अंगूर की खेती कब और कैसे      Publish Date : 16/10/2026

            अंगूर की खेती कब और कैसे

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

भारत में व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती पिछले लगभग छः दशकों से की जाती रही है। अंगूर एक महत्वपूर्ण, नगदी और लाभकारी फसल है, जिसे भारत के विभिन्न हिस्सों में उगाया जाता है। महाराष्ट्र आज के समय में देश का सबसे बड़ा अंगूर उत्पादक राज्य है, जहाँ सबसे अधिक क्षेत्र में अंगूर की खेती की जाती है। इसकी खेती किसानों के लिए फायदेमंद होती है क्योंकि अंगूर का उपयोग ताजे फल के रूप में, किशमिश, और वाइन (शराब) बनाने के लिए भी किया जाता है।

अंगूर की खेती में अच्छे उत्पादन के लिए उपयुक्त जलवायु, सही किस्मों का चयन और उचित खेती तकनीक का पालन करना अति आवश्यक होता है। अंगूर के पौधे नाज़ुक होते हैं और उनकी सही देखभाल करना भी बहुत ज़रूरी होती है। आज की अपनी इस ब्लॉग पोस्ट में अंगूर की खेती कैसे की जा सकती है और इसके लाभकारी होने के लिए क्या आवश्यकताएं होती हैं, के सम्बन्ध हम आपको महत्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं।

अंगूर की खेती फलों की खेती के अन्तर्गत एक पुरानी परंपरा रही है, जो आज भी किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। अच्छी उपज के लिए, अंगुर की खेती के विभिन्न पहलुओं को समझना आवश्यक है, जैसे कि मिट्टी का चयन, सिंचाई विधियाँ और कीट प्रबंधन आदि।

अंगूर की उन्नत किस्में

                                

  • मस्कट।
  • पचाद्रक्षा।
  • अनाब-ए-शाही।
  • थॉम्पसन सीडलेस।
  • अर्का श्याम।
  • अर्का कंचन।
  • अर्का हंस।
  • माणिक चमन।
  • सोनाका।
  • शरद सीडलेस।
  • फ्लेम सीडलेस आदि अंगूर की उन्नत एवं भरपूर पैदावार देने वाली किस्में हैं।

अंगूर की खेती करने के लिए एक अनुकूल जलवायु की आवश्यकता होती है। गर्म और शुष्क मौसम इस फसल के विकास के लिए अनुकूल होता हैं।

अंगूर की खेती के लिए उचित मिट्टी और जलवायु

अंगूर की फसल अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ, दोमट मिट्टी में सबसे अच्छी होती है जिसका pH 6.5 - 7.0 और Ec 1.0 से कम हो। शुष्क मौसम और हल्की ठंड फल की क्वालिटी और उपज को बेहतर बनाता है। अंगुर की खेती में रोपण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। सही तरीके से रोपण करने से फसल का विकास बेहतर होता है। अंगुर की खेती में पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना भी बहुत आवश्यक होता है ताकि पौधों को पर्याप्त सूर्य का प्रकाश और पोषक तत्व मिल सकें।

खेत की तैयारी और रोपण विधि

मस्कट के लिए 0.6 मीटर चौड़ाई और 0.6 मीटर गहराई के गड्ढे 3 मीटर की दूरी पर और अन्य किस्मों के लिए 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर के गड्ढे खोदने चाहिए। अच्छी तरह से सड़ी हुई FYM या कम्पोस्ट या हरी पत्ती की खाद को गड्ढों में डाल देना चाहिए और फिर मिट्टी से ढक देना चाहिए। जून-जुलाई में अंगूर की जड़ वाली कटिंग लगाना उचित माना जाता है। अंगुर की खेती में प्रति एकड़ उचित पौधों की संख्या का पालन करना चाहिए, ताकि फसल की उपज में वृद्धि हो सके।

पौधों के बीच की उचित दूरी

अंगुर की खेती में सिंचाई के सही तरीके अपनाने से फसल की गुणवत्ता में भी सुधार होता है।

मस्कट के लिए कतार से कतार की दूरी 3 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 2 मीटर और अन्य किस्मों के लिए कतार से कतार की दूरी 4 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 3 मीटर सही मानी जाती है। अंगुर की खेती में बेलों को ट्रेल करने से फसल का उत्पादन बढ़ता है। सही प्रशिक्षण तकनीकें अपनाना अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है।

प्रति एकड़ पौधों की संख्या

अंगुर की खेती में छंटाई का विशेष महत्व होता है। उचित छंटाई तकनीकों से फसल का विकास अधिकतम होता है। अंगुर की खेती में विशेष प्रथाओं का पालन करना आवश्यक है, जिससे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में वृद्धि होती है। अंगूर की खेती में प्रति एकड़ 500 से 600 पौधे लगाए जाने सुनिश्चित् किए जाने चाहिए। पौधों के बीच और कतारों की बीच की दूरी का ध्यान रखना चाहिए ताकि उनके विकास पर बुरा असर न पड़े और हवा और प्रकाश आदि ठीक तरीके से मिल सके।

सिंचाईः पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए सही मात्रा में पानी की जरूरत होती है। पानी की उचित मात्रा और समय निर्धारित करता है की फसल में कितनी पैदावार होगी। पौधे लगाने के तुरंत बाद और उसके बाद तीसरे दिन पानी देना चाहिए। जब पौधे थोड़े बड़े हो जाये तो हर सप्ताह पानी दें। छंटाई से 15 दिन पहले और कटाई से 15 दिन बाद सिंचाई रोक दें ताकि पौधे में बीमारियों का खतरा कम हो जाये।

अंगूर बेल प्रशिक्षण

बेलों को सही दिशा में बढ़ाने के लिए उचित सहारी देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है और 2 मीटर की ऊँचाई पर शाखाएँ बढ़ाई जाती हैं। मुख्य शाखाओं को विपरीत दिशाओं में विकसित और प्रशिक्षित किया जाता है। आगे की टिप पर द्वितीयक और तृतीयक नई छोटी शाखाएँ निकलती हैं, जो चारों तरफ फैलती हैं।

छंटाईः आमतौर पर मस्कट, पचाद्रक्षा, बैंगलोर ब्लू, अनाब-ए-शाही और अर्का हाइब्रिड के लिए चार कली तक छंटाई की जाती है, जबकि थॉम्पसन सीडलेस के लिए दो कली तक छंटाई उपयुक्त होती है। कली पूर्वानुमान तकनीक के अनुसार छंटाई का स्तर तय करना बेहतर है। कली पूर्वानुमान तकनीक एक वैज्ञानिक तरीका है, जिसके जरिए यह अनुमान लगाया जाता है कि किस कली से नई शाखाएं, फूल या फल निकलेंगे और किससे नहीं। वानस्पतिक विकास को बढ़ाने के लिए कमजोर और आधी पकी हुई शाखाओं को 1-2 कली तक काटना चाहिए। गर्मियों की किस्मों में छंटाई दिसंबर-जनवरी में और कटाई अप्रैल-मई में की जाती है। मानसून की किस्मों में छंटाई मई-जून में और कटाई अगस्त-सितंबर में की जाती है।

विशेष प्रथाएँ: फल लगने के बाद टहनियों की टिपिंग और गुच्छों को पंडाल में बांधना चाहिए। 12 से 15 अक्षीय कलियों और टर्मिनल कलियों की बढ़ती हुई टहनियों को काट दें। मटर के आकार की अवस्था में 20% बेरियों को हटाकर कॉम्पैक्ट गुच्छों में फल छांट देना चाहिए।

फल लगने के 10-12 दिन बाद गुच्छों को रसायन के घोल में डुबोएं ताकि शक्ति, उपज और गुणवत्ता के मापदंडों को बनाया रखा जा सके। फसल की वृद्धि के लिए बायोस्टिमुलेंट जैसे अमिनोफर्ट गोल्ड का उपयोग करें। बढ़िया उपज के लिए इसकी मात्रा 400 से 600 उस प्रति एकड़ रखें। इसमें अमीनो एसिड, कार्बन और सूक्ष्म पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। यह मिट्टी और फसलों के लिए एक बेहतरीन पोषण स्रोत है। पौधे के विकास के लिए PEP - GIBB 40 (Gibberellic Acid 40% WSG) जैसे ग्रोथ रेगुलेटर का छिड़काव फसल लगाने के 25 से 30 दिन बाद करें। इसकी मात्रा 6 ग्राम से 8 ग्राम प्रति एकड़ रखना उत्तम होता है।

पौधों की सुरक्षा

                                             

कीट

पिस्सू भृंग, थ्रिप्स, मीली बगः BAREEK (Beauveria bassiana) 5 मिली/लीटर पानी का छिड़काव करें और हर 8-10 दिन में दोहराएं। इस कीट को अंडे देने से रोकने के लिए छंटाई के समय ढीली छाल को हटाया जा सकता है।

अंगूर के रोग

अंगुर की खेती का संक्षिप्त विवरण यह है कि यह एक लाभकारी फसल है, जिसमें उचित प्रबंधन से इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

पाउडरी फफूंद

फफूंद को नियंत्रित करने के लिए सुबह के समय Peptilis (Bacillus subtilis) 2-5 लीटर/एकड़ या Sulph-Pep (Sulphur 80% WDG) का 20-25 ग्राम/एकड़ के दर से छिड़काव करना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज व डाउनी फफूंद CHLOPER (Copper Oxychloride 50% WP) का 1 किलोग्राम/एकड़ के दर से छिड़काव करें। मौसम की स्थिति के आधार पर छिड़काव की संख्या बढ़ाएं।

फलों की तुड़ाई का समय

अंगूर की फसल की तुड़ाई 120-150 दिनों में की जाती है, जब फल पूर्ण रूप से पक जाते हैं। कटाई का समय क्षेत्र की जलवायु और किस्म के अनुसार भिन्न हो सकता है, लेकिन आमतौर पर मार्च से मई तक इसकी कटाई की जाती है।

अंगूर की फसल का उत्पादन

अंगूर की फसल का उत्पादन प्रति एकड़ 8 से 12 टन हो सकता है, जो किस्म, जलवायु, और खेती के तरीकों पर निर्भर करता है। उचित प्रबंधन और सही तकनीक के साथ उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।