
वायु प्रदूषण से सांस एवं एलर्जिक साइनाइटिस की हो सकती है समस्या Publish Date : 22/11/2025
वायु प्रदूषण से सांस एवं एलर्जिक साइनाइटिस की हो सकती है समस्या
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
सर्दियों में प्रदूषण, फाग और स्मॉग आदि से बचकर रहें-
देश विभिन्न राज्यों में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर के साथ एलर्जिक साइनाइटिस की समस्या भी लोगों में बढ़ जाती है। इसमें लोगों को बार-बार छींक आने नाक बहने और नाक ब्लॉक हो जाने की समस्या होती है। इससे सांस लेने में भी दिक्कत होती है और इसे हल्के में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए, समय पर सही से उपचार करना चाहिए। यदि 3 से 4 साल तक यह समस्या अनियंत्रित रहती है तो दमा जैसी गंभीर बीमारी में भी यह परिवर्तित हो सकती है।
इसकी संभावना लगभग 60 से 70% तक बनी रह सकती है। एलर्जिक साइनाइटिस बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को परेशान करती है। बचाव के लिए धूल घर के बाहर जलते कचरे व अन्य प्रकार के धुएं और घर के अंदर अगरबत्ती के धुएं से भी बचने की आवश्यकता होती है। प्रदूषण से उपजे स्मॉग के दौरान मास्क लगाकर निकालने की जरूरत होती है। इसके अलावा इन दिनों प्रदूषण के चलते सांस फूलने की मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं। सांस फूलने की शिकायत खून की कमी से, दमा होने से, गुर्दे की खराबी होने से, थायराइड और दिल की बीमारी से जुड़ी हो सकती है।
इसलिए समय पर जांच करा लें, जिससे कि पता चल सके कि आपकी सांस क्यों फूल रही है। यह बातें यदि आप ध्यान में रखेंगे तो निश्चित रूप से आप अपने को स्वस्थ रख सकते हैं।
सर्दी बढ़ने पर जुकाम, गला खराब होना, खांसी और बलगम की स्थिति बनती है, कई बार बुखार भी आ सकता है। अस्थमा और सीओपीडी की बीमारी फेफड़ों से जुड़ी हुई होती है। सांस लेने में कती होती है, अस्थमा अनुवांशिक एलर्जी जैसे धूल पालतू पशुओं वायरल संक्रमण से हो सकता है। यह बीमारी पाचन से शुरू हो जाती है धूम्रपान या धुआं इसका कारण हो सकते हैं। यह बीमारी 40 वर्ष की आयु के बाद होती है, बचाव के लिए धूल, धुएं, पालतू पशुओं की रूसी से बचकर रहना चाहिए। प्रदूषण के दौरान मॉस्क का उपयोग करना चाहिए। समस्या होने पर एक्स-रे और पलमोनरी फंक्शन टेस्ट करने की आवश्यकता पड़ती है।
प्रदूषण से किन लोगों को संक्रमण का खतरा होता है

लगातार प्रदूषण में रहने से 5 साल से कम उम्र के 8 से 22% बच्चों को फेफड़े का संक्रमण का खतरा बना रहता है। बड़ों में 1 से 2% यह खतरा रहता है प्रदूषण के दौरान बाहर निकलने पर मॉस्क लगाने की सलाह डॉक्टर द्वारा दी जाती है। वैसे रुमाल का प्रयोग भी कर सकते हैं। स्मॉग होने पर धूप निकलने के बाद ही बाहर जाना उचित रहता है। शाम को 4ः00 बजे के बाद घर से निकालने से बचना चाहिए क्योंकि इस समय प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ रहता है।
प्रदूषण का कितना स्तर खतरनाक होता है
विभिन्न जिलों में देखा जा रहा है कि प्रदूषण के स्तर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह बढ़ोतरी 2.5 पीपीएम और 10 पीपीएम तक पहुंचती है तो प्रदूषण का स्तर काफी बड़ा हुआ माना जाता है। इसके अलावा वातावरण में सल्फर नाइट्राइड ऑक्सीडेस मोनोऑक्साइड जैसी गैसों की मात्रा भी बढ़ जाती है जो कि काफी नुकसानदेह होती है। इस समय फाग तथा स्मॉग भी देखने को मिलता है। फाग एक ऐसी स्थिति है जो प्राकृतिक होती है, जिसे वाष्प कहते हैं, स्मॉग के साथ ही हानिकारक कार्बनिक पार्टिकल होते हैं। हानिकारक गैसों से दमा अटैक्स, संक्रमण निमोनिया और सांस लेने की तकलीफ, आंखों में जलन जैसी परेशानियां होती हैं और यह सभी गैस फेफड़ों के लिए नुकसानदायक होती है।
सांस अटैक को कैसे पहचाने
जब सांस लेने में काफी दिक्कत होने लगती है तो उसकी जांच की जाती है। जांच में देखा गया है कि सांस नली में सूजन आ जाती है, अथवा सिकुड़ जाती है, बलगम बढ़ जाता है, फेफड़ों में हवा का जाना आना मुश्किल हो जाता है। सांस फूलना, सीने में जकड़न, घबराहट साथ-साथ घरघराहट की आवाज आना मुख्य लक्षण है। इसे दमा का अटैक कहते हैं। इसमें सीने में दर्द नहीं होता है, जबकि हार्ट अटैक में घबराहट पसीना आना बाएं हाथ या गले में दर्द होना प्रमुख लक्षण है। दोनों ही समस्याएं एक साथ हो सकती है। चिकित्सा एक ब्लड जांच पीएफटी आदि जांच करते हैं उसके उपरांत पता चलता है कि मरीज को कितनी दिक्कत है।
खान पान में किन बातों का ध्यान रखें
कुछ लोगों को सांस की आनुवंशिक समस्या हो सकती है। परिवार में माता-पिता दोनों को अस्थमा हो तो 50% संभावना बीमारी अगली पीढ़ी में जाने की होती है, यदि किसी एक को है तो 25% संभावना होती है। यह शुरुआती लक्षण है जिसे उपचार के लिए सतर्क रहना चाहिए। इससे के लिए सबसे पहले धूम्रपान छोड़ दें, यही परेशानी के मुख्य वजह है जो लोग धूम्रपान करते हैं उनके फेफड़ों में बलगम बनने लगता है। पलमोनरी फंगस टेस्ट करने की आवश्यकता पड़ती है, जिन लोगों को सांस फूलना बंद नहीं होता है तो उन लोगों को ब्रोंकाइटिस होने की संभावना होती है। इसके लिए चिकनी चीजों अत्यधिक तेल मसाला युक्त भोजन से बचने की आवश्यकता होती है।
प्रदूषित हवा में रहने का मतलब है कि आप प्रतिदिन 20 सिगरेट पी रहे हैं। धूम्रपान कैसा भी हो फेफड़ों को छलनी करता है। धूम्रपान न करने पर भी यह हाल है कि प्रदूषित हवा के चलते लोगों को यह समस्या हो रही है। प्रदूषित हवा सिगरेट से भी ज्यादा खतरनाक होती है। फेफड़ों की ताकत के लिए अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियों से लेकर चुकंदर, अदरक, लहसुन, ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर चीज ले सकते हैं यह आपकी इम्यूनिटी को बढ़ाने में सहयोग करेंगे।

सांस प्रत्येक मानव में जरूरी है बिना सांस के जीवन संभव नहीं है। सही मायने में कहा जाए तो जीवन का आधार ही सांस है। लेकिन जब यही सांस फूलने लगे और छाती में घबराहट महसूस होने लगे तो यह क्रॉनिक अट्रैक्टिव पलमोनरी डिजीज का संकेत भी हो सकता है। सीओपीडी फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी है जिसके बारे में जागरूकता बेहद जरूरी है। इसलिए हर साल नवंबर के तीसरे बुधवार को विश्व सीओपीडी दिवस मनाया जाता है। डॉक्टर दिव्यांशु सेंगर ने बताया कि सर्दियों के मौसम में लोग अक्सर सांस फूलने लगातार खांसने और थकान जैसी शुरुआती लक्षणों को हल्के में लेते हैं। यही संकेत सीओपीडी की शुरुआत के हो सकते हैं। देश में लगभग 5.50 करोड़ लोगों को यह बीमारी है। सीओपीडी देश में मौत का दूसरा प्रमुख कारण है। सही समय पर पहचान और उपचार से इस बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है
सीओपीडी के क्या होते हैं लक्षण
पुरानी खांसी यह खांसी लगातार बनी रहती है और अक्सर इसके साथ बलगम भी आता है। कई बार इसे मामूली सर्दी जुकाम समझ कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सांस फूलना शुरुआत में सीढ़ियां चढ़ना या तेज चलने पर सांस फूलती है, लेकिन बीमारी के बढ़ने पर आराम करते समय भी सांस लेने में तकलीफ होने लगती है।
- छाती में घबराहट सांस लेते या छोड़ते समय छाती से सिटी जैसी आवाज आने लगती है।
- सीने में जकड़न जैसा महसूस होना जैसे छाती पर कोई भारी चीज रखी हुई है।
- इसके अलावा मरीजों को थकान, वजन कम होना और सर्वियों का मतलब है लक्षणों का अचानक और तेजी से बिगड़ जाना, जो अक्सर इन्फेक्शन या प्रदूषण के कारण होता है। यह स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत चिकित्सीय सहायता की जरूरत पड़ती है।
बीमारी के करण जिससे पनपती है यह बीमारी
धूम्रपान यह सीओपीडी का सबसे अहम कारण है। सिगरेट, बीड़ी या हुक्का पीने वालों में इस बीमारी का खतरा सबसे अधिक होता है। यह फेफड़ों के टिशु को सीधे नुकसान पहुंचता है।
- वायु प्रदूषण लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से भी फेफड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।
- घरेलू वायु प्रदूषण ग्रामीण इलाकों में लकड़ी कोयला या उपले के चूल्हे पर खाना बनाने से निकलने वाला धंुआ, खासकर महिलाओं में सीओपीडी का एक मुख्य कारण बन रहा है।
- मेटल और माइनिंग इंडस्ट्री, सीमेंट, कोयला सूती कपड़े की धूल या केमिकल के संपर्क में आने वाले लोगों को भी इस बीमारी का खतरा रहता है।
- जेनेटिक कारण कुछ मामलों में अल्फा ए एंटी ट्रिप्सिन नाम की प्रोटीन की कमी भी सीओपीडी का कारण बन सकती है, भले ही व्यक्ति धूम्रपान न करता हो।
- स्वस्थ आहार ले जो संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद करता है।
- धुएं, आतिशबाजी, पटाखे आदि के संपर्क में आने से बचें, खासकर यदि आप सीओपीडी से पीड़ित है।
- जब बाहरी वायु की गुणवत्ता खराब हो तो सीओपीडी से पीड़ित लोगों को घर पर रहना चाहिए।
- फेफड़ों की कार्य क्षमता के लिए स्पायरोमेट्री परीक्षण कराऐं।
डॉक्टर दिव्यांशु सेंगर के अनुसार सीओपीडी बीमारी के प्रभावी इलाज और आगे की जटिलताओं को रोकने के लिए प्रारंभिक निदान और उपचार महत्वपूर्ण होता है। स्पायरोमेट्री फेफड़ों की कार्यक्षमता का परीक्षण बीमारी का शीघ्र निदान करने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया सीओपीडी पूरी तरह से ठीक होने वाली बीमारी नहीं है, अगर इलाज न किया जाए तो समय के साथ इसके लक्षण बढ़ते जाते हैं। इस बीमारी के कारण फेफड़ों में होने वाला नुकसान स्थाई होता है।
इसके इलाज का लक्ष्य रोग की प्रगति को धीमा करना और फेफड़ों की कर क्षमता में गिरावट को कम करना होता है। देश में सीओपीडी के लगभग दो तिहाई मामलों का निदान नहीं हो पाता है।
फ्लू निमोनिया और आरएसवी वैक्सीन लाभदायक
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर ने बताया कि इस बीमारी में इलाज के लिए फ्लू, निमोनिया और नई वैक्सीन आरएस लाभदायक होती है। इनहेलर के उपयोग से बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। यही रिहैबिलिटेशन कार्यक्रम इसके इलाज में महत्वपूर्ण रूप से मदद कर सकते हैं। जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए सही इनहेलर तकनीकी तथा कुछ रोगियों के लिए नेबुलाइजेशन भी मददगार साबित होता है।
धूम्रपान नहीं करने वालों को भी होता है खतरा
सर्दी और वायु प्रदूषण के चलते इन दिनों क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पलमोनरी डिजीज बढ़ जाती है जो लोग धूम्रपान नहीं करते उन्हें भी सीओपीडी होने का खतरा बना रहता है। वायु प्रदूषण से खासकर बच्चों और महिलाओं में यह समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण पीएम 2.5 और 10 शरीर के जिन में छिपे न्यूट्रिशन को सक्रिय करके सांस नली को नुकसान पहुंचाते हैं और धीरे-धीरे फेफड़ों तक संक्रमण पहुंचने लगता है और कैंसर के कारक विकसित होने लगते हैं। लंबे समय तक अगर सीओपीडी की समस्या बनी रहती है तो कई अन्य तरह की बीमारियों का जोखिम बढ़ता है।
बचाव के तरीके समय पर प्रारंभ करें
- धूम्रपान छोड़ने और वायु प्रदूषण के सीधे संपर्क में आने से बचें।
- प्राणायाम से फेफड़ों को मजबूती की मिलती है इसलिए इसको प्रारंभ करें गहरी लंबी सांस लेकर रोजाना प्रात अभ्यास करें।
- निमोनिया से सुरक्षा के लिए वैक्सीनेशन अवश्य कराएं।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाए सही आहार व्यायाम की आदत डालें।
- सक्रियता बढ़ाएं, विटामिन व फाइबर युक्त आहार एवं फल ग्रहण करें।
- सांस लेने में परेशानी होने पर चिकित्सा के परामर्श पर इनहेलर की मदद ले।

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
