
मोटापे से निपटने के लिए पोषण साक्षरता Publish Date : 27/01/2026
मोटापे से निपटने के लिए पोषण साक्षरता
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
मोटापे की रोकथाम और प्रबंधन में पोषण साक्षरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। संतुलित आहार, जंक फूड से परहेज, शारीरिक गतिविधियों में भागीदारी, पर्याप्त नींद और जागरूक भोजन व्यवहार जैसी आदतों को अपनाना जरूरी है। पोषण माह आंगनवाड़ी केंद्र, स्कूल, समुदाय और डिजिटल माध्यमों से इन संदेशों को फैलाने और व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करने का प्रभावी उपकरण बन चुका है।
यदि देश भर के परिवार छोटे-छोटे बदलाव अपनाएं तो मोटापे और उससे जुड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है।विडंबना यह है कि हम आज ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ अत्यधिक प्रसंस्कृत और पैक किए गए खाद्य पदार्थों तक पहुँच स्वस्थ विकल्पों को चुनने की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक हो गई है। खराब पोषण, जो आक्रामक विपणन और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की आसान उपलब्धता से प्रेरित है, हमारे नागरिकों को मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी आजीवन स्वास्थ्य समस्याओं की ओर धकेल रहा है।
इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए, बढ़ते मोटापे और अधिक वजन से निपटने के लिए पोषण साक्षरता को बढ़ाना अब एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है।
'सही पोषण, देश रोशन' जैसे सार्थक नारे से प्रेरित होकर भारत सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में, वर्ष 2018 में पोषण अभियान की शुरुआत की। पोषण अभियान, संपूर्ण कल्याण के लिए अच्छे पोषण को प्राथमिकता देने की भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जहाँ पोषण साक्षरता एक प्रमुख माध्यम के रूप में कार्य करती है। इस अभियान के अंतर्गत वर्ष में दो बार होने वाले कार्यक्रमों ने महत्वपूर्ण पोषण विषयों के इर्द-गिर्द देशभर में जागरूकता और सहभागिता बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
भारत अब जब अपना 8वां पोषण माह मना रहा है, तो यह आवश्यक है कि हम मोटापे पर ध्यान केंद्रित करें जो आज एक बढ़ती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है और बच्चों सेलेकर किशोरों तथा वयस्कों तक, सभी आयु वर्गों को प्रभावित कर रहा है।हमारे चारों ओर यह साफ़ देखा जा सकता है कि चिप्स, बर्गर, फ्राईज, मीठे पेय पदार्थ और झटपट तैयार होने वाले स्नैक्स जैसे सस्ते और आसानी से उपलब्ध खाद्य पदार्थ अब धीरे-धीरे दाल, रोटी, चावल और सब्जियों जैसे पौष्टिक घर के बने भोजन की जगह ले रहे हैं।
अपर सचिव, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय
बच्चे और किशोर अब पोषण की तुलना में स्वाद को अधिक प्राथमिकता देने लगे हैं। अनियमित नींद और देर रात तक स्क्रीन देखने की आदत शरीर के चयापचय को प्रभावित करती है। अधिक मात्रा में खाना, बार-बार नाश्ता करना और रोज्ज मीठे पेय जैसे कि सोडा और पैक्ड जूस का सेवन करना इस समस्या को और भी गंभीर बना रहे हैं। बाहर का बना खाना खाने का बढ़ता हुआ चलन और फास्ट फूड पर निर्भरता (जहाँ भोजन कुछ ही मिनटों में हमारे दरवाजे तक पहुँच जाता है) ने सुविधा को पोषण से ऊपर कर दिया है। इसका असर पारिवारिक खाद्य वातावरण पर भी पड़ता है, जहाँ बच्चे अक्सर बड़ों की खाने की आदतों की नकल करते हैं।
.इस बदलाव ने एक ऐसी जीवनशैली को बढ़ावा दिया है, जहाँ युवा ज़्यादा समय मोबाइल और टेलीविजन स्क्रीन पर बिताते हैं और खेल के मैदानों से दूर रहते हैं जबकि वयस्क, लंबे कार्यदिवसों के कारण व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाते। ये सभी प्रवृत्तियाँ मिलकर मोटापे को एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में लगातार बढ़ावा दे रही हैं।हाल ही में जारी घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आँकड़े दर्शाते हैं कि अब ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में भोजन पर होने वाले ख़र्च में पेय पदार्थ और प्रसंस्कृत खाद्य सामग्री सबसे बड़ा हिस्सा बन चुकी है और यह प्रवृत्ति वर्षों से लगातार बढ़ रही है।
मोटापा मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करता है। बच्चों के लिए यह केवल "अतिरिक्त वजन" उठाने का बोझ नहीं है, इससे उन्हें तानों और मजाक का शिकार होना पड़ता है, आत्मविश्वास कम हो जाता है और मधुमेह तथा हृदय संबंधी बीमारियों जैसी समस्याएं कम उम्र में ही शुरू हो सकती हैं। वयस्कों में, मोटापा मधुमेह और हृदय रोग जैसी दीर्घकालिक गैर-संचारी बीमारियों की संभावना को बहुत बढ़ा देता है, जो न केवल संभालने में कठिन होती हैं, बल्कि परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ भी डालती हैं।
मोटापे के दूरगामी परिणाम
मोटापे के प्रभाव केवल बाहरी दिखावे तक सीमित नहीं होते, बल्कि इसके गहरे और गंभीर परिणाम सामने आते हैं। यह जोड़ों में दर्द, पीठ की समस्याओं और गतिशीलता में कमी का कारण बन सकता है, जिससे दैनिक जीवन की सामान्य गतिविधियाँ भी कठिन हो जाती हैं।हार्मोनल असंतुलन जैसे पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस), बांझपन और समय से पहले यौवनारंभ का मोटापे से गहरा संबंध है।
मोटापा कई प्रकार के कैंसरों, जैसे आंत, स्तन और यकृत कैंसर के खतरे को भी बढ़ाता है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका प्रभाव उतना ही चिंताजनक है, क्योंकि अक्सर एकाग्रता में कमी, शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट और संज्ञानात्मक क्षमता में ह्रास देखा जाता है।उपचार का आर्थिक बोझ और उत्पादकता में कभी परिवारों और समाज पर अतिरिक्त दबाव डालती है। सबसे चिंताजनक है इसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी चक्र जिसमें अधिक वजन वाले माता-पिता के बच्चों में भी मोटापे की संभावना अधिक रहती है और यह समस्या आने वाली पीढ़ियों तक बनी रहती है। इसी कारण हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने सभी से आह्वान किया है कि वे सरल दैनिक आदतें अपनाएं-जैसे भोजन में तेल का कम उपयोग ताकि शरीर को स्वस्थ रखा जा सके और भविष्य में बीमारियों के खतरे को कम किया जा सके।
हम जानते हैं कि मोटापे और अधिक वजन से बचाव ही इसके प्रबंधन का मूल है और अधिकांश रोकथाम संबंधी व्यवहार पोषण साक्षरता पर आधारित हैं। बार-बार दिए गए मानकीकृत संदेश और जिम्मेदार अभिभावकता, विशेष रूप से छोटे बच्चों और किशोरों की आदतों को आकार देने में बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह संतुलित आहार के महत्व, जंक फूड से परहेज और शारीरिक गतिविधियों में भागीदारी को मजबूत करता है।
खानपान की आदतों में सुधार के लिए प्रयास
प्रत्यक्ष स्रोत जैसे जनसंचार माध्यम (टीवी, रेडियो और सोशल मीडिया), विद्यालय-आधारित कार्यक्रम, सहभागितापूर्ण व्याख्यान, सामुदायिक गतिविधियाँ और रोल प्ले तथा अप्रत्यक्ष माध्यम जैसे साथियों के बीच संवाद और अनुकरण- ये सभी खाद्य विकल्पों में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस वर्ष पोषण माह के दौरान हमारा ध्यान व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों पर है ताकि मोटापे के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके और बेहतर पोषण को बढ़ावा दिया जा सके। इसमें अभिभावक, शिक्षक, आंगनवाड़ी दीदी, स्वास्थ्यकर्मी, मुखिया और सरपंच सभी की भूमिका अहम है, ताकि बच्चों और परिवारों को स्वस्थ जीवनशैली की ओर बढ़ने का मार्गदर्शन मिल सके।हम उनकी सामूहिक आवाज का उपयोग करके निम्नलिखित प्रमुख संदेश फैलाने की योजना बना रहे है: अच्छा पोषण और स्वास्थ्य नियमित रूप से वजन और लंबाई की माप से शुरू होता है-अपने पोषण की स्थिति जानने के लिए नियमित रूपसे वजन करें।
संतुलन बनाए रखने के लिए नमक, चीनी, मिठाई, तेल और तली हुई चीजों का सेवन सीमित करें और जंक फूड कम करें-स्थानीय रूप से उपलब्ध विकल्पों में से पौष्टिक भोजन चुनें।सचेत होकर भोजन करना, खाद्य लेबल ध्यान से पढ़ना और पर्याप्त नींद सुनिश्चित करना स्वास्थ्य का सहारा बनता है-इन आदतों का नियमित रूप से पालन करें। प्रतिदिन कम से कम 60 मिनट तक शारीरिक गतिविधि या योग करना, साथ ही लंबे समय तक बैठे रहने वाले कार्यों के बीच ब्रेक लेना, शरीर को सक्रिय बनाए रखता है, फिट रहने के लिए समय जरूर निकालें।महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भी आंगनवाड़ी केंद्रों में तेल और चीनी बोर्ड लगाकर अधिक वजन और मोटापे पर जागरूकता बढ़ा रहा है।
ये प्रदर्शन संवाद शुरू करने, आत्ममंथन को प्रोत्साहित करने और परिवारों को स्वस्थ भोजन विकल्पों की ओर मार्गदर्शन करने के लिए तैयार किए गए हैं। हालांकि, इनका वास्तविक प्रभाव तभी संभव है जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, अभिभावक, शिक्षक और सामुदायिक नेता इन्हें सक्रिय शैक्षिक उपकरण के रूप में उपयोग करें और दैनिक जीवन में लागू करें।स्वस्थ आदतों को अपनाना सरल लग सकता है, लेकिन इसके लिए प्रतिबद्धता और बदलाव की इच्छा आवश्यक है।
यदि भारत भर के करोड़ों परिवार मिलकर ये छोटे-छोटे कदम उठाएं, तो हम परिवर्तन की एक सशक्त लहर पैदा कर सकते हैं। जैसे-जैसे हमारा देश विकसित भारत के विजन की ओर अग्रसर हो रहा है, अच्छे पोषण की संस्कृति का निर्माण आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और भविष्य को सुरक्षित करने में मदद करेगा।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
