
बेहद संक्रामक और घातक है रोग हेपेटाइटिस ‘बी’ Publish Date : 03/03/2026
बेहद संक्रामक और घातक है रोग हेपेटाइटिस ‘बी’
डॉ0 दिव्याशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
वर्तमान समय में भारत के लगभग चार करोड़ से अधिक लोग हेपेटाइटिस ‘बी’ वायरस के वाहक बन चुके हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हेपेटाइटिस ‘बी’ के टीके को भारतीय राष्ट्रीयकरण कार्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश की है, परंतु इसे लागू करना फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि इस कार्य हेतु 700-800 करोड़ रुपये की अतिरिरक्त आवश्यकता होगी। हालांकि, इस दश में विश्ेषज्ञों का सुझाव है कि इस वायरस से बचाव के लिए तमाम प्रयास अविलम्ब शुरू किए जाने चाहिए, क्योंकि हेपेटाइटिस एक संक्रामक रोग है और इसकी अवहेलना अति घातक भी सिद्ध हो सकती है।
आंकड़ों की माने तो इस समय देश में चार करोड़ से भी अधिक लोग हेपेटाइटिस ‘बी’ वायरस के की चपेट में आ चुके हैं। ऊपर से यह लोग स्वस्थ ही नजर आते हैं परंतु निकटतम सम्बन्ध स्थापित होने के बाद के बाद ये संक्रमित लोग ही दूसरे लोगों को भी इस वायरस से संक्रमित कर सकते हैं।
इस सब में सबसे त्रासदीपूर्ण बात तो यह है कि गर्भवती मां भी इस वायरस को अपनी नवजात संतान तक पहुंचा सकती है। ऐसे संक्रमित नवजात बच्चों में से 90 प्रतिशत बच्चे मात्र 40 वर्ष की उम्र तक पहुंच कर ही लिवर के कैंसर से पीड़ित हो जाते हैं।
भारत में अभी बच्चों को सामान्य तौर पर केवल 6 प्रकार के संक्रामक रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाले टीके लगाए जाते रहे हैं। जिन रोगों के लिए बच्चों को टीके लगाए जाते हैं ये संक्रामक रोग हैं- टी.बी., डिप्थीरिया, पसिस, टेटनस, पोलियो तथा खसरा। आज जरूरत इस बात की भी है कि इन टीकों के साथ ही साथ ही हेपेटाइटिस ‘बी’ का टीका भी अनिवार्य रूप से लगाया जाना चाहिए।
ठसके लिए व्यपाक कार्यक्रम चलाए जाने की आवश्यकता है। इस वर्ष तक लगभग 30 देशों ने इस सिफारिश पर काम शुरू किया है। चीन, मलेशिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, थाईलैंड तथा सिंगापुर में हेपेटाइटिस ‘बी’ के टीके लगाने के राष्ट्रीय कार्यक्रम चल रहे हैं।
डॉ. रेमंड एस, कोफी (अमेरिकन लीवर फाउंडेशन के भूतपूर्व सलाहकार तथा अमेरिकन कॉलेज ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलाजी के वर्तमान गवर्नर) ने इस विषय में अपनी राय व्यक्त करते हुए हाल ही में नई दिल्ली में कहा कि शायद महंगा होने के चलते भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में इस टीके को शामिल करना संभव नहीं हो पा रहा होगा। परंतु उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि कुल मिलाकर हेपेटाइटिस ग्रस्त होने से देश को जो आर्थिक क्षति होती है, उसकी तुलना में टीकाकरण पर होने वाला व्यय न के बराबर है।
यह बात तो स्पष्ट है कि हेपेटाइटिस के लिए कई वायरस जिम्मेदार हैं। इन वायरसों में से ए, बी, सी, डी तथा ई की पहचान हो चुकी है। इन वायरसों से जिगर में सूजन आ जाती है। इसी को ‘हेपेटाइटिस रोग’ कहा जाता है तथा आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘पीलिया’ कहते हैं। दो साल पहले भारत के ही राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने हेपेटाइटिस ‘एफ’ की खोज कर ली थी परंतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस पुष्टि नहीं की जा सकी है।
हाल ही में इस प्रकार के वायरस ‘जी’ की खोज किए जाने का भी दावा किया जा चुका है, परन्तु वायरस ‘जी’ पर अभी विवाद जारी है। एक दूसरे अध्ययन के अनुसार वायरस ‘जी’ पीलिया के जीवाणु न होकर किसी अन्य रोग के जीवाणु हो सकते हैं। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि अब तक खोजे जा चुके इतनी तरह के वायरसों के विरूद्व टीके की वकालत करके केवल हेपेटाइटिस ‘बी’ के टीके की ही बात क्यों की जा रही है? दरअसल इसका मुख्य कारण यह है कि अभी तक इन सभी वायरसों के विरूद्व सुरक्षा प्रदान करने वाले टीके नहीं बनाए जा सके हैं जबकि वायरस ‘बी’ का टीका वायरस ‘डी’ के विरुद्ध भी सुरक्षा प्रदान करता है।
दरअसल वायरस ‘डी’ उन्हीं लोगों आक्रमण करता है जो पहले से ही वायरस ‘बी’ से ग्रस्त है, जबकि वायरस ‘सी’ और ‘ई’ के टीके अभी बन ही नहीं पाए हैं। इस समय दुनियाभर में चल रहे अनुसंधान के परिणामों से यह पता चलता है कि वायरस ‘ई’ का टीका आगामी 3-5 वर्षों में तथा वायरस ‘सी’ का टीका आगामी 5 वर्षों तक उपलब्ध हो सकता है।
वायरस ‘ए’ अक्सर बच्चों को ही सताता है। संक्रमित अन्न एवं जल का संवन करने से ही इस वायरस का आक्रमण होता है। अतः साफ-सुथरे पेयजल तथा भोजन में भी शुद्ध जल की व्यवस्था होनी चाहिए। वायरस ‘ई’ भी इसी वजह से फैलता है। वायरस ‘बी’ सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है। इसका संक्रमण मुख्य रूप से रक्त द्वारा ही होता है जबकि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी ‘एड्स’ के लिए रक्त की जांच की जांच तो की जाती है परंतु वायरस ‘बी’ के लिए नहीं की जाती। जबकि एड्स संक्रमण के लिए कम से क्रम. मि.मी. रक्त की आवश्यकता पड़ती है और हेपेटाइटिस वायरस के संक्रमण के लिए इसका ढाई हजार गुना कम रक्त ही काफी है।

हालांकि रक्त जांच ही इसका एकमात्र हल है, ऐसा कहना भी सही नहीं है। यह वायरस शरीर के अन्य स्रावों जैसे- लार, वीर्य और योनी स्रावों के माध्यम से भी एक से दूसरे में प्रवेश कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, असुरक्षित यौन सम्बन्धों के माध्यम से निश्चित रूप से हेपेटाइटिस ‘बी’ का संक्रमण हो सकता है। इस संदर्भ में अमेरिका में किए गए विशेष अध्ययनों के माध्यम से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वहां हेपेटाइटिस ‘बी’ के प्रसारा का सबसे प्रमुख कारण असुरक्षित यौन सम्बघ ही है।
वायरस ‘बी’ के आक्रमण से प्रारंभ में थकावट, भूख न लगना, हल्का बुखार शारीर में दर्द होना आदि होता है। बाद में आंखें तथा त्वचा पीली पड़ जाती है। मूत्र भी गहरे रंग का आने लगता है। आगे चलकर जिगर में भी सूजन आ जाती है। यहां तक कि पीड़ित अंततः जिगर के कैंसर से भी शिकार हो जाते हैं। जिगर के प्रत्येक दस मामलों में से आठ में इसका प्रमुख कारण हेपेटाइटिस ‘बी’ का संक्रमण होना ही होता है।
इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि बाजार में दो तरह के टीके आते हैं। एक रक्त के प्लामा से तथा दूसरे जेनेटिक इंजीनियरंग के माध्यम से बने हुए हैं। हालांकि दोनों ही प्रकार के टीके पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम हैं, परंतु अमेरिका के जैसे विकसित देश भी वर्तमान में केवल जेनेटिक इंजीनियरिंग से बने टीकों का उपयोग अधिक कर रहे हैं।
भारत सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी यह स्वीकार किया है कि विश्व स्वास्थ्य सभा ने हेपेटाइटिस ‘बी’ के टीके को राष्ट्रीयकरण कार्यक्रम में शामिल करने की सिफारिश की है, परंतु ज्यादा लागत की मजबूरी के चलते फिलहाल इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करना मुश्किल है। इस कार्यक्रम को लागू करने हेतु 700-800 करोड़ रुपये की आवश्यकता पड़ेगी। अतः फिलहाल इसे राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करना बेशक कठिन कार्य है परंतु यह सच है कि इस वायरस से बचाव के लिए तुरंत प्रयास प्रारंभ करने जरूरी हैं। हेपेटाइटिस एक घातक संक्रामक रोग है। अतः इसकी अवहेलना भी घातक सिद्ध हो सकती है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
