स्वास्थ्य की राह में औषधि का संग      Publish Date : 17/02/2026

     स्वास्थ्य की राह में औषधि का संग

                                                                                       डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा

दवाएं मानव सभ्यता का एक महत्वपूर्ण उपहार हैं, जिन्होंने असंख्य जीवन बचाए हैं और हमारी दुनिया को बेहतर बनाया है। लेकिन जैसा कि कई त्रासदियों ने हमें "खाया है, इस वरदान का दुरुपयोग हमें भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है। दवाओं का दुरुपयोग एक अदृश्य दुश्मन है जो हमारी लापरवाही और अज्ञानता से पनपता है। इस लड़ाई में सिर्फ सरकार की भूमिका पर्याप्त नहीं है।

यह हर नागरिक, हर डॉक्टर, हर फार्मासिस्ट और हर मीडियाकर्मी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वह इस खतरे को पहचाने और इसे रोकने के लिए सक्रिय रूप से काम करे। मनुष्य का जीवन स्वास्थ्य और बीमारी के बीच एक सतत यात्रा है। आदिकाल से ही मानव अपने स्वास्थ्य की रक्षा, बीमारियों के इलाज और दीर्घायु के लिए अनगिनत उपायों की खोज में लगा रहा है। इस खोज ने प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक दवाओं तक का सफर तय किया है।

                           

आज, दवाएं हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं, जो न केवल जीवन बचाती हैं, बल्कि उसकी गुणवत्ता में भी सुधार करती हैं। लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है। इन दवाओं के गंभीर दुष्प्रभाव, जिनका दुरुपयोग होने पर स्थिति और भी भयावह हो जाती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में,लोग अक्सर शॉर्टकट (अल्प मार्ग) अपनाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं। चाहे वह वजन कम करना हो, खूबसूरत दिखना हो, या रातों-रात अपनी शारीरिक क्षमता बढ़ाना हो, इन सब के लिए दवाओं और रसायनों का दुरुपयोग आम होता जा रहा है।

यह लेख इन खतरनाक आदतों और उनके गंभीर परिणामों पर प्रकाश डालने की एक छोटी-सी कोशिश करता है और साथ ही साथ दवाओं के महत्व, उनके खतरों, दुरुपयोग के मामलों, परस्पर क्रिया, और विश्व की सर्वोत्तम प्रथाओं पर चर्चा भी करता है, जिससे आमजन मानस में जागरूकता आ सके और लोगों को सही निर्णय लेने में मदद मिल पाए।

टीकों का विकास

एडवर्ड जेनर ने 1796 में चेचक के टीके का आविष्कार किया। इसके बाद लुई पाश्चर ने रेबीज और एन्थ्रेक्स के टीकों का विकास किया। 20वीं और 21वीं शताब्दी में पोलियो, खसरा और हाल ही में कोविड-19 के टीके विकसित किए गए, जिन्होंने महामारियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में डीएनए (DNA) की संरचना की खोज और आणविक जीव विज्ञान (molecular biology) में प्रगति ने आनुवंशिक रोगों (genetic diseases) के इलाज के लिए नई दवाएं विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

कैंसर, एड्स और सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों के इलाज के लिए लक्षित दवाएं (targeted drugs) और जीन थेरेपी (gene therapy) आज संभव हो पाई हैं। पिछले कुछ दशकों में बायोलॉजिक्स का विकास हुआ है। ये दवाएं जीवित कोशिकाओं से बनाई जाती हैं और पारंपरिक रासायनिक दवाओं की तुलना में अधिक जटिल होती हैं। इंसुलिन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज इसके प्रमुख उदाहरण हैं। आज, कृत्रिम बुद्धि का उपयोग नई दवाओं की खोज को तेज करने, उनके प्रभाव का अनुमान लगाने और नैदानिक परीक्षणों (clinical trials) को अधिक कुशल बनाने के लिए किया जा रहा है, जिससे अनुसंधान का समय और लागत कम हो रही है।

प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का गलत इस्तेमाल

दवाओं का सही इस्तेमाल ही स्वास्थ्य की कुंजी है, लेकिन जब प्रिस्क्रिप्शन दवाओं (Prescription Drugs) का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो यह गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। अमेरिकी सरकार के प्रतिष्ठित अनुसंधान संस्थान, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन ड्रग अब्यूज़ (NIDA) के अनुसार, प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का दुरुपयोग का अर्थ हैः

  • किसी दवा को डॉक्टर द्वारा बताई गई खुराक या तरीके से अलग तरीके से लेना।
  • किसी और की प्रिस्क्रिप्शन दवा का इस्तेमाल करना।
  • दवा का इस्तेमाल सिर्फ उत्कर्ष (euphoria) महसूस करने के लिए करना।

इस तरह की आदत को गैर-चिकित्सीय इस्तेमाल (non-medical use) भी कहा जाता है। वैसे तो कई दवाएँ गलत तरीके से इस्तेमाल हो सकती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा तीन श्रेणियों दवाओं का दुरुपयोग पाया जाता हैः

  • ओपिओइड्स (Opioids): अक्सर दर्द कम करने के लिए दी जाने वाली दवाएँ।
  • सेंट्रल नर्वस सिस्टम डिप्रेसेंट्स (CNS depressants): इसमें ट्रैक्विलाइज़र, सेडेटिव और हिप्नोटिक्स शामिल हैं, जो चिंता और नींद से जुड़ी समस्याओं के लिए प्रयुक्त होती हैं।
  • स्टिमुलेट्स (Stimulants): आमतौर पर ध्यान-हीनता और अति-सक्रियता विकार (ADHD) के इलाज के लिए।

प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का दुरुपयोग केवल आदत या लत तक सीमित नहीं रहता; यह शरीर पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। हृदय, मस्तिष्क, और अन्य अंगों पर इसका प्रभाव जानलेवा भी हो सकता है।

पर्ची नहीं, परहेज़ नहीं: लोग अपना इलाज खुद क्यों करने लगते हैं?

                                  

अक्सर लोग बिना चिकित्सक की पर्ची के दवाएँ लेने लगते हैं (self-medication)। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। समय और पैसे की बचत के लिए, तो कभी बीमारी को हल्का समझकर। कई बार नौकरी छिन जाने का डर, मानसिक असुरक्षा, अवसाद, दर्द से त्वरित राहत पाने की इच्छा या फिर अज्ञानता भी इसका कारण बन जाती है। शुरू में यह आसान उपाय प्रतीत हो सकता है, पर इसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। भारत जैसे विशाल और जनसंख्या-बहुल देश में इसका मूल कारण दूरदराज़ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, प्रशिक्षित चिकित्सकों का अभाव और आर्थिक सीमाएँ भी हो सकती हैं।

यह एक प्रकाशित तथ्य है कि भारत में अक्सर लोग अक्सर अपनी बीमारी का इलाज स्वयं ही करने का फैसला कर लेते हैं। इसके पीछे दवाओं के विज्ञापनों का असर, कम साक्षरता स्तर, बीमारियों की छोटी अवधि, घर में बची हुई पुरानी दवाएँ, सीमित संसाधन, अस्पतालों तक पहुँचने में भौगोलिक मुश्किलें, बीमारी बताने में झिझक, महंगे इलाज का खर्च और स्वास्थ्य बीमा की कमी भी पाई गई हैं।

यही कारण है कि भारत में यह चलन लगातार बढ़ रहा है और एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। बिना जानकारी के दवा लेना नशे की लत, एलर्जी, आदत पड़ने, बीमारी बिगड़ने, गलत निदान व खुराक, यहाँ तक कि अपंगता या समय से पहले मृत्यु तक का कारण बन सकता है।यह कहना गलत नहीं होगा कि क्षणिक आराम (त्वरित इलाज) लंबे समय के लिए अफसोस का बीजारोपण कर देता है।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।