
शिशु आहार से राष्ट्र निर्माण Publish Date : 19/02/2026
शिशु आहार से राष्ट्र निर्माण
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
भारत के विकास और समृद्धि की नींव स्वस्थ और पोषित बच्चे हैं। जीवन के पहले 1,000 दिन- गर्भधारण से लेकर दो वर्ष की आयु तक-बच्चे के शारीरिक, मानसिक और संज्ञानात्मक विकास के लिए अत्यंत निर्णायक होते हैं। इसी अवधि में केवल स्तनपान, समय पर अनुपूरक आहार और उत्तरदायी देखभाल जैसी आहार पद्धतियाँ बच्चे को न सिर्फ स्वस्थ बनाती हैं बल्कि उसके भविष्य की सीखने की क्षमता, उत्पादकता और संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। राष्ट्रीय पोषण माह इसी जागरूकता को घर-घर पहुँचाने का अवसर है ताकि हर परिवार और समुदाय पोषण को अपना कर्तव्य और साझा ज़िम्मेदारी माने। हर वर्ष जब हम राष्ट्रीय पोषण माह मनाते हैं, तो माताओं और बच्चों के स्वास्थ्य एवं पोषण को आगे बढ़ाने के लिए हमारी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता और मजबूत होती है। इस वर्ष के समारोह ऐसे विषयों पर केंद्रित हैं जो प्रत्येक घर से जुड़े हुए हैं-शिशु एवं नवजात शिशु आहार पद्धतियों से लेकर प्रारंभिक बचपन देखभाल एवं शिक्षा तक।

आठवाँ पोषण माह विशेष रूप से मोटापे को कम करने के लिए चीनी और तेल की खपत में कमी, पोषण और देखभाल में पुरुषों की सक्रिय भागीदारी, "वोकल फॉर लोकल" के माध्यम से जमीनी स्तर पर सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता तथा समन्वित प्रयास एवं डिजिटलीकरण जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। इन सभी विषयों में, शिशु एवं नवजात शिशु आहार (आईवाईसीएफ) पोषण सुरक्षा की नींव के रूप में सबसेअधिक महत्वपूर्ण है। जीवन के पहले 1,000 दिन- गर्भाधान से लेकर दो वर्ष की आयु तक हम अपने सबसे छोटे नागरिकों को किस प्रकार पोषित करते हैं यही उनके विकास और स्वास्थ्य को आकार देता है। साथ ही यह उनके सीखने, उत्पादकता और भविष्य की संभावनाओं की बुनियाद भी तय करता है।
क्यों महत्वपूर्ण है 'सुपरफूड' यानी माँ का दूध
भारत सहित विश्वभर के प्रमाण दर्शाते हैं कि जन्म से छह माह तक का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। बच्चों में कुपोषण के संकेतक जैसे ठिगनापन और दुर्बलता जीवन के इन्हीं शुरुआती महीनों में दिखने लगते हैं। जीवन के पहले छह माह तक केवल स्तनपान न केवल सांस्कृतिक ज्ञान है, बल्कि वैज्ञानिक रूप से सिद्ध तथ्य भी है जो शिशुओं को संक्रमण से बचाता है, उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज्जबूत करता है, स्वस्थ वृद्धि को प्रोत्साहित करता है और शिशु मृत्यु दर को कम करता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू करने की सलाह देता है क्योंकि माँ का दूध आवश्यक एंटीबॉडीज प्रदान करता है, जो शिशु की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाते हैं और अनेक बीमारियों से सुरक्षा देते हैं। अक्सर 'सुपरफूड' कहा जाने वाला माँ का दूध शिशु के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों, एंटीबॉडीज और वृद्धि कारकों का संपूर्ण स्रोत है। स्तनपान न केवल अस्थमा, मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज जैसी अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्वास्थ्य स्थितियों से सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को भी सुदृढ़ करता है। यह केवल शिशु के लिए ही लाभकारी नहीं है, बल्कि माताओं में कैंसर और यहाँ तक कि डायबिटीज के खतरे को भी कम करता है। इस महत्व को समझते हुए, मंत्रालय आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, घर-घर जाकर परामर्श देने और सामाजिक एवं व्यवहार परिवर्तन संचार (SBCC) के माध्यम से माताओं, परिवारों और समुदायों को इस जीवनरक्षक अभ्यास को अपनाने और बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है।
अनुपूरक आहारः दिमाग और शरीर का निर्माण

छह माह की आयु से शिशु की पोषण संबंधी आवश्यकताएं केवल माँ के दूध से पूरी नहीं हो पातीं। इस अवस्था में मिलने वाली देखभाल, पोषण और मानसिक उत्तेजना ही स्वस्थ वृद्धि और संज्ञानात्मक विकास की नींव रखती हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि जीवन के पहले 1,000 दिनों में, विशेषकर दो वर्ष की आयु तक, मस्तिष्क का विकास सबसे तेज्ज होता है। इसी दौरान, छह से तेईस माह तक शिशु को मिलने वाले भोजन की मात्रा और गुणवत्ता उनके विकास की दिशा तय करती है।यही कारण है कि अनुपूरक आहार अत्यंत महत्वपूर्ण है। W H O की सिफारिश है कि छह माह की आयु से शिशु को माँ के दूध के साथ अनुपूरक आहार देना शुरू किया जाए। 6 से 8 माह तक के शिशुओं को स्तनपान के अलावा दिन में दो से तीन छोटे भोजन चाहिए। 9 से 24 माह की आयु में इसे बढ़ाकर तीन से चार भोजन प्रतिदिन करना चाहिए और 12 से 24 माह के बच्चों को एक से दो बार पौष्टिक नाश्ता भी दिया जाना चाहिए।
आहार विविधता अत्यंत आवश्यक है। भोजन पोषक तत्वों से भरपूर होना चाहिए तथा उसमें चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा सीमित मात्रा में हों। इसमें सभी प्रमुख खाद्य समूहों को शामिल किया जाना चाहिए-अनाज और दालें, दुग्ध उत्पाद, अंडे, मांस या मछली, तथा फल और सब्जियाँ। एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस उम्र में जंक फूड और शक्करयुक्त पेय पदार्थों से परहेज करने के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए क्योंकि इनके दीर्घकालिक प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। अन्नप्राशन दिवस जैसी पहलों के माध्यम से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता समुदाय को अनुपूरक आहार की शुरुआत को उत्सव के रूप में मनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसमें सरल, स्थानीय और पारंपरिक व्यंजनों को बढ़ावा दिया जाता है ताकि हर परिवार आसानी से घर में उपलब्ध सामग्री से पौष्टिक भोजन तैयार कर सके। इस प्रकार परंपरागत प्रथाओं और आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों का मेल सुनिश्चित करता है कि बच्चों को सही समय पर सही पोषण मिले और वे स्वस्थ खानपान की आदतों के साथ बड़े हों, जो उनके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ से भी जुड़े रहें।
उत्तरदायी आहार और साझा जिम्मेदारी
पोषण केवल भोजन तक सीमित नहीं है-यह समग्र देखभाल से जुड़ा हुआ है। एक महत्वपूर्ण पहलू है उत्तरदायी आहार को बढ़ावा देना, जिसमें देखभाल करने वाले और शिशु के बीच दो-तरफ़ा, स्नेहपूर्ण संवाद स्थापित किया जाता है। यह न केवल बच्चों को भोजन करने के लिए प्रोत्साहित करता है, बल्कि उन्हें स्वस्थ भोजन की पसंद विकसित करने और धीरे-धीरे स्वतंत्र रूप से खाने की आदत डालने में भी मदद करताहै। विविध शोधों से पता चलता है कि जब भोजन के समय देखभाल करने वाले बच्चे के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं और उनकी भूख और तृप्ति के संकेतों पर ध्यान देते हैं तो यह स्वस्थ भोजन की प्राथमिकताओं को स्थापित करने, कुपोषण और मोटापे के जोखिम को कम करने तथा भावनात्मक और संज्ञानात्मक विकास को बढ़ावा देने में सहायक होता है।
नीति से जमीनी क्रियान्वयन तक
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित आहार पद्धतियों को वास्तविक धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है- समुदाय स्तर पर अनुसंधान से नीति और नीति से व्यवहार तक। आंगनवाड़ी सेवाओं, घर-घर जाकर परामर्श और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से मंत्रालय यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा है कि हर परिवार को सही समय पर सही जानकारी मिले और एक जन-आंदोलन खड़ा हो।नीतियाँ और कार्यक्रम तभी सफल हो सकते हैं जब परिवार और समुदाय उन्हें अपनाएं। आईवाईसीएफ प्रथाओं-जन्म के पहले छह माह तक केवल स्तनपान, समय पर और विविध अनुपूरक आहार, तथा उत्तरदायी देखभाल को अपनाकर हम कुपोषण को कम कर सकते हैं और अपने बच्चों को स्वास्थ्य, शिक्षा और उत्पादकता के मार्ग पर ला सकते हैं। अब जब हम पोषण माह मना रहे हैं, हमें ये याद रखना चाहिए कि पोषित बच्चे ही पोषित राष्ट्र का आधार हैं। आइए, मिलकर यह संकल्प लें कि हर घर और हर समुदाय बाल पोषण का अग्रदूत बने!

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
