
ताकि भावी शिशु न हो दिव्यांग Publish Date : 24/09/2026
ताकि भावी शिशु न हो दिव्यांग
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
आजकल आईवीएफ से संबंधित दो तकनीकें प्रचलन में हैं जिनमें- ‘पी जी डी’ और ‘पी जी एस’ के प्रचलन में आने से दिव्यांग दंपति भी स्वस्थ बच्चे के पिता बन सकते हैं और वह एक हर तरह से स्वस्थ शिशु के।
जो लोग अपनी किन्हीं शारीरिक कमियों के कारण माता-पिता नहीं बन सकते हैं, उनके लिए आज इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ या टेस्ट ट्यूब बेबी) किसी वरदान से कम नहीं है, लेकिन अब इससे आगे की टेक्नोलॉजी भी प्रचलन में आ चुकी है। जो माता-पिता दिव्यांग हैं, वे इस बात को लेकर डरते हैं कि उनके बच्चों में उनके जैसी परेशानियां उत्पन्न न हो जाएं। ऐसे दिव्यांग दंपतियों के लिए दो टेक्नोलॉजी आईवीएफ से संबंधित हैं। पहली तकनीक है- ‘पी जी डी’ और दूसरी है ‘पी जी एस’।
इन दोनों तकनीकों को आईवीएफ के क्षेत्र में बहुत अच्छी तकनीक माना जाता है और इसके अच्छे परिणाम भी देखने को मिले हैं। यह एक तरह का जेनेटिक डायग्नोसिस है, जिसमें आईवीएफ की प्रक्रिया के दौरान वे भ्रूण निकाल लिए जाते हैं, जो किसी प्रकार के विकार से ग्रस्त होते हैं।
पिता के अंशों को मां के अंशों में मिलाने के बाद भ्रूण की स्क्रीनिंग की जाती है। इसकी प्रक्रिया आईवीएफ तकनीक के साथ ही चलती रहती है। मां और पिता के अंश मिलने के बाद जो भ्रूण बनता है, उसमें जो भी श्रेष्ठ हैं अर्थात जिनमें जेनेटिक विकार न हो, उन्हें प्रत्यारोपण के लिए तैयार कर लिया जाता है।
क्या है पीजीडी
भ्रूण को गर्भाशय में स्थानांतरित करने से पहले यदि इस टेस्ट को करा लिया जाता है तो बच्चे में किसी वंशानुगत दोष जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस, मेटाबोलिक सिंड्रोम, थैलेसीमिया आदि जैसी गंभीर बीमारियां होने की आशंका खत्म हो जाती है। मान लीजिए एक दंपति है, जिसमें कोई जेनेटिक विकार या दोष है। दोनों को इस बात का भय है कि उनके बच्चे में भी इस तरह का विकार उत्पन्न न हो जाए, इस स्थिति को दूर करने के लिए यह तकनीक सर्वश्रेष्ठ सिद्व होती है।
पीजीएस
कई बार आईवीएफ का चयन करने वाले वाले दंपतियों के मन में इस बात को आशंका रहती है कि बच्चे में कोई पैदाइशी विकार न हो, कहीं गर्भपात न हो या जुड़वा से ज्यादा बच्चे न हों। ऐसे में ‘ पी जी एस ’ तकनीक की सहायता ली जाती है। जब भ्रूण को स्थानांतरित किया जाता है, उसके पहले इसकी स्क्रीनिंग की जाती है, इससे खराब भ्रूण का पता चल जाता है और इससे गर्भ धारण करने की संभावना बढ़ जाती है। इस तकनीक में उस भ्रूण का चयन किया जाता है, जिसमें क्रोमोसोम्स की संख्या सही होती है।
इस कारण गर्भधारण की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस तकनीक से वे महिलाएं भी लाभान्वित हो सकती हैं जिनका अतीत में कई बार गर्भपात हो चुका होता है।
लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
