
गम्भीर प्रकार के आटिज्म का पारम्परिक निदान Publish Date : 06/03/2026
गम्भीर प्रकार के आटिज्म का पारम्परिक निदान
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
गंभीर आटिज्म के लिए अलग तरीके से निदान पर विचार कर रहे हैं विशेषज्ञ-
वर्तमान समय में बच्चों में आटिज्म के मामले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। इनमें कई बच्चे तो ऐसे होते हैं, जिनमें इसके हल्के लक्षण नजर आते हैं परन्तु वहीं कई में मध्यम और गंभीर रूप से प्रभाव नजर भी आते है। रोग इस स्थिति देखते हुए विशेषज्ञों के बीच बहस तेज हो गई है कि सबसे अधिक जरूरतमंद आटिस्टिक बच्चों को सर्वोत्तम सहायता किस प्रकार से प्रदान की जा सकती है।
प्रोफाउंड आटिज्म एलायंस की अध्यक्ष जूडिथ उर्सिटी ने बताया कि इस श्रेणी के लोगों को फिलहाल उचित उपचार, सहायता और उनकी देखभाल के स्तर को संभालने के लिए प्रशिक्षित पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की बेहद कमी है और अधिकांश नैदानिक अनुसंधान में इन्हें शामिल ही नहीं किया जाता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि लगभग एक चौथाई लोग गंभीर आटिज्म से ग्रसित हैं।

यह शब्द वर्ष 2021 में विशेषज्ञों के एक समूह लैंसेट आयोग द्वारा पेश किया गया था। इस श्रेणी में वे लोग शामिल होते हैं, जो भाषा (बोलने, लिखने, सांकेतिक भाषा या संचार उपकरण के माध्यम से) में बहुत कम या बिल्कुल भी निपुण नहीं हैं और जिनका आइक्यू लेबल 50 से कम है और जिन्हें 24 घंटे निगरानी और सहायता की आवश्यकता होती है। इस श्रेणी का उद्देश्य सरकारों और सेवा प्रदाताओं को सहायता योजना बनाने और उसे लागू करने में मदद करना है।
इसका लक्ष्य मुख्यधारा के आटिज्म अनुसंधान में उनकी अल्प भागीदारी को संतुलित करना भी है। यह नई श्रेणी इस समूह के लिए अधिक समर्थन, अनुसंधान और प्रमाण जुटाने में सहायक सिद्व हो सकती है। लेकिन कुछ लोगों ने चिंता जताई है कि इस श्रेणी में न आने वाले लोगों को कम जरूरतमंद समझा जा सकता है और उन्हें वह सुविधा नहीं मिल पाएगी जिसकी उन्हें वास्तव में बेहद आवशकता है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
