
भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एआई की स्थिति Publish Date : 11/04/2026
भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एआई की स्थिति
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एक अहम पड़ाव पार कर लिया है। अब हमारे लिए बहस का मुद्दा यह नहीं कि क्लिनिकल केयर में एआई कारगर है या नहीं, बल्कि अब हम इसमें उलझे हैं कि इसे कैसे काम करना चाहिए, किसको फायदा मिलना चाहिए और किन सुरक्षा नियमों के तहत अमल में लाया जाना चाहिए, जैसे-जैसे हम 2026 में आगे बढ़ेंगे एआई लक्षण के आधार पर बीमारियों की पहचान करने, उपचार के तरीके व्यक्तिगत स्तर पर तय करने, यहां तक कि क्लिनिकल ट्रायल तथा परीक्षणों की रूपरेखा निर्धारित करने में भी गहरा असर डालने में सक्षम होता जाएगा।

बहरहाल, संभावनाओं के साथ जवाबदेही, नियमन, भरोसे और चिकित्सकों की बदलती भूमिका को लेकर बुनियादी चुनौतियां भी गहराई से जुड़ी हैं।
स्वास्थ्य सेवा में एआई की शुरुआती सफलताएं मुख्यतः तकनीकी थीं- तस्वीरों, संकेतों और विशाल डेटासेट में पैटर्न को पहचानना क्योंकि यह काम मनुष्यों की तुलना में एआई कहीं ज्यादा तेजी से करने में सक्षम है। आज इसकी क्षमता वास्तविक चिकित्सा लाभ में बदल रही है। रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी में एआई प्रणालियां सूक्ष्म असामान्यताओं की पहचान करने, कहीं ज्यादा जोखिम वाले मामलों को प्राथमिकता देने और रोग की पहचान में लगने वाले समय को घटाने की अपनी क्षमता को बखूबी साबित कर रही हैं, खासकर प्राथमिक उपचार और निवारक स्वास्थ्य क्षेत्र में इनसे काफी मदद मिल रही है। एआई के जरिए जोखिम के स्तर के आधार पर वर्गीकरण संभव हो रहा है, जिससे ऐसे लोग भी समय पर इलाज से लाभान्वित हो पाते हैं जो अन्यथा बीमारी का स्तर बढ़ने तक स्वास्थ्य प्रणाली के संपर्क में नहीं आते।
निरामई में हमने थर्मलिटिक्स के माध्यम से इसे प्रत्यक्ष देखा है। यह स्क्रीनिंग के जरिए स्तन कैंसर का पता लगाने का एआई समाधान है जो शुरुआती शारीरिक बदलावों का पता लगाने के लिए थर्मल इमेजिंग को मशीन लर्निंग से जोड़ता है। यह तकनीक अपने आप में महत्वपूर्ण है, साथ ही एक बड़ा सबक भी देती है कि एआई नैदानिक पहुंच को विस्तारित कर सकता है। इससे लोगों को उनके घर और कार्यस्थलों के करीब ही स्क्रीनिंग और प्राथमिक उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। बजाए इसके कि उन्हें स्वास्थ्य सेवा के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ें।
भारत में प्रति 1,1000 लोगों पर एक से भी कम डॉक्टर हैं, और शहरों को छोड़ दें तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति इससे भी बुरी है। सामान्यतः कैंसर की स्क्रीनिंग दरें वैश्विक स्तर पर सबसे कम हैं, और उपचार लायक रोगों का पता लगने में अक्सर काफी समय लग जाता है। ऐसी पृष्ठभूमि में एआई का सबसे सशक्त योगदान किसी तरह की नवीनता लाना नहीं, बल्कि पहुंच का दायरा बढ़ाना ही होगा। इससे नैदानिक जानकारी उन स्थानों तक पहुंचाना संभव हो सकता है जहां चिकित्सक कम हैं और स्वास्थ्य सेवा का ढांचा भी बेहतर नहीं है।
दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवा की मजबूती

आने वाले दशक में भारतीय स्वास्थ्य सेवा में एआई मुख्यतः क्षमताएं बढ़ाने वाले प्रमुख कारक के तौर पर काम करेगा। नैदानिक स्तर पर एआई से लैस उपकरण ज्यादा जोखिम वाले मरीजों को प्राथमिकता देने, इलाज में किसी तरह की चूक को दूर करने और त्वरित निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं, खासकर रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी और उन क्षेत्रों में जहां यह देखना ज्यादा मायने रखता है कि रोग की गंभीरता के लिहाज से उसे कितनी जल्द स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए। स्तन कैंसर के मामले में समस्या और अवसर दोनों के स्पष्ट उदाहरण सामने हैं।
भारतीय महिलाओं में सबसे आम कैंसर होने के बावजूद इसकी स्क्रीनिंग दर चिंताजनक रूप से कम है, विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में। स्क्रीनिंग के पारंपरिक तरीके महंगे हैं और उनमें अच्छे-खासे बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है। नतीजतन, अधिकांश मामले में बीमारी का पता तब लग पाता है जब वह गंभीर चरण में पहुंच जाती है। एआई से लैस स्क्रीनिंग उपकरण इस स्थिति को पूरी तरह बदल सकते हैं। बिना चीर-फाड़ वाली जांच के मामले में अगर इमेजिंग को मशीन लर्निंग आधारित जोखिम मूल्यांकन के साथ जोड़ दिया जाए तो ऐसे टूल प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों को सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग करने और आगे जांच की जरूरत वाली महिलाओं की तुरंत पहचान करने में सक्षम बनाएंगे।
नियामक जरुरत
बहरहाल, नैदानिक कार्यों में एआई के गहराई से प्रवेश के साथ दायित्व, जवाबदेही और नियामक निगरानी संबंधी सवाल उठने स्वाभाविक हैं।देश में नियामक तंत्र विकसित हो रहा है मगर इसे दो विपरीत किस्म की अनिवार्यताओं के बीच संतुलन साधना होगा-नवाचार को प्रोत्साहन और मरीजों की सुरक्षा पक्की करना। अत्यधिक कड़े नियम-कायदे किसी स्टार्टअप के विकास में बाधा बन सकते हैं; और पर्याप्त नियमन न किया तो कम सटीक नतीजों वाले मॉडल लोगों का स्वास्थ्य खतरे में डाल सकते हैं। यही नहीं, एआई-आधारित चिकित्सा पर भरोसा भी नहीं बन पाएगा। आगे चलकर हमें यह देखना होगा कि सॉफ्टवेयर ऐज अ मेडिकल डिवाइस (एसएएमडी), एआई टूल्स के लिए क्लिनिकल वैलिडेशन की जरूरत और बाजार में आने के बाद के निगरानी तंत्र की रूपरेखा ज्यादा स्पष्ट हो।
कार्यबल में बदलाव
एआई चिकित्सकों के काम करने के तरीके को बदल देगा। नियमित और ज्यादा पैमाने पर होने वाले कार्य तेजी से एल्गोरिद्म के जिम्मे आते जाएंगे, मसलन सामान्य मामलों की जांच, असामान्यताएं चिन्हित करना और डेटा व्यवस्थित करना। इससे विशेषज्ञों को जटिल मामलों पर ध्यान केंद्रित करने, दूसरे डॉक्टरों की राय और नैदानिक निर्णय लेने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। प्राथमिक देखभाल और सामुदायिक स्वास्थ्य मामले में एआई की वजह से होने वाला बदलाव तेजी से दिखेगा, जिसमें नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों की भूमिका और ज्यादा बढ़ेगी और वे अपनी विशेषज्ञता का बेहतर ढंग से इस्तेमाल करने में सक्षम होंगे।
राहत अभी बहुत आसान नहीं
मगर, सिर्फ एआई के बूते व्यवस्थागत मुद्दों को ठीक नहीं किया जा सकता। डेटा गुणवत्ता और पूर्वाग्रह चुनौती बने हुए हैं। कई एआई मॉडल ऐसे डेटासेट पर काम करते हैं जिनमें ग्रामीण आबादी या विविध जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व बहुत कम होता है। बुनियादी ढांचे में अंतर अब भी दूरदराज क्षेत्रों में बाधक है। चिकित्सकों और मरीजों के बीच भरोसे के लिए पारदर्शिता, सत्यापन और सुसंगत प्रदर्शन जरूरी है। सबसे अहम बात यह कि एआई के समाधानों को भारतीय परिवेश के हिसाब से डिजाइन किया जाना चाहिए, कम लागत वाले नवाचार, सांस्कृतिक अनुकूलता और जमीनी स्तर पर नैदानिक सहयोग से ही यह निर्धारित होगा कि कौन-सी तकनीक टिकाऊ होगी।
भारतीय स्वास्थ्य सेवा में एआई की असल सफलता सिर्फ एल्गोरिद्म की जटिलता से नहीं बल्कि लोगों के जीवन बचाने, जल्द से जल्द इलाज मुहैया कराने और इलाज में असमानता घटने के स्तर से मापी जाएगी। भारत के लिए एआई कोई विलासिता नहीं है। यह स्वास्थ्य सेवा की मौजूदा खाई को पाटने वाला एक अहम सेतु है, नए जमाने के क्लिनिक एआई-आधारित नहीं होंगे- बल्कि एआई से लैस होंगे, जिसमें मानवीय देखभाल पूरी मजबूती से आधार स्तंभ बनी रहेगी। अंततः यही वह भविष्य है जिसका निर्माण हर किसी तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए जरूरी है।
खास बातें
- भारत में प्रति 1,000 की आबादी पर एक से भी कम डॉक्टर हैं, ऐसे में एआई यहां चिकित्सकों को चुनौती नहीं दे रहा बल्कि उनकी कमी की भरपाई करने में मददगार साबित हो रहा है।
- भारत गैर-संक्रामक रोगों के बढ़ते बोझ से जूझ रहा है, ऐसे में बीमारी के गंभीर स्थिति में पहुंचने से पहले ही एआई की मदद से रोकथाम के प्रयास बेहतर स्वास्थ्य नतीजे दे सकते हैं।
- इस हल्के में एआई के गहराई से प्रवेश के साथ दायित्व, जवाबदेही और नियामक निगरानी संबंधी सवाल उठना स्वाभाविक।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
