
मरीजों की खोई आवाज लौटाएगी स्मार्ट डिवाइस Publish Date : 09/10/2026
मरीजों की खोई आवाज लौटाएगी स्मार्ट डिवाइस
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
-
ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मानव पर भी किया प्रयोग
स्ट्रोक, तंत्रिका तंत्र और दिमाग से जुड़ी दूसरी गंभीर बीमारियों के कारण बोलने की क्षमता खो देने वाले मरीज भी अब बोल सकेंगे और एक सामान्य जीवन व्यतीत कर सकेंगे।
वैज्ञानिकों ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (बीसीआई) नामक नई तकनीक विकसित की है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसके तकनीक के माध्यम से दिमाग में पैदा होने वाले संकेतों को पढ़कर कंप्यूटर के द्वारा मानव की आवाज में बदला जा सकता है।
अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पहली बार मानव के ऊपर किए प्रयोग में यह दिखाया है कि हर मरीज के लिए पूरी तरह अलग सिस्टम तैयार करने के बजाय कई मरीजों के दिमाग से मिले डाटा को मिलाकर एक साझा सिस्टम तैयार किया जा सकता है।
दिमाग की हरकत से सीखेगी मशीनः ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस तकनीक में मरीज के दिमाग से रिकॉर्डिंग की जाती है। उस डाटा की मदद से एक कंप्यूटर मॉडल को प्रशिक्षित किया जाता है। हालांकि, अभी बड़ी समस्या यह है कि हर व्यक्ति के दिमाग में बोलने से जुड़ी गतिविधि थोड़ी अलग होती है।
इसलिए आमतौर पर हर मरीज के लिए काफी मात्रा में व्यक्तिगत डाटा एकत्र करना पड़ता है। इसमें समय लगता है और कई मामलों में यह प्रक्रिया जटिल और महंगी हो सकती है। यही वजह है कि इस तकनीक को बड़ी संख्या में मरीजों तक पहुंचाना मुश्किल रहा है। वैज्ञानिकों ने उन मरीजों के दिमाग से ब्रेन-रिजॉल्यूशन रिकॉर्डिंग हासिल की जिनको न्यूरोसर्जरी हो रही थी। इस बीच शोधकर्ताओं ने अलग-अलग लोगों के दिमाग में बोलने से जुड़ी गतिविधियों के बीच समान पैटर्न खोजे।
दिमाग में चल रही चीजों को पढ़ लेगा सिस्टम
अगर यह तरीका सफल रहता है तो भविष्य में स्ट्रोक या अन्य बीमारियों के कारण बोलने में असमर्थ लोगों के लिए खास सिस्टम तैयार करना ज्यादा तेज और आसान हो सकता है। मरीज अपने दिमाग में बोलने की कोशिश करें और सिस्टम उस गतिविधि को पहचानकर कंप्यूटर से आवाज निकाल सकेगा। हर नए मरीज के लिए शुरुआत से पूरा सिस्टम प्रशिक्षित करने की जरूरत कम होगी।
भविश्य में क्या हो सकता है?
वैज्ञानिकों की कोशिश है कि भविष्य में ऐसे सिस्टम बनाए जाएं जिन्हें मरीज के लिए जल्दी तैयार किया जा सके और आसानी से ज्यादा आबादी में इस्तेमाल किया जा सके। इससे सिर्फ बोलने की क्षमता खो चुके मरीजों को संवाद करने में मदद नहीं मिल सकेगी, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और न्यूरोसाइंस के बीच एक नई दिशा भी खुल सकती है। वैज्ञानिक समझ पाएंगे कि हमारा बोलना किस तरह दिमागी संकेतों से जुड़ा हुआ है।
दिमाग में पैदा होने वाले संकेत मशीनों की आवाज में बदलेंगे
- स्ट्रोक और दिमाग से जुड़ी अन्य बीमारियों वाले मरीजों को होगा इसका फायदा

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।