प्री-एक्लेमप्सिया के चलते होती है मां बनने में परेशानीं      Publish Date : 12/07/2026

प्री-एक्लेमप्सिया के चलते होती है मां बनने में परेशानीं

                                                                                                डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

आज हम महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी एक ऐसी ही समस्या के बारे में बात करेंगे जो उनके मां बनने के सपने को और मुश्किल बना देती है। एक्सपर्ट्स से इस बारे में हम प्री-एक्लेम्पसिया के बारे में जानेंगे, ताकि महिलाएं इस समस्या के बारे में विस्तार से जान सकें।

गर्भावस्था के दौरान महिला को कई शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरना पड़ता है। इस दौरान कुछ लक्षणों के प्रति सतर्क रहना भी जरूरी है, जिनमें से एक है, प्री-एक्लेमप्सिया, यानी गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर बढ़ जाना। यह अचानक हो सकता है और अगर फौरन इसका इलाज न किया जाए, तो यह गंभीर रूप ले सकता है। प्री-एक्लेमप्सिया आमतौर से गर्भ के 20वें हफ्ते में शुरू होता है। इसका प्रभाव माँ और शिशु, दोनों पर पड़ता है। यह कुछ ही दिनों या घंटों में काफी बढ़ सकता है। प्री-एक्लेमप्सिया की चिंताजनक बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षण काफी मामूली महसूस होते हैं, जिन्हें नजरंदाज करना आसान होता है और इस वजह से निदान एवं इलाज में अक्सर देर हो जाती है।

प्री-एक्लेमप्सिया क्या है?

                                   

प्री-एक्लेमप्सिया तब होता है जब गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर के साथ लिवर, किडनी या प्लेसेंटा आदि अंगों पर भी दबाव के लक्षण महसूस हों। यह क्यों होता है, इसका सटीक कारण तो अभी पता नहीं चला है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्लेसेंटा में रक्तवाहिनियों के खराब विकास के कारण होता है। यदि इसे नियंत्रित न किया जाए, तो प्री-एक्लेमप्सिया के कारण महत्वपूर्ण अंगों को होने वाला खून का प्रवाह कम हो जाता है, जिससे शिशु के विकास और ऑक्सीजन की आपूर्ति पर असर पड़ता है।

इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए -

  • लगातार सिर में दर्द रहना।
  • चेहरे, हाथों या पैरों में सूजन।
  • वजन का अचानक बढ़ना।
  • धुंधला विज़न या लाईट के प्रति सेंसिटिविटी।
  • पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द।
  • गर्भावस्था के अंतिम महीनों में मितली या उल्टी।
  • ब्लड प्रेशर ज्यादा रहना।

                          

प्री-एक्लेमप्सिया का खतरा कब बढ़ता है

अगर गर्भ पहली बार धारण किया हो या ट्विन या ट्रिपलेट्स हों, तो प्री-एक्लेमप्सिया होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, मोटापा, डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी रोग या परिवार में पहले किसी को प्री-एक्लेमप्सिया हुआ होना भी इसकी संभावना बढ़ाते हैं। अगर महिला की उम्र 35 साल से अधिक है, तब भी इसका जोखिम ज्यादा होता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान नियमित रूप से जांच कराते रहना जरूरी होता है क्योंकि प्री-एक्लेमप्सिया बहुत तेजी से बिगड़ सकता है।

प्री-एक्लेमप्सिया की जांच

जांच में डॉक्टर ब्लड प्रेशर, मूत्र में प्रोटीन लेवल और शिशु के विकास की जांच करते हैं, ताकि किन्हीं भी जटिलताओं को तुरंत पहचाना जा सके। इससे उचित इलाज के साथ सही समय पर डिलीवरी कराने का निर्णय लेने में मदद मिलती है। अगर कोई जोखिम वाली स्थिति पैदा होती है, तो मां और शिशु की हालत को देखते हुए डिलीवरी या तो सामान्य कराई जा सकती है या फिर सिजेरियन (सी-सेक्शन)। गंभीर मामलों में, खासकर जब मां या शिशु को खतरा हो, तब डॉक्टर समय से पहले डिलीवरी कराने का निर्णय भी ले सकते हैं।

प्री-एक्लेमप्सिया का मतलब केवल गर्भावस्था के दौरान होने वाला हाई ब्लड प्रेशर नहीं है। यह एक जानलेवा स्थिति है, जिसका उचित इलाज कराया जाना चाहिए, नहीं तो मां और शिशु को खतरा हो सकता है। माँ और शिशु के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए इसके लक्षणों पर नजर रखना, समय-समय पर डॉक्टर से जांच करवाना और अगर कोई भी संशय हो, तो तुरंत इमरजेंसी मेडिकल केयर प्राप्त करना जरूरी होता है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।