साइलेंट डिप्रेशन की ओर धकेलती रील्स      Publish Date : 22/10/2026

    साइलेंट डिप्रेशन की ओर धकेलती रील्स

                                                                                                      डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

आज की इस डिजिटल दुनिया में अत्यधिक स्क्रीन टाइम मानसिक अवसाद यानी डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। दिखावे की संस्कृति और अनियंत्रित मानसिक अवसाद हंसते-खेलते परिवारों को तबाह कर रहे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के संभाजीनगर में आईफोन की जिद के विवाद में एक 19 वर्षीय युवक और उसे बचाने के प्रयास में उसके माता-पिता की पहाड़ी से गिरकर हुई दर्दनाक मौत इस बात का जीता-जागता और भयावह उदाहरण बना है। घटना केवल एक फोन की जिद नहीं, बल्कि इसके पीछे युवाओं में लगती लत, घटते सब्र, गंभीर स्क्रीन एडिक्शन और छिपे हुए मानसिक अवसाद की गहरी समस्या की तस्वीर का संकेत और चेतावनी भी है।

मनोवैज्ञानिकों की माने तो, सोशल मीडिया और फोन युवाओं के लिए एस्केप मोड (भागने का जरिया) और डोपामाइन (फील गुड हॉर्मोन) के लिए एक प्राथमिक स्रोत बन चुके हैं। जब यह कनेक्शन टूटता है, तो वे अत्यधिक चिड़चिड़े या हिंसक हो उठते हैं। स्मार्ट गैजेट्स की लेटेस्ट फीचर लगातार युवाओं को अपनी आभासी स्थिति से तो अक्सर जिद करने लगते हैं। स्मार्टफोन और टैब पर ये खतरनाक फॉलो मी अपनी संख्या की असीम रूप से भी बढ़ रही है, जहां एक ही घर में रहकर भी लोग स्क्रीन में खोए रहते हैं, जिससे आपस में भावनात्मक जुड़ाव और बातचीत खत्म हो रही है। ये पहचान न आने जैसा अनुभव है।

                                  

महाराष्ट्र के संभाजीनगर के गांव में हुए हादसा घटनाक्रम के अनुसार, 19 साल के युवक ने आईफोन खरीदकर और उसकी किश्त चुकाने को लेकर अपने पिता से जिद की थी, जिसे लेकर घर में तनाव और विवाद हुआ। गुस्से और तनाव में युवक घर से निकलकर पहाड़ की चोटी पर जा बैठा और करीब पहाड़ की तरफ कूदने व आत्महत्या की धमकी दे रहा था। सूचना पर आए माता-पिता, स्थानीय लोग और दमकल विभाग भी मौके पर जा पहुंचे। उस युवक को बहुत समझाने की कोशिश की गई। मां ने बेटे को मनाने के लिए अकेले पहाड़ तक जाने की बात भी कही।

बातचीत के दौरान जब पिता उसे बचाने के लिए आगे बढ़े, तो उनका संतुलन बिगड़ गया और युवक के साथ पिता भी नीचे गिर पड़े। अपनी आंखों के सामने पति और बेटे को नीचे गिरते देख सदमे में आई मां ने भी पहाड़ी से छलांग लगा दी और पलक ढपकते ही एक ही हंसते खेलते परिवार के तीनों सदस्यों की मौत हो गई।

मनोचिकित्सकों का मानना है कि किशोरों में अवसाद अक्सर उदासी के रूप में नहीं, बल्कि अत्यधिक गुस्सा और चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर आता है, जिसे माता-पिता बदतमीजी या बुरा व्यवहार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। युवा सुबह जगने से लेकर रात को सोने तक, हर समय स्मार्टफोन से चिपके रहते हैं। रील्स और शॉर्ट्स को बिना सोचे-समझे स्क्रॉल करने की यह आदत धीरे-धीरे उन्हें एक गहरी साइलेंट डिप्रेशन की ओर धकेल रही है।

शोध बताते हैं कि प्रतिदिन तीन से चार घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताने वाले लोगों में अवसाद और एंग्जायटी का जोखिम दोगुना हो जाता है। केंद्र सरकार ने बच्चों और युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत को एक गंभीर साइलेंट क्राइसिस घोषित किया है। एक सर्वे में माता-पिता से मिले फीडबैक के आधार पर बच्चों में ये बदलाव देखे गए हैं। 61 फीसदी बच्चों में अधीरता बढ़ गई है। 58 प्रतिशत बच्चों में अत्यधिक गुस्सा और आक्रामकता देखी गई है। 50 फीसदी बच्चे अति-सक्रियता का शिकार हो रहे हैं।

यह सर्वे बताता है कि लगभग आधे बच्चों में नींद की कमी, डिप्रेशन और सुस्ती पाई गई है। वहीं शॉर्ट वीडियो (रील्स) के लूप में फंसे रहने से युवाओं की एकाग्रता क्षमता बहुत कम हो गई है। फोन छीनने या गेमिंग से रोकने पर बच्चे हिंसक कदम उठा रहे हैं। ऐसे ही लखनऊ में एक 16 वर्षीय लड़के द्वारा गेमिंग की लत के कारण टोकने पर अपनी मां की हत्या करने जैसी दिल दहलाने वाली घटना सामने आई है। एम्स दिल्ली और अमेरिकी मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट्स के अनुसार, स्क्रीन और सोशल मीडिया एडिक्शन के शिकार बच्चों में आत्महत्या से संबंधित जोखिम अधिक पाया गया है। गाजियाबाद में ऑनलाइन गेमिंग और मोबाइल की लत के चलते तीन नाबालिग बहनों द्वारा नौवीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी करने की घटना इस तथ्य का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। लड़की, रील्स ट्रेंड और खतरनाक स्टंट पर वीडियो क्लिप या शॉर्ट वीडियो शूट करने के जुनून में हर साल सैकड़ों भारतीय युवा जान गंवा रहे हैं या गंभीर चोटों का शिकार हो रहे हैं।

मनोवैज्ञानिकों की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 15 से 24 वर्ष के 14 प्रतिशत युवा (हर 7 में से 1) अवसाद या बैचेनी का अनुभव करते हैं। नेशनल सर्वेक्षण के अनुसार, 13 से 17 वर्ष के 7.3 फीसदी किशोर गंभीर मानसिक विकारों से पीड़ित हैं। असली चिंता ये है यह संख्या और भी अधिक बढ़ रही है। एनसीईआरटी और सोशल मीडिया में डूबने वाले 11 प्रतिशत बच्चों ने आत्महत्या, 14 फीसदी ने परण भावनाओं और 43 प्रतिशत ने खुद हिंसा की शिकायत की है। आईसीएमआर और आईआईएम के आंकड़ों में कंट्रोल खोने वाले 32 प्रतिशत छात्रों में मध्यम से गंभीर अवसाद के लक्षण देखे गए हैं। फोर्टिस की कुछ मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट के अनुसार, इंटरनेट और डिजिटल दुनिया से जुड़े 13-17 वर्ष के भारतीय किशोरों में अकेलापन, तनाव और आत्म-नियंत्रण की कमी तेजी से बढ़ रही है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की मृत्यु का एक मुख्य कारण आत्महत्या करना ही सामने आया है। कम उम्र में स्क्रीनटाइम का अत्यधिक उपयोग, स्क्रीन टाइम बढ़ना और सोशल परिवारों का टूटना युवाओं को अकेला कर रहा है।

इस जागरूकता स्थिति से निपटने और सुरक्षित रहने के लिए माता-पिता और युवाओं दोनों को खुल कर बात करें। इसके लिए शुरुआत तक में फोन से दूरी बनाएं। बच्चों को महज रोने के लिए बजाय से ही हाथ में फोन थमाने की आदत बिल्कुल बंद करें। बच्चों को सक्रिय डिजिटल से बचाने के लिए उन्हें समय दें। बच्चों के साथ हर दिन बिना फोन के बैठें, खेलें और उनके मन की बात सुनें। बच्चों की हर जिद (विशेषकर महंगे फोन की) पूरी न करें। उन्हें अन्य और सब्र का महत्व सिखाएं। यदि बच्चा फोन न मिलने पर बहुत रो रहा है, हिंसक हो रहा है या खुद को कमरे में बंद कर रहा है, तो यह खतरे की घंटी है। इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें।

इसके साथ ही परिवार में डिजिटल डिटॉक्स के नियम अपनाएं जैसे नो-फोन जोन, खाने पर के दौरान फोन और बेडरूम में मेडिटेशन का अभ्यास पूरी तरह शामिल करें। डिजिटल डिटॉक्स के साथ सप्ताह में कम से कम एक दिन या कुछ घंटे पूरे परिवार के साथ बिना गैजेट्स के बिताएं। यदि परिवार में कोई व्यक्ति या खुद गंभीर अवसाद, स्क्रीन की लत या आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें। तुरंत किसी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या काउंसलिंग करने का सहारा लें। मुख्य और चाइल्ड हेल्पलाइन पर संपर्क करें। हमें यह समझना होगा कि फोन और तकनीक दोबारा खरीदे जा सकते हैं।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।