इन्सुलिन रेजिस्टेंस को हल्के में न लें      Publish Date : 08/04/2026

      इन्सुलिन रेजिस्टेंस को हल्के में न लें

                                                                                                      डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

शरीर में रक्त शर्करा की मात्रा जब बहुत बढ़ जाती है और इन्सुलिन हार्मोन्स का असर कम हो जाता है। यह स्थिति खतरनाक है। इससे नॉन-अल्कोहल फैटी लिवर और दिल से जुड़ी बीमारियां भी हो सकती हैं।इन्सुलिन शरीर के कई कार्यों को पूरा करने के लिए बहुत जरूरी हार्मोन है। यह कोशिकाओं में शुगर को अंदर जाने देता है, ताकि ऊर्जा का निर्माण हो सके। लेकिन जब इन्सुलिन हार्मोस का असर कम हो जाता है या इसका प्रभाव नहीं होता है, तो इस स्थिति को इन्सुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है।

इन्सुलिन रेजिस्टेंस होने पर खून में ग्लूकोज, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, यूरिक एसिड का स्तर बढ़ सकता है और मेटाबॉलिक सिंड्रोम, नॉन-अल्कोहल फैटी लिवर डिजीज, टाइप-2 डायबिटीज और दिल से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।

                                

क्यों जरूरी है: इन्सुलिन हार्मोन को पैंक्रियाज बनाता है। यह शरीर को ब्लड शुगर यानी ज्यादा ग्लूकोज से बचाता है। दरअसल, जब हम भोजन करते हैं, तो हमारा शरीर कार्बोहाइड्रेट को तोड़कर ग्लूकोज में बदल देता है। इसके बाद इन्सुलिन की मदद से शरीर की कोशिकाएं इस शुगर को सोखकर ऊर्जा बनाती हैं, जिसे फिर शरीर हर तरह के काम के लिए उपयोग करता है।

डायबिटीज से संबंध: जब तक पैक्रियास की कोशिकाएं इन्सुलिन के प्रति कमजोर प्रतिक्रिया को दूर करने के लिए पर्याप्त इन्सुलिन बनाते हैं, तब तक ब्लड शुगर का लेवल स्वस्थ श्रेणी में रहता है। यदि कोशिकाएं इन्सुलिन के प्रति बहुत अधिक प्रतिरोधी हो जाती हैं, तो इससे रक्त "शर्करा का स्तर बढ़ जाता है (हाइपरग्लाइसेमिया), जो समय के साथ प्रीडायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज का कारण बनता है।

लक्षणों पर ध्यान: सबसे बड़ी चिंता की बात यही है कि इन्सुलिन रेजिस्टेंस के शुरुआती स्टेज पर इसके कोई लक्षण दिखाई नहीं देते। इस कारण बहुत-से लोगों को यह समझ नहीं आता कि उन्हें इन्सुलिन रेजिस्टेंस है। हालांकि, समय बीतने के साथ इसके लक्षण नजर आने लगते हैं, जैसे-" वजन का बढ़ना खासकर कमर के आस-पास, थकान महसूस होना, बार-बार भूख "लगना, ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव आना, नींद की कमी, हाई ब्लड प्रेशर, बैड कोलेस्ट्रॉल लेवल का बढ़ना, बार-बार यूरिन आना या अधिक प्यास लगना। इसमें दृष्टि संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

                                 

इसके अलावा मुंहासे, त्वचा पर पैचेज और छोटे, नरम तथा हानि रहित मांसल उभार हो सकते हैं। इसके अलावा असामान्य रूप से त्वचा पर बालों का उगना या बढ़ना भी इन्सुलिन रेजिस्टेंस के लक्षण हो सकते हैं।

जीवनशैली में सुधार: इन्सुलिन रेजिस्टेंस का सबसे बड़ा कारण मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली है। अधिक चीनी, मीठे पेय और प्रोसेस्ड फूड का सेवन करने से भी यह हो सकता है। आनुवंशिकी, नींद की कमी, तनाव भी इसका कारण बन सकता है। इसके अलावा स्टेरॉइड्स और एंटी-साइकोटिक्स दवाएं भी प्रभावित करती हैं।

छोटे-छोटे बदलाव से राहत: यदि आपका वजन ज्यादा है, तो इसे कम करने की कोशिश करें। वजन कम करने की शुरुआत से ही इन्सुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में काफी सुधार देखने को मिलता है। हेल्दी खाने की आदत डालें। इसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज, प्रोटीन और अच्छे फैट्स (जैसे एवोकाडो, नट्स) शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा खाने में शक्कर और प्रोसेस्ड फूड से परहेज करना चाहिए।

इसके अलावा कुछ दवाइयां भी कोशिकाओं को इन्सुलिन के प्रति ज्यादा संवेदनशील बना सकती हैं। ज्यादा तनाव से शरीर में शुगर लेवल बढ़ सकता है, जिससे इन्सुलिन रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है। तनाव को कम करने के लिए योग, ध्यान अभ्यास करें। हर रोज कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लें। नींद की कमी और क्रॉनिक तनाव दोनों ही इन्सुलिन संवेदनशीलता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

अगर बढ़ा रहता शुगर लेवल: जब शरीर इन्सुलिन के लिए ठीक तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करता है तो पेंक्रियाज जरूरत के हिसाब से इन्सुलिन नहीं बनाता है और इससे शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। ये कई मामलों में दवाओं से भी नियंत्रित नहीं होता है। अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो इससे प्री-डायबिटीज और टाइप-2 डायबिटीज हो सकती है।

नियमित जांच बेहद जरूरी है

मोटापा और त्वचा पर टैग्स (मस्से) होना इन्सुलिन रेजिस्टेंस संकेत हो सकता है। ऐसे में चिकित्सक से सलाह लेकर टेस्ट कराने चाहिए। वह आपको एचबीएवनसी और ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। इसके अलावा होमियोस्टेटिक मॉडल असेसमेंट ऑफ इन्सुलिन रेसिस्टेंस टेस्ट भी करवाया जा सकता है, इससे पता चलता है कि आपका शरीर इन्सुलिन का कितने अच्छी तरीके से इस्तेमाल कर रहा है। वहीं 40 साल से अधिक उस के लोगों को नियमित डायबिटीज और इन्सुलिन से संबंधित ब्लड टेस्ट करवाना चाहिए, ताकि समय रहते बीमारी का पता चल सके और इसके बचाव संबंधी कदम उठाए जा सकें। यदि परिवार में डायबिटीज या लिवर रोग का इतिहास है तो ज्यादा सतर्क रहें।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।