
एक हजार रुपये में टीबी से कैसे लड़ेंगे? Publish Date : 16/10/2026
एक हजार रुपये में टीबी से कैसे लड़ेंगे?
डॉ0 दिव्श्संशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
टीबी से जंग लड़ रहे लोगों के सामने बड़ा सवाल कुपोषण से लड़ना है। टीबी होने पर मरीजों को अधिक से अधिक प्रोटीन व पौष्टिक भोजन की जरूरत होती है। लेकिन सरकार की तरफ से मिल रही निक्षय योजना की सहायता राशि मरीज को कुपोषण से लड़ने में कम साबित हो रही है।
लांसेट ग्लोबल हेल्थ की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2023 में कुपोषण से बचाव कर भारत में टीबी के सात लाख मामलों को रोका जा सकता था। टीबी के निदान में सबसे सपोर्टिव थेरेपी न्यूट्रिशन ही है। लेकिन बढ़ती महंगाई के बीच जहां दाल, सब्जी, फल से लेकर दूध की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है, ऐसे में हर महीने टीबी मरीज को मिलने वाले एक हजार रुपये की सहायता राशि प्रोटीन डाइट के लिए बहुत कम है।

अगर एक टीबी मरीज की मासिक प्रोटीन आय का न्यूनतम खर्चा निकालें तो उसे हर महीने कम से कम 2 से 3 हजार रुपयों की जरूरत होती है। टीबी मरीजों का सर्वे करें तो अधिकांश टीबी मरीज गरीब घरों के होते हैं, लेकिन गरीबी के कारण ऐसे गरीब मरीज पौष्टिक भोजन नहीं कर पाते हैं। इसी को देखते हुए सरकार ने निक्षय पोषण योजना की शुरुआत की है।
भारत में टीबी के 40 प्रतिशत मामले कुपोषण या अस्वस्थ खानपान के चलते होते हैं। अगर भोजन में सामान्य तौर पर दाल, तेल, चावल और सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी ध्यान रखा जाए, तो टीबी के जोखिम 49 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। केंद्र सरकार की निक्षय योजना में टीबी मरीज को पहले 500 रुपया महीना सहायता राशि दी जाती थी।
हाल में सरकार ने इसे बढ़ाकर एक हजार रुपया किया है। लेकिन टीबी जैसी गंभीर बीमारी को देखते हुए यह राशि बहुत कम है। बेशक केंद्र सरकार ने टीबी मरीजों को पोषण युक्त भोजन के लिए दी जाने वाली निक्षय पोषण योजना की राशि में वृद्धि कर दी है। वृद्धि के बाद टीबी मरीजों को निक्षय योजना के तहत एक हजार रुपये हर महीने मिलेंगे। पूर्व में इस मद में पांच सौ रुपये ही मिलते थे। जो एक मरीज को 30 दिन के एक ग्लास दूध का खर्चा निकालने में भी कम थे। टीबी होने पर मरीजों को अधिक से अधिक प्रोटीन व पौष्टिक भोजन की जरूरत होती है।

टीबी के मरीज को स्वस्थ होने के लिए जितनी जरूरत दवाओं, देखभाल और आराम की है, उतना ही उसके लिए अच्छा पौष्टिक भोजन भी जरूरी है। दूध, दाल, मूंगफली, फल, पनीर, अंडा ये खाद्य पदार्थ टीबी मरीज की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। शरीर में नए ऊतकों को बनाकर टीबी के कीटाणु से लड़ने में कारगर साबित होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार टीबी मरीज तभी सही होगा जब उसे दवा के साथ अच्छा भोजन मिले।
टीबी से पहले उसे कुपोषण को दूर भगाना पड़ेगा। जो उच्चगुणवत्ता युक्त खाने से संभव है। मरीज का वजन नियंत्रित रहेगा तभी उसका शरीर टीबी के कीटाणु का सामना कर पाएगा।
सरकार की तरफ से पहले ही निक्षय योजना में टीबी मरीज को डाइट के लिए मिलने वाली सहायता राशि कम है। लेकिन ये एक हजार रुपए भी हर महीने मरीज को नहीं मिल पा रहे हैं। देश के तमाम राज्यों के कई जिलों से आए दिन ऐसी खबरें सामने आती हैं, जब मरीजों को दो से तीन महीने हुए और सहायता राशि नहीं मिली।
ऐसे में गरीब तबके के मरीजों के सामने बड़ा संकट धन का होता है। जब उन्हें दवा तो मुफ्त मिल जाती है लेकिन खाने के लिए पैसे नहीं होते। जो पैसा सरकार दे रही है वो भी समय पर उनके खाते में नहीं आ पाता। कभी सॉफ्टवेयर तो कभी बजट की दिक्कत के चलते उनके खाते में डाइट की राशि नहीं पहुंचती।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार टीबी मरीज तभी सही होगा जब उसे दवा के साथ अच्छा भोजन मिले। टीबी से पहले उसे कुपोषण को दूर भगाना पड़ेगा। जो उच्चगुणवत्ता युक्त खाने से संभव है। मरीज का वजन नियंत्रित रहेगा तभी उसका शरीर टीबी के कीटाणु का सामना कर पाएगा।
हालांकि टीबी की मुख्य दवाएं सरकारी कार्यक्रमों से प्राप्त की जा सकती हैं, लेकिन मरीजों को अक्सर लिवर की सुरक्षा, तंत्रिका संबंधी रोग या अन्य दुष्प्रभावों के लिए अतिरिक्त दवाओं की आवश्यकता होती है। ये सहायक उपचार आमतौर पर सार्वजनिक आपूर्ति के अंतर्गत नहीं आते हैं और इनका भुगतान मरीजों को स्वयं करना पड़ता है। यह अक्सर सबसे बड़ा अप्रत्यक्ष खर्च होता है।
टीबी का इलाज कई महीनों तक चलता है। मरीजों को समीक्षा, परीक्षण या इंजेक्शन के लिए बार-बार डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है। दिहाड़ी मजदूर और स्वरोजगार करने वाले लोग अक्सर इस दौरान अपनी आय खो देते हैं। यात्रा खर्च-विशेष रूप से शहर के बाहर से आने वालों के लिए-लगातार बढ़ता जाता है। दवा प्रतिरोधी टीबी के मामलों में, लागत में काफी वृद्धि होती है।
हालांकि सरकारी कार्यक्रमों के तहत उपचार उपलब्ध है, लेकिन इन मामलों में लंबे समय तक उपचार, अधिक जांच, गहन निगरानी और कभी-कभी अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है। निदान या उपचार में देरी होने पर, वित्तीय और शारीरिक दोनों प्रकार के खर्च में तेजी से वृद्धि होती है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।