ओरल कैंसर के मरीज बढ़े      Publish Date : 10/06/2026

              ओरल कैंसर के मरीज बढ़े

                                                                                                    डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा ओरल कैंसर के मरीजों की देख-रेख के लिए पिछले 12 वर्षों से सुरक्षा प्रक्रिया लागू कर रखा है। इसके बाद भी ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या कम होने के स्थान पर साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं। 11 अप्रैल 2012 को मध्य प्रदेश सरकार ने गुटखे पर प्रतिबंध लगाया था, उसके बाद गुटखा कंपनियों ने गुटखा बंद कर हाथ-पांव-खड़ा की और व्यापक फ़र्क दिखाई दिया। फिर भी कैंसर के केस कम होने का नाम नहीं ले रहे या और सरकार की चेकिंग को अंगूठा दिखा कर दूसरे बहाने से गुटखा बना कर पाउच के पैकेट को धड़ल्ले से बाजार में बेचने लगे, जिसके कारण सरकार ने जो प्रतिबंध लगाया था वह एक दिखावा बन कर ही रह गया है।

सरकार के आदेश पर गुटखा की चेकिंग में यह परेशानी थी कि असल में कौन लोग गुटखा खा रहे हैं। उनकी पहचान मुश्किल थी और प्रयोगशालाओं में जांच के बाद पता चलता था कि वे दोषी हैं। लेकिन अब सरकार के चेकिंग के आदेश के बाद लोग पैकेट वाले गुटखा खाने के बाद उसके रैपर को इधर-उधर फेंक देते हैं, जहां से ये जमा होकर प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। लेकिन जब से चेकिंग आरंभ हुई है उसके बाद लोगों ने नया तरीका खोजना शुरू कर दिया है, वह अब अपनी इच्छा के अनुसार नया पैकेट में गुटखा बेचने लगे हैं।

                                  

इधर ही में मध्य प्रदेश में जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि उनके अनुसार पिछले 14 वर्षों में ओरल कैंसर के मामले 42 फ़ीसदी तक बढ़ गए हैं। हर साल हमारे यहाँ रिकॉर्ड रोगियों की भर्ती है। 2012 में इस अस्पताल में 1836 ओरल कैंसर के मरीज आए थे जो 2025 में बढ़कर 2614 हो गए। यह केवल एक कैंसर हॉस्पीटल का आंकड़ा है। पूरे मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में लोग इलाज करा रहे हैं। गुटखा और ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

कैंसर हॉस्पीटल और डॉक्टरों का यह भी कहना है कि चिंता की बात यह भी है कि सरकार के प्रतिबंध लगाने के बाद गुटखा खाने वालों की संख्या घटने की तुलना में और ज्यादा बढ़ी है। जागरूकता और कानून की आंख-मिचौली चलने के कारण समस्या दिन-ब-दिन और बढ़ती ही जा रही है। ओरल कैंसर के मरीजों को शुरुआती लक्षण दिखने के बाद उनका मुँह पूरा नहीं खुलता है। गालों के अंदर की त्वचा का रंग लाल या सफेद होने लगता है और मुँह के अंदर छाले पड़ जाते हैं। इसके बाद इससे ट्यूमर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। आम भाषा में मुँह की त्वचा की सूजन कहते हैं।

                                  

तंबाकू और गुटखा के नियमित उपयोग और आर्सेनिक युक्त पानी के लगातार सेवन से मुँह की त्वचा को सर्वाधिक नुकसान पहुँचता है, जिससे कोशिकाएं विभाजित होकर ट्यूमर बनने लगती हैं। सरकार ने जो प्रतिबंध लगाया है उसके बाद भी इसके मरीजों की संख्या में कमी नहीं आई है। इसकी मुख्य वजह नियमों का सही ढंग से लागू नहीं होना है। सरकार के नए नियम और कानून की ढिलाई से ओरल कैंसर मरीजों की संख्या में बहुत बड़े तौर पर बढ़ोतरी हुई है। यह गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है और इस पर त्वरित ध्यान देने की जरूरत है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।