गर्दन की नस से बैलून डालकर फुला रहे दिल का वॉल्व      Publish Date : 18/02/2026

गर्दन की नस से बैलून डालकर फुला रहे दिल का वॉल्व

                                                                                          डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

गर्दन की नस से बैलून डालकर हृदय रोगियों का वॉल्व फुला दिया जा रहा है। इससे रोगी सर्जरी से बच जाता है। दर्द और रक्तस्राव भी नहीं होता। रोगी की रिकवरी जल्दी हो जाती है। हृदय के वॉल्व के इलाज में ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी नामक यह विधि प्रदेश में अभी एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में ही अपनाई जा रही है। जर्नल ऑफ अमेरिकन कार्डियोलॉजी ने इस विधि संबंधी शोध प्रकाशित किया है। गर्दन की नस से ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी कराने में सबसे राहत उन रोगियों को है जिनकी जांघ की नसों में पतलापन और जन्मजात विकृति होती है। इसके अलावा स्पाइनल कॉर्ड के रोगियों और विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं के इलाज में कोई दिक्कत नहीं होती। उनकी ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी प्रक्रिया सुरक्षित रहती है।

                                 

ऐसे रोगियों को जांघ की नस से बैलून डालने में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं जिससे जान का खतरा रहता है। इंस्टीट्यूट के कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. एस. के. सिन्हा ने बताया कि दो साल में 50 रोगियों की ट्रांसजुगुलर बलून मिट्रल वाल्वुलोटोमी की गई है। इनमें 18 रोगियों के ब्योरे संबंधी शोध जर्नल ऑफ अमेरिकन कार्डियोलॉजी में वर्ष 2025 में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि देश में अभी चार-पांच शहरों में यह विधि अपनाई जा रही है।

विधि के फायदे

  • शारीरिक जटिलताओं यह उन रोगियों के लिए सबसे बड़ा विकल्प है जिनमें पैर की नसों में रुकावट या कोई जन्मजात विकृति हो।
  • गर्दन की नस (जुगुलर वेन) के माध्यम से माइट्रल वाल्व तक पहुंचने का रास्ता अधिक सीधा होता है। इससे वॉल्व को पार करना कभी-कभी पारंपरिक तरीके की तुलना में आसान और तेज हो सकता है।
  • जिन रोगियों को गंभीर काइफोस्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन) है, उनके लिए पारंपरिक बीएमवी करना असंभव हो सकता है। ऐसे मामलों में ट्रांसजुगुलर तरीका एक सफल विकल्प साबित होता है।
  • त्वरित गतिशीलता पैर के बजाय गर्दन के रास्ते प्रक्रिया होने के कारण मरीज प्रक्रिया के बाद बहुत जल्दी चलने-फिरने में सक्षम हो जाता है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।