ऑटिज्म से सम्बन्धित कुछ गलत धारणाएं      Publish Date : 13/04/2026

   ऑटिज्म से सम्बन्धित कुछ गलत धारणाएं

                                                                                                     डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

स्वास्थ्य विभाग के द्वारा निरंतर संचालित तमाम जागरूकता अभियानों के उपरान्त भी भारतीय आम जनता के बीच ऑटिज्म को लेकर सही जानकारी की बेहद कमी है। इसके कारण इस समस्या के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की ऐसी गलत धारणाएं उत्पन्न हो जाती हैं जो कि समस्या की सही पहचान करने और इसका उपचार करने में निश्चित रूप से बाधा बनती हैं। ऐसे में आज हम अपनी इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से ऑटिज्म से सम्बन्धित कुछ आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने जा रहे हैं-

देश में, ऑटिज्म को अक्सर गलत तरीके से ही समझा जाता है और इसी कारण से प्रभावित व्यक्ति को इस समस्या का सही उपचार एवं सहयोग नहीं मिल पाता है। ऑटिज्म के बढ़ते केसों और समस्या के प्रति जानकारी के अभाव आदि के सन्दर्भ में ऐसा कहना है न्यूरोलॉजिस्ट्स का। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि एक अनुमान के अनुसार, लगभग प्रति 100 बच्चों में से एक बच्चा ऑटिज्म की समस्या का शिकार है।

प्रत्येक मरीज की अलग आवश्यकताएं

                                 

न्यूरोलॉजिस्ट्स के अनुसार, यह समझना बहुत आवश्यक है कि ऑटिज्म, खराब पालन-पोषण, वैक्सीन, गर्भावस्था के पालन-पोषण एवं भावनात्मक आघात आदि के चलते नहीं होता है। ऑटिज्म का प्रभाव और इसका स्तर प्रत्येक बच्चे में अलग ही होता है। इससे प्रभावित प्रत्येक बच्चे की क्षमताएं एवं चुनौतियाँ प्रायः अलग ही होती हैं। अतः यह देखने के स्थान पर कि प्रभावित बच्चा क्या नहीं कर सकता, हमें उस बच्चे की विशिष्टताओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

एक अन्य मत के अनुसार, ऑटिज्म को बीमारी कहने के स्थान पर यदि दुनिया को देखने का एक अलग तरीका समझना अधिक उपयोगी होता है। रोग की आरम्भिक पहचान, उचित थेरेपी और सहयोग आदि के माध्यम से प्रभावित बच्चे के दैनिक जीवन में बड़ा अंतर लाया जा सकता है और इसी से लम्ब समय तक ऑटिज्म से प्रभावित मरीज की सफलता का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

ऑटिज्म के इन लक्षणों पर दें ध्यानः

बहुत से कंसल्टेंट्स का माना है कि ऑटिज्म के सबसे अधिक सामान्य लक्षणों में आँखों के द्वारा सम्पर्क बनाने में कठिनाई, दूसरों लोगों से बातचीत करने से में परेशानी का अनुभव करना, अनुभूति से सम्बद्व परेशानियाँ और व्यवहार में दोहराव करना आदि शामिल होती हैं। ऐसे बच्चे अपने दैनिक कार्यों का पूर्ण करने में तनाव का अनुभव कर सकते हैं। इसके साथ ही ऐसे बच्चे अपनी परेशानियों को कह भी नहीं पाते हैं और दूसरे लोगों से सहयोग नहीं मिल पाने के चलते उनकी चिंता का स्तर भी बढ़ सकता है।

1.   अभी तक ऑटिज्म की पहचान करने के लिए कोई मेडिकल अथवा ब्लड टेस्ट उपलब्ध नहीं है। इसलिए आमतौर पर बच्चे की आयु 18-24 माह होने के दौरान बच्चे के विकास एवं व्यवहार आदि के आधार पर ही समस्या की पहचान कर पाना सम्भव हो पाता है।

2.   विभिन्न प्रकार की थेरेपियों के माध्यम से ऐसे बच्चों को आवश्यक कौशल सिखाएं जा सकते हैं। इसमें ऐसे बच्चों को परिवार, डॉक्टर, शिक्षक एवं सहपाठियों का उचित सहयोग मिलना बहुत आवश्यक होता है।

सबसे आवश्यक है सही जानकारी का होना

                               

मिथक 1: ऑटिज्म खराब पालन-पोषण या भावनात्मक कमी के माध्यम से विकसित होता है।

सत्यताः यह धारणा बिलकुल गलत और बेबुनियाद है। ऑटिज्म एक तंत्रिका के विकास से जुड़ी स्थिति होती है,जो कि मस्तिष्क के विकास और आनुवांशिक कारकों पर निर्भर करती है।

मिथक 2: ऑटिज्म की समस्या से ग्रसित सभी बच्चों का व्यवहार एक जैसा ही होता है।

सत्यताः ऑटिज्म एक स्पेक्ट्रम होता है, अर्थात प्रत्येक बच्चा इसे अलग तरीके से अनुभव करता है। जैसे कुछ बच्चे देर से बोलना आरम्भ करते है, तो कुछ बच्चे अच्छी तरह से बाल पाते है, जबकि उन्हें सामाजिक व्यवहार के अन्तर्गत कठिनाईयों का समाना करना पड़ता है।

मिथक 3: ऑटिज्म से प्रभवित बच्चे कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाते हैं।

सत्यताः समस्या की शुआती पहचान, अनुकूल वतावरण वं उचित सहयोग आदि के माध्यम से कई बच्चे मुख्यधार की शिक्षा में भी सफल हो जाते हैं, वह अपने रिश्तें भी बनाते हैं और अपने करियर में भी काफी आगे तक जा सकते हैं।    

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।