
क्या प्रेग्नेंसी में एंग्जायटी से बच्चे के ब्रेन पर असर पड़ता है? Publish Date : 02/07/2026
क्या प्रेग्नेंसी में एंग्जायटी से बच्चे के ब्रेन पर असर पड़ता है?
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते है, जिसका प्रभाव उनकी मेंटल हेल्थ पर भी पड़ता है। कुछ महिलाओं को इस दौरान एंग्जायटी होती है, लेकिन क्या इसका असर बच्चों के ब्रेन पर भी पड़ सकता है। इस विषय पर आपको महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर रहें हैं हमारे डॉक्टर दिव्यांशु सेंगर-
प्रेग्नेंसी केवल एक शरीर में होने वाला बदलाव मात्र ही नहीं है, बल्कि इससे मानसिक और भावनात्मक बदलावों भी होता है। कई महिलाओं में इस दौरान चिंता, डर और एंग्जायटी महसूस की जाती है। कभी डिलीवरी को लेकर डर बना रहता है, तो कभी बच्चे की हेल्थ को लेकर उनका मन परेशान रहता है। ऐसे में एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या प्रेग्नेंसी में होने वाली एंग्जायटी का असर बच्चे के ब्रेन पर भी पड़ सकता है?

प्यारे लाल शर्मा, जिला अस्पताल, मेरठ के मेडिकल ऑफिसर डॉ0 दिव्यांशु सेंगर का कहना है कि हल्की चिंता एक सामान्य बात मानी जाती है, लेकिन लंबे समय तक बनी रहने वाली गंभीर एंग्जायटी मां और बच्चे दोनों की सेहत को प्रभावित करती है। अगर समय रहते इसे समझा और संभाला नहीं जाता, तो इसका असर बच्चे के मानसिक विकास पर भी देखा जाता है।
प्रेग्नेंसी में एंग्जायटी क्यों बढ़ती है?
प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में कई हॉर्मोनल बदलाव होते हैं। इसी वजह से मूड में उतार-चढ़ाव महसूस किया जाता है। इसके अलावा कई दूसरी बातें भी चिंता बढ़ाने का कारण बनती हैं, जैसे-
40+ के बाद कंसीव करने पर किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
- पहली बार मां बनने का डर।
- आर्थिक तनाव।
- परिवार या रिश्तों में तनाव।
- पहले मिसकैरेज का अनुभव।
- नींद पूरी न होना।
- लगातार थकान महसूस होना।
- सोशल मीडिया या इंटरनेट से मिली डरावनी जानकारी
इन कारणों के चलते महिला का दिमाग लगातार तनाव की स्थिति में बना रहता है।
एंग्जायटी का बच्चे के ब्रेन पर कैसे असर पड़ता है?

जब मां लंबे समय तक तनाव या एंग्जायटी में रहती है, तब शरीर में स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसोल ज्यादा बनने लगता है। यह हॉर्मोन प्लेसेंटा के जरिए बच्चे तक पहुंचता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर कॉर्टिसोल का स्तर लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो बच्चे के ब्रेन डेवलपमेंट पर असर देखा जाता है। कुछ रिसर्च में यह पाया जाता है कि ज्यादा तनाव की स्थिति में पैदा होने वाले बच्चों में आगे चलकर कुछ परेशानियां हो सकती हैं, जैसे-
- ध्यान लगाने में परेशानी।
- चिड़चिड़ापन महसूस होना।
- ज्यादा रोना।
- नींद की समस्या का होना।
- नई चीजें सीखने में दिक्कत होना।
- भावनात्मक अस्थिरता, इत्यादि का होना।
बच्चों में इस तरह की परेशानी हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं होता कि हर तनावग्रस्त मां का बच्चा प्रभावित ही होगा। यहां एंग्जायटी की गंभीरता और उसकी अवधि बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है।
कौन सी एंग्जायटी ज्यादा खतरनाक मानी जाती है?
हर चिंता नुकसानदायक नहीं होती। हल्का तनाव सामान्य माना जाता है। लेकिन अगर किसी महिला में ये लक्षण लगातार बने रहते हैं, तो इसे गंभीर एंग्जायटी माना जाता हैः
- हर समय डर महसूस होना।
- बिना वजह घबराहट होना।
- दिल की धड़कन तेज होना।
- बार-बार रोना।
- नींद न आना।
- किसी काम में मन न लगना।
- नकारात्मक सोच बढ़ जाना।
अगर ये लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा बने रहते हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी माना जाता है। क्या मां की मानसिक स्थिति बच्चे के व्यवहार को भी प्रभावित करती है?
डॉक्टर कहते हैं कि गर्भ में बच्चा सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं बढ़ता, बल्कि वह आसपास के माहौल और मां की भावनाओं से भी प्रभावित होता है। अगर मां लगातार तनाव में रहती है, तो उसका असर बच्चे के नर्वस सिस्टम पर भी देखा जाता है। कुछ बच्चों में जन्म के बाद ज्यादा चौंकना, बेचैनी या मूड संबंधी बदलाव महसूस किए जाते हैं। हालांकि सही देखभाल और पॉजिटिव माहौल से इन प्रभावों को काफी हद तक कम किया जाता है।
एंग्जायटी को कैसे कंट्रोल किया जाता है?
प्रेग्नेंसी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना बहुत जरूरी माना जाता है। इसके लिए कुछ आसान उपाय मददगार साबित होते हैं-
पर्याप्त नींद लें- नींद पूरी होने से दिमाग शांत रहता है और तनाव कम महसूस किया जाता है।
नियमित हल्की एक्सरसाइज करें- वॉक, प्रेग्नेंसी योग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से मूड बेहतर बनाया जाता है।
मन की बात शेयर करें- परिवार, पार्टनर या करीबी दोस्त से बात करने पर मानसिक दबाव कम महसूस होता है।
इंटरनेट की गलत जानकारी से बचें- हर जानकारी सही नहीं होती। इसलिए सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर भरोसा करना जरूरी माना जाता है।
हेल्दी डाइट लें- संतुलित भोजन से शरीर और दिमाग दोनों को बेहतर सपोर्ट मिलता है।
जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग लें- अगर एंग्जायटी ज्यादा बढ़ती है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना फायदेमंद माना जाता है।
अगर महिला को लगातार घबराहट, पैनिक अटैक, सांस लेने में परेशानी, बहुत ज्यादा उदासी या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आने लगते हैं, तो तुरंत मेडिकल मदद लेना जरूरी माना जाता है।
प्रेग्नेंसी में हल्की चिंता एक सामान्य बात मानी जाती है, लेकिन लंबे समय तक बनी रहने वाली गंभीर एंग्जायटी मां और बच्चे दोनों की सेहत को प्रभावित कर सकती है। इसका असर बच्चे के ब्रेन डेवलपमेंट और व्यवहार पर भी देखा जाता है। अच्छी बात यह मानी जाती है कि सही समय पर पहचान, परिवार का सहयोग और डॉक्टर की सलाह से एंग्जायटी को काफी हद तक कंट्रोल किया जाता है। ऐसे समय में मां का मानसिक रूप से स्वस्थ रहना बच्चे के बेहतर विकास के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
