खाद्य पदार्थों में मिलावट एवं स्वास्थ्य चुनौतियाँ      Publish Date : 19/10/2026

खाद्य पदार्थों में मिलावट एवं स्वास्थ्य चुनौतियाँ

                                                                                                  डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

आज के युग में उत्पादों में मिलावट एक गंभीर समस्या बन चुकी है। मिलावट का प्रभाव सबसे अधिक हमारी आपूर्ति की आवश्यकता को लेकर है। खाद्य-पदार्थों में उत्पाद न सिर्फ एक राज्य की बल्कि पूरे देश की समस्या बन गई है। इस समस्या को आज के दिन ने अधिकतर लाभ की आशा में जन्म दिया है।

                                       

ये व्यापारी दूध में कच्चा, दाल में काँच गेहू में चावल और तेल में पानी मिलाकर खाद्य पदार्थों का वजन बढ़ाते हैं और खरीद से पूरा पैसा लेते हैं। इन पदार्थों के सेवन से यदि कोई बीमार पड़ जाता है तो बाजार में जीवनरक्षक औषधियाँ भी नकली ही बिक रही हैं। इन खाद्य पदार्थों के सेवन से लोग दिल के दौरे पर हैं, खाना न पचना आदि बिमारियो का सामना करना पड़ रहा है।

आज जन सामान्य के बीच एक आम धारणा बाजार में बनी हुई है कि मिलने वाली में हर चीज में कुछ ना कुछ उत्पाद जरूर होता है। जनसामान्य की चिंता स्वाभाविक ही है।

आज उत्पाद का सबसे अधिक हमारे सामान की ज़रूरत पर ही पड़ रहा है। सम्पूर्ण देश में नकली उत्पादी खाद्य-पदार्थों की भरमार हो गयी है। इनमें दूध नकली, नकली घी, नकली तेल, नकली चायपत्ती आदि सब कुछ धड़ल्ले से बिक रहा है। अगर किसी को ऐसी ही बीमारियाँ होती हैं तो समस्या और भी बुरी होती है, क्योंकि जीवन रक्षक दवाइयाँ भी नकली ही बिक रही हैं।

एक अनुमान के अनुसार बाजार में लगभग 30 से 40 प्रतिशत समान उत्पाद उपलब्ध हैं। खाद्य पदार्थों में खाद्य पदार्थों के सामान का प्रयोग करने वाले लोग लोगों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं और खाद्य पदार्थों में सामानों का प्रयोग करने वाले लोग लोगों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। सबसे पहले प्रदर्शन के सबसे भव्य मामले कोल्ड ड्रिंक्स को लेते हैं।

हमारे देश में कोल्ड ड्रिंक्स में मिलाए जाने वाले से कोई मानक निर्धारित नहीं होता है। असली कोल्ड ड्रिंक्स में पाए जाने वाले लिडेन, डीडीटी मैलेथियन और क्लोर पैरीफॉस को कैंसर, स्नायु, जनरेशन एसोसिएटेड बीमारी और प्रतिरक्षित तंत्र में जिम्मेदार माना जाता है।

कोल्ड ड्रिंक के निर्माण के दौरान फास्फोरस एसिड डाला जाता है। फास्फोरस एसिड एक ऐसा अम्ल है जो दांतों पर सीधा प्रभाव डालता है। इसमें आयरन तक को गलाने की क्षमता होती है। इसी तरह का मिश्रण इथिलिन ग्लाइकोल रसायन पानी को शून्य डिग्री तक जमने नहीं देता है। इसे आम भाषा में मीठा जहर तक कहा जाता है।

                                    

इसी प्रकार कार्बाेलिक, एरिथार्बिक और बेंजोइल एसिड मिश्रित कोल्ड ड्रिंक्स को अति अम्लता (लगभग 2.4 मिश्रित) प्रदान करते हैं, जिससे पेट में जलन, खट्टी डकारें, दिमाग में कमजोरी, चिड़चिड़ापन, एसिडिटी और हृदय रोगों के विकास में रुकावट पैदा होती है। इसी प्रकार प्रत्येक कोल्ड ड्रिंक में 0.4 पी.पी.एस. सीसा डाला जाता है जो स्नायु, ब्रेन, गुड़ा, कार्बाेहाइड्रेट और घटकों के लिए घातक है। इसी तरह की मिली हुई कैफीन की मात्रा से अनिद्रा और सिरदर्द की समस्या उत्पन्न होती है।

सीएसई के निदेशक नारायन नारायण के अनुसार, पेप्सी के सभी ब्रांडों में औसत प्रति लीटर तरल पदार्थ में 0.0180 कोल्ड ड्रिंक और कोका कोला में 0.0150 कोल्ड ड्रिंक की मात्रा मिली, जबकि ईसीई द्वारा प्रति लीटर लिक्विडिटी में 0.005 प्लांट्स की मात्रा निकली। मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामले में दूध का हाल भी ठंडा पेय पदार्थ जैसा ही हो गया है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024-25 में देशभर में कुल 6,47,408 खाद्य नमूनों की लैब में जांच की गई, जिनमें से 34,388 हजार तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। दिलचस्प बात यह कि मिलावट के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष स्थान पर रहा। मिलावट के सबसे अधिक मामले उत्तर प्रदेश से ही प्राप्त हुए हैं। खाद्य सुरक्षा का सवाल सिर्फ ऐसी मिलावट पकड़ने तक सीमित नहीं है, जिससे खाद्य पदार्थ असुरक्षित हो जाते हैं। बाजार में तय गुणवत्ता स्तर से कम वाले उत्पाद भी एक बड़ी चिंता का विषय हैं। दूध, पनीर, मावा से लेकर मिठाइयों तक की गुणवत्ता को लेकर समय समय पर गंभीर रूप से सवाल उठाए जाते रहे हैं।

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लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।