मधुमेह और फैटी लिवर का आपसी सम्बन्ध      Publish Date : 04/07/2026

 मधुमेह और फैटी लिवर का आपसी सम्बन्ध

                                                                                                  डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

लिवर सेल में वसा (फैट) का जमाव होन ही फैटी लिवर कहलाता है। इस समस्या से लिवर में सूजन अथवा घाव की समस्या हो जाती है और लिवर धीरे-धीरे कड़ा (सख्त) होने लगता और लिवर अपना कार्य सुचारू रूप से करना भी बन्द कर सकता है। लेकिन ऐसे में यदि किसी मरीज को टाईप-2 डायबिटीज है तो उसके लिवर में वसा के जमाव की आशंका बढ़ जाती है। इसके साथ ही उस मरीज के रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी बढ़ने लगती है, जिसके चलते दिल के रोगों का खतरा भी काफी हद तक बढ़ सकता है।

                                    

विशेषज्ञों के अनुसार, मधुमेह की नियमित रूप से निगरानी करना बहुत आवश्यक है। विशेष रूप से यदि कोई व्यक्ति टाईप-2 डायबिटीज का मरीज है तो उसे अपने लिवर के प्रति विशेष रूप से सजगता बरतनी चाहिए। पाचन की समस्याएं, पेट में दर्द और पीलिया आदि के होने पर उसे तुरंत अपने डॉक्टर से मिलना चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा न किया गया तो स्थिति गम्भीर भी हो सकती है।

नॉन एल्कोहॉलिक फैटी लिवर

                                   

आमतौर पर शराब को फैटी लिवर के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार माना जाता है, परन्तु इसके अतिरिक्त लोगों में ओवर वेट, मोटापा और डायबिटीज आदि को भी फैटी लिवर के लिए सबसे बड़े कारक के रूप में जाना जाता है। ऐसे में यदि आप शराब का सेवन नहीं भी कर रहें हैं तो भी आपको फैटी लिवर हाने की पूरी सम्भावना रहती है। ऐसे में यदि समय के रहते इस समस्या का उपचार नहीं लिया गया तो यह समस्या सिरोसिस ऑफ लिवर में भी बदल सकती है। लिवर सिरोसिस, लिवर के पूरी तरह से डैमेज होने की अवस्था होती है और इस अवस्था में केवल लिवर ट्रांसप्लांट एकमात्र उपाय बचता है। लिवर ट्रांसप्लांट काफी महंगा होता है और लिवर ट्रांसप्लांट के लिए किसी उपयुक्त डोनर की तलाश करना भी एक बहुत बड़ी समस्या है। इस समस्या से बचने का एक अच्छा और सस्ता उपाय, लाइफ स्टाइल में अपेक्षित सुधार के साथ अपने खान-पान में सुधार करना है।

फैटी लिवर के लक्षणः

नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर की समस्या में आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। हालांकि, इस समस्या के दौरान यह निम्न तीन लक्षणों का अनुभव होता है तो प्रभावित व्यक्ति को सावधान हो जाना चाहिएः-

  • बेवजह थकान होना।

  • दाएं एब्डोमिन के ऊपरी हिस्से में दर्द।

  • अचानक से वजन का कम होना।

  • डायबिटीज के दौरान फैटी लिवर की समस्या से बचाव के उपाय

  • शराब का सेवन बिलकुल बन्द कर देना चाहिए।

  • मोटापे को कम करने का प्रयास जारी रखें।

  • विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही आहार ग्रहण करें।

  • कम से कम 30 मिनट तक हल्के व्यायाम प्रतिदिन अवश्य करें।

  • जंक फूड्स से परहेज करें, क्योंकि इनमें वसा की मात्रा अधिक होती है। आपके आहार में जितनी अधिक वसा होगी फैटी लिवर के होने की आशंका भी उतीनी ही अधिक होगी।

  • अपनी आहार प्रणाली में फलों को शामिल करें।

  • लिवर को हानि पहुँचाने वाली दवाओं का सेवन बहुत कम करें।

शराब का सेवन करने से डायबिटिक पेशेन्ट्स की समस्या बढ़ती है

शराब तो अपने आप में ही खतरनाक है, लेकिन डायबिटीज में इसके प्रभाव अधिक नकारात्मक होते हैं। इसीके चलते छाबिटीज के मरीज को शराब का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। शराब से डायबिटीज के मरीज को होने वाले नुकसान-

  • शराब में कैलोरी अधिक होती है और इसके साथ ली जाने वाली डाइट भी हैवी होती है, जिसके चलते डाइट कन्ट्रोल प्रभावित होता है।

  • डायबिटीज की कुछ दवाओं का शराब के साथ विषाक्त प्रभाव भी हो सकते हैं।

  • डायबिटीज में शराब का सेवन करने से कभी-कभी कीटोसिस एवं हाइपोग्लाइसीमिया भी हो सकता है।

  • शराब हमारे अग्नाश्य को हानि पहुँचाती है और इससे प्रैंक्रिएटाइटिस हो सकता है, जिससे ब्लड-शुगर का स्तर अनियंत्रित हो जाता है। एल्कोहल के कारण लिवर सिरोसिस की परेशानी हो जाने पर डायबिटीज का उपचार करना भी कठिन हो जाता है।

  • शराब का सेवन करने से तंत्रिकाओं पर भी दुष्प्रभाव होते हैं, जिससे डायबिटिक न्यूरोपैथी की समस्या का जन्म होता है।

उपरोक्त कारणों से ही डॉक्टर्स डायबिटिक पेशेन्ट्स को नो स्मोक, नो एल्कोहॉल की सलाह देते हैं, ताकि उनके उपचार के दौरान कोई किसी भी प्रकार की रूकावट नहीं आने पाए और उनकी ब्लड-शुगर का स्तर नियंत्रित बना रहे।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।