
कीटाणुनाशक बन रहे खतरा, एंटीबायोटिक दवाओं को कर रहे बेअसर Publish Date : 15/05/2026
कीटाणुनाशक बन रहे खतरा, एंटीबायोटिक दवाओं को कर रहे बेअसर
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
घर को साफ और सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एंटीबैक्टीरियल साबुन, वाइप्स और डिसइन्फेक्टेंट अब एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट की वजह बनते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इन कीटाणुनाशकों में मौजूद रसायन बैक्टीरिया को खत्म करने के बजाय उन्हें और मजबूत बना रहे हैं, जिससे वे एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी होते जा रहे हैं।
चिंताजनक यह है कि आम लोगों के लिए इन उत्पादों से अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है, जबकि इनका अनियंत्रित उपयोग भविष्य में साधारण संक्रमण को भी जानलेवा बना सकता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स (एएमआर) यानी ऐसी स्थिति जब बैक्टीरिया, वायरस, फंगस और परजीवी दवाओं के असर से बचने लगते हैं, हर साल दुनिया भर में 10 लाख से अधिक लोगों की जान ले रहा है।

यदि यही रुझान जारी रहा तो 2050 तक यह संकट कैंसर जितना घातक बन सकता है। अमेरिका, कनाडा, ब्राजील और स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने चेतावनी दी है कि घरेलू स्तर पर इस्तेमाल होने वाले एंटीबैक्टीरियल उत्पाद भी इस संकट को बढ़ा रहे हैं। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।
पूरी तरह मरते नहीं बैक्टीरिया, बन जाते हैं सुपरबग: वैज्ञानिकों के अनुसार कई एंटीबैक्टीरियल उत्पादों में क्वाटरनरी अमोनियम कंपाउंड और क्लोरोऑक्सीलिनॉल जैसे रसायन, जिन्हें बायोसाइड कहा जाता है यानी ऐसे केमिकल जो सूक्ष्मजीवों को मारने के लिए बनाए जाते हैं मिलाए जाते हैं। ये रसायन वैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाते बल्कि उन्हें ऐसे हालात में ढाल देते हैं जहां वे खुद को बदलकर और अधिक मजबूत बन जाते हैं।
कोविड़ के बाद बढ़ा इस्तेमाल, बढ़ा खतरा
कोविड-19 महामारी के दौरान इन एंटीबैक्टीरियल और डिसइन्फेक्टेंट उत्पादों का उपयोग तेजी से बढ़ा था। हालांकि महामारी के बाद भी इनका इस्तेमाल पहले की तुलना में अधिक बना हुआ है। लैब और वास्तविक जीवन मैं किए गए कई अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि आम उपभोक्ता उत्पादों में मौजूद ये रसायन अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान नहीं करते, बल्कि एएमआर और विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) का खतरा बढ़ा सकते हैं।
नालों से पर्यावरण तक फैल रहा असर
इन उत्पादों में मौजूद रसायन हर दिन लाखों घरों से नालों के जरिये पानी और पर्यावरण में पहुंचते हैं। वहां ये बैक्टीरिया के साथ मिलकर उन्हें और अधिक प्रतिरोधी बनने का मौका देते हैं। समय के साथ यहप्रक्रिया बड़े स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स को बढ़ावा देती है। शोध में यह भी पाया गया कि ये रसायन सिर्फ हैंड सोप या वाइप्स तक सीमित नहीं हैं बल्कि डिसइन्फेक्टेंट स्प्रे, कपड़े साफ करने वाले सैनिटाइजर, प्लास्टिक उत्पादों और पर्सनल केयर आइटम्स में भी मौजूद होते हैं।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
