मस्तिष्क के केमिकल संतुलन और भावनात्मक प्रतिक्रिया से जुड़ा होता है।

बाइपोलर डिसऑर्डर

इस डिसऑर्डर में व्यक्ति का मूड अत्यधिक उतार-चढ़ाव से गुजरता है जैसे कभी बहुत उत्साह और कभी गहरी उदासी रहना। यह विकार अक्सर परिवारों में चलता हुआ देखा गया है।

स्किजोफ्रेनिया

डॉक्टर बताते हुए कहती हैं कि यह एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति वास्तविकता से दूर होने लगता है, जैसे- भ्रम या गलत विश्वास। अगर परिवार में किसी को यह बीमारी है, तो इस रोग का भी अगली पीढ़ी में जाने का जोखिम बढ़ जाता है।

एंग्जायटी डिसऑर्डर

एंग्जायटी बार-बार अत्यधिक चिंता, घबराहट या डर की स्थिति भी आंशिक रूप से आनुवंशिक भी हो सकती है।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर

यह एक न्यूरो डेवलपमेंट कंडीशन है, जिसमें सामाजिक व्यवहार और संचार प्रभावित होता है। इसमें जीन का रोल काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।

अगर किसी परिवार में किसी को एडीएचडी रहा है तो आने वाली पीढ़ी में भी उसके संकेत दिख सकते हैं जैसे- ध्यान की कमी, अत्यधिक सक्रियता और आवेगपूर्ण व्यवहार आदि। यह विकार भी कई बार परिवार में देखा जाता रहा है।

अगर परिवार में किसी को पहले से मानसिक बीमारी हो तो?

जिन लोगों को यह पता होता है कि उनके परिवार में पहले किसी को मानसिक परेशानी रही है, वे अगर इस बात को समझ लें- तो अक्सर खुद को बेहतर संभाल सकते हैं। क्योंकि वे अपने संकेत जल्दी पहचान लेते हैं। ऐसे में आपको डॉक्टर की बताई ये चीजें करनी चाहिए-

  • अगर आपको अपना मन बार-बार भारी लग रहा है, तो उसे नजरअंदाज न करें।
  • किसी भरोसेमंद इंसान से बात करने का प्रयास करें।
  • हालांकि, अगर आपको आवश्यकता महसूस हो, तो प्रोफेशनल से मिलना बिल्कुल ठीक निर्णय होता है।
  • अन्त में आपका यह समझना जरूरी है कि हम हम अपने घरों से बहुत कुछ लेकर आते हैं- लेकिन हम उसी तक सीमित नहीं होते। डीएनए तो केवल एक शुरुआत भर देता है, परन्तु अपनी पूरी कहानी हम खुद ही लिखते हैं।

निष्कर्ष- शारीरिक बीमारी के साथ-साथ मानसिक बीमारी भी डीएनए के माध्यम से फैल सकती है। ऐसे में आपका यह ध्यान देना बहुत जरूरी है कि परिवार का कोई सदस्य या आप खुद ही किसी मेंटल डिजीज का शिकार हैं या नहीं। अगर आपको खुद में बार-बार खुद में या किसी में लंबे समय तक रहने वाली उदासी, मूड का बहुत जल्दी बदलना, बिना वजह घबराहट या बेचैनी, कुछ मामलों में हकीकत से अलग महसूस करना या बच्चों में ध्यान टिकाने में दिक्कत दिखे तो किसी अच्छे साइकोलॉजिस्ट के पास जाएं।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।