
वजन दे रहा मानसिक तनाव Publish Date : 18/07/2026
वजन दे रहा मानसिक तनाव
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
युवाओं के बीच वजन से जुड़ी चिंता अब केवल सौंदर्य का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर और तेजी से उभरती स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। इससे वे मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं।
भारत में युवाओं के बीच बॉडी इमेज से जुड़ी चिंता अब केवल सौंदर्य का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर और तेजी से उभरती मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आसीएमआर) के संयुक्त अध्ययन में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि शरीर के वजन के दोनों छोर-अत्यधिक कम वजन और मोटापे को लेकर युवा सबसे अधिक मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं। जर्नल ऑफ एजुकेशन एंड हेल्थ प्रमोशन में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, यह अध्ययन 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के एम्स की ओपीडी में आने वाले 1,071 युवाओं पर किया गया।

सिर्फ वजन घटाना समाधान नहीं: एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. पीयूष रंजन का कहना है कि वजन से जुड़ी समस्याओं को केवल डाइट और एक्सरसाइज से नहीं सुलझाया जा सकता। उनके शब्दों में, 'वेट मैनेजमेंट केवल वजन कम करने तक सीमित नहीं है। मानसिक और भावनात्मक समस्याओं को नजरअंदाज' करने की वजह से ही कई युवा बीच में ही लाइफस्टाइल प्रोग्राम छोड़ देते हैं। अगर स्थायी परिणाम चाहिए तो मनोवैज्ञानिक जांच को पोषण देखभाल का हिस्सा बनाना जरूरी है।'
बीच में छोड देते हैं: इस अध्ययन की अगुवाई करने वाली पोषण विशेषज्ञ और पीएचडी स्कॉलर वारिशा अनवर के अनुसार, कई युवा वजन घटाने या बढ़ाने के कार्यक्रम पूरे उत्साह से शुरू करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद मानसिक थकान, बॉडी इमेज को लेकर शर्म, पढ़ाई का दबाव और जीवन के इस संक्रमणकाल की चुनौतियां, उन्हें पीछे खींच लेती हैं। अध्ययन के अनुसार, भारत में वजन प्रबंधन अब भी कैलोरी-केंद्रित है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य की भूमिका को लगभग नजरअंदाज किया जाता है।
अलग-अलग वजहें: शोध में यह भी सामने आया कि बॉडी इमेज डिस्ट्रेस का स्वरूप वजन के अनुसार बदलता है। मोटापे से ग्रस्त युवाओं में आत्मविश्वास की कमी, खुद को लेकर झिझक और सामाजिक असहजता अधिक पाई गई। कम वजन वाले युवाओं में चिंता, अकेलापन, शर्म और सामाजिक अलगाव की भावना ज्यादा दिखी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है किआधे से अधिक युवा हर समय अपने वजन को लेकर सचेत रहते हैं। हर तीन में से एक युवा खुद को पहले से कम आत्मविश्वासी महसूस करता है। हर चार में से एक युवा को लगता है कि लोग उसे उसके शरीर के आधार पर जज करते हैं।
आंकड़े और अनुभव: युवा जिनका वजन शुरू से ही कम है, वह रोजमर्रा के ताने से सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं। समाज के लोग सोचते हैं। ऐसा कर वे मदद कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं होता कि ये बातें सामने, वाले को कितना असहज और असुरक्षित महसूस कराती हैं। वहीं दूसरी ओर, अचानक किसी वजह से जिन युवाओं का वजन बढ़ गया, उन्होंने अपना आत्मविश्वास खो दिया।
मानक और सामाजिक दबाव: शोधकर्ताओं का मानना है कि सोशल मीडिया, फिल्मों और समाज द्वारा गढ़े गए अवास्तविक सौंदर्य मानक युवाओं में गहरी हीन भावना पैदा कर रहे हैं। वजन की समस्या न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि इलाज के प्रति युवाओं की प्रतिबद्धता और लंबे समय तक स्वस्थ रहने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। एम्स के मेटाबॉलिक रिसर्च ग्रुप के प्रमुख प्रोफेसर नवल के विक्रम के अनुसार, स्कूलों और कॉलेजों में शुरुआती स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग और बॉडी इमेज के प्रति संवेदनशील काउंसलिंग जैसे कदम उठाए जाने चाहिए। एम्स-आईसीएमआर का यह अध्ययन एक स्पष्ट संकेत देता है कि शरीर का वजन केवल शारीरिक स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह युवाओं के मानसिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहा है। जब तक वजन प्रबंधन को मानसिक स्वास्थ्य के साथ जोड़कर नहीं देखा जाएगा, तब तक न तो युवा पूरी तरह स्वस्थ हो पाएंगे और न ही मौजूदा स्वास्थ्य कार्यक्रम अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे।
आंकड़े जो बढ़ाते हैं चिंता
अध्ययन में शामिल युवाओं में से करीब 25 प्रतिशत मोटापे, जबकि 11 प्रतिशत कम वजन वाले पाए गए। इनमें से अधिकांश छात्र थे और मध्यम आय वर्ग के परिवारों से थे। रिपोर्ट के अनुसार, मोटापे से ग्रस्त 49 प्रतिशत युवाओं में बॉडी इमेज को लेकर गंभीर चिंता पाई गई, वहीं कम वजन वाले 47 प्रतिशत युवाओं ने भी इसी स्तर की मानसिक परेशानी बताई। विशेषज्ञों के अनुसार, कम वजन वाले युवा सामान्य वजन वालों की तुलना में लगभग दोगुना, जबकि मोटापे से ग्रस्त युवा तीन गुना अधिक बॉडी इमेज डिस्ट्रेस का सामना कर रहे हैं।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
