
माइक्रो प्लास्टिक सब्जियों के माध्यम से पहुंच रहा है मानव शरीर में Publish Date : 29/10/2025
माइक्रो प्लास्टिक सब्जियों के माध्यम से पहुंच रहा है मानव शरीर में
डॉ0 दिव्यांशु सेंगर एवं मुकेश शर्मा
भारत, चीन और इटली के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में देखा गया है कि गाजर, पालक, सलाद और टमाटर जैसी सब्जियों के ऊतकों में माइक्रो प्लास्टिक के अंश मौजूद हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कण पानी फास्फेट आधारित उर्वरकों और मिट्टी प्रदूषण के माध्यम से पौधों में प्रवेश कर रहे हैं। गांव और देहातों में हर कहीं प्लास्टिक कचरा मिट्टी में मिल रहा है। अशिक्षा, अज्ञानता और जागरूकता की कमी के कारण यह पौधों की जड़ों तक पहुंच रहे हैं। प्लास्टिक के यह सूक्ष्म कण पौधों की जड़ों के द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं और जायलम के माध्यम से पत्तियां और फलों तक पहुंच जाते हैं।
मानव जीवन की पोषण श्रृंखला में सब्जियां सबसे बुनियादी और शुद्ध समझी जाती रही है, परंतु हाल ही में किए गए शोधों से पता चला है कि अब सब्जियों के उत्तकों में भी माइक्रो प्लास्टिक के कण पाए गए हैं। इससे पहले कि यह कण मां के दूध, रक्त और समुद्री भोजन में भी मिल चुके हैं। इससे साफ है कि प्रदूषण ने पृथ्वी के हर स्तर पर अपनी पकड़ बना ली है। हवा, पानी, मिट्टी और अन्य खाद्य सामग्री तक माइक्रो प्लास्टिक के इतने सूक्ष्म होते हैं कि मिट्टी, भूजल, वर्षाजल के द्वारा पौधों की जड़ों तक पहुंच जाते हैं।

यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पहले माइक्रो प्लास्टिक केवल समुद्र और जलचर जीवों तक सीमित समझे जा रहे थे। वर्ष 2021 में आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने मानव रक्त में इसकी उपस्थिति सिद्व की थी तो वर्ष 2022 में यह मां के दूध में भी यह पाए गए और वर्ष 2023 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने बताया कि औसतन व्यक्ति प्रति सप्ताह लगभग 5 ग्राम प्लास्टिक को निगल रहा है। यानी एक क्रेडिट कार्ड जितना माइक्रो प्लास्टिक पहुंच रहा है हमारे शरीर में प्रति सप्ताह।
अब जब कि इसके अवशेष सब्जियों में मिलाने लगे हैं तो स्पष्ट है कि प्रदूषण हमारी पूरी खाद्य श्रृंखला में धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है।
यदि भारत की बात की जाए तो यहाँ यह समस्या और भी गहरी हो जाती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत में हर साल लगभग 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से लगभग 60 प्रतिशत कचरे का पूर्ण चक्रण नहीं हो पाता है।
यह कचरा मिट्टी और जल स्रोतों में चला जाता है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और वाराणसी के आसपास के कृषि क्षेत्र में मिट्टी में किए गए अध्ययन बताते हैं कि लगभग 70 प्रतिशत खेतों की मिट्टी में माइक्रो प्लास्टिक के कण मौजूद है। भारत के कई नगर निगम शीवर से निकले कीचड़ को खाद की तरह खेतों में डालते हैं, जबकि यह कीचड़ प्लास्टिक फाइब्रो कधों से भरा होता है। यही फाइबर पौधों के जरिए हमारे भोजन में पहुंच रहे हैं। माइक्रो प्लास्टिक के कारण शरीर में जाकर ऑक्सीडेटिव तनाव हार्मोन असंतुलन और कोशिकीय क्षति उत्पन्न करते हैं, इससे कैंसर, हृदय रोग, प्रजनन क्षमता में कमी और तंत्रिका तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि नैनो प्लास्टिक कण मस्तिष्क और भ्रूण तक पहुंच जाते हैं, जिससे गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर गंभीर असर हो सकता है। माइक्रो प्लास्टिक मिट्टी की संरचना को भी बदल देते हैं। इससे मृदा की जलधारण क्षमता कम होती है और सूक्ष्म जीवों की संख्या भी कम होती है। यह फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता को प्रभावित कर खाद्य सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं। इस संकट से निपटने के लिए नीतिगत कृषि और व्यक्तिगत स्तर पर कदम उठाने आवश्यक हैं।
सरकार को सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्त कानून लागू करना चाहिए। प्लास्टिक मिश्रित खाद या शिविज कीचड़ को खेतों में डालने पर रोक लगनी चाहिए। इसके अलावा मिट्टी तथा जल में माइक्रो प्लास्टिक की नियमित जांच की जानी चाहिए। किसानों को स्वच्छ जल से सिंचाई करने और प्राकृतिक खाद जैसे वर्मी कंपोस्ट के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। प्लास्टिक मुक्त खेती को सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाना समय की मांग बन चुकी है।
व्यक्तिगत स्तर पर भी बदलाव जरूरी है हमें बोतल बंद पानी और प्लास्टिक पैकिंग वाले खाद्य पदार्थों का प्रयोग कम करना चाहिए। सिंथेटिक कपड़ों की ढुलाई में माइक्रोफाइबर फिल्टर का प्रयोग उपयोगी हो सकता है। सब्जियों को बहता पानी में अच्छी तरह धोना और स्थानीय जैविक उत्पादों को प्राथमिकता देना अधिक सुरक्षित है। माइक्रो प्लास्टिक अब केवल प्रदूषण का विषय नहीं रहा बल्कि अब यह जीवन और स्वास्थ्य का प्रश्न बन चुका है। अब हमारे खेतों में उगने वाले अन्न में प्लास्टिक घुलने लगे तो यह संकेत है कि हमें अपने विकास की दिशा और जीवन शैली पर पुनर्विचार करना होगा।
पर्यावरण को बचाना अस्तित्व की अनिवार्यता है, यदि अभी हमने सचेत होकर कदम नहीं उठाए तो आने वाली पीढ़ियां शायद शुद्ध भोजन और स्वच्छ मिट्टी के बारे में केवल किताबों में ही पढ़ेंगी, इसलिए समय आ गया है कि हम सभी लोगों को एक वैचारिक क्रांति के द्वारा प्लास्टिक के उपयोग को बंद करना ही होगा और सब्जियों का उत्पादन ऐसी जगह पर करना होगा जहां पर प्लास्टिक का कचरा प्रयोग ना किया जा रहा हो। समय की मांग है कि हम लोग अपनी जीवन शैली पर पुनर्विचार कर प्लास्टिक को खाने से बच सकते हैं।
‘‘हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक है प्लास्टिक, जो कि सब्जियों के माध्यम से अब मानव के पेट में पहुंच रहा है।’’
- डॉ0 दिव्यांशु सेंगर

लेखक: डॉ0 दिव्यांशु सेंगर, प्यारे लाल शर्मां, जिला चिकित्सालय मेरठ मे मेडिकल ऑफिसर हैं।
