स्ट्रॉबेरी की खेती कैसे और कब करें      Publish Date : 21/08/2026

       स्ट्रॉबेरी की खेती कैसे और कब करें

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

स्ट्रॉबेरी की खेती करना इसकी खेती करने में सलंग्न किसानो की आर्थिक स्थिति को सुधारने में बहुत लाभकारी साबित हो रही है, पहले इसकी खेती सिर्फ पहाड़ी और देश के ठन्डे क्षेत्रों में ही की जा सकती थी, लेकिन इसके बढ़ते व्यापरिक मूल्य और कृषि वैज्ञानिक के शोधो के चलते अब मैदानी भागो में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है, पहले भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊपरी हिस्सों में अधिक की जाती थी लेकिन अब स्ट्रॉबेरी की खेती महारष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के भी कई किसान अब सफलता पूर्वक खेती कर रहे है।

कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा अब तक स्ट्रॉबेरी की कुल 600 किस्मे खोजी जा चुकी है, स्ट्रॉबेरी में विटामिन ‘सी, आयरन, पोटेशियम और फाइबर पाए जाते है, इसका उपयोग खाने की चीजों में एसेंसे के रूप में, जेम आइसक्रीम, चॉकलेट, केक और सौन्दर्य प्रसाधन में बहुत अधिक किया जाता है इसलिए वर्ष भर इसकी बाजार में मांग बनी रहती हैं।

स्ट्रॉबेरी के पौधों को मध्यम तापमान की आवश्यकता होती है, इसलिए इसकी बुवाई सितम्बर से अक्टूबर के बीच में की जाती है, लेकिन ग्रीनहाउस में स्ट्रॉबेरी की खेती वर्ष भर की जा सकती है, ग्रीनहाउस में खेती करने से फलो की गुणवत्ता और मात्रा सामान्य खेती की तुलना में काफी बेहतर होती है।

स्ट्रॉबेरी की प्रमुख किस्मे

वैसे देश में स्ट्रॉबेरी की अधिकतर किस्मे विदेशो में विकसित की गई है, लेकिन ये देश में भी अच्छे परिणाम देती है, स्ट्रॉबेरी की कुछ प्रचलित किस्मे इस प्रकार हैः-

स्वीट चार्लीः-

स्वीट चार्ली स्ट्रॉबेरी के पौधो को सूर्य की धुप की आवश्यकता होती है, ये पौधे नम, अच्छी तरह से सुखी मिट्टी में जिसमे कार्बनिक पदार्थों भरपूर हो, अच्छी उपज देती हैं, ये सूखे के प्रति सवेंदशील होते है इसलिए सिंचाई आवशयक होती है, इसमें रोपण के 30 से 40 दिन बाद पुष्पन होने लगता है।

वाइब्रेंटः-

स्ट्रॉबेरी की यह किस्म सबसे अच्छी और शुरुआती किस्मों में से एक है, जिसमे मौसम की शुरुआत में फल लगने लगते हैं। इसके फल बड़े, स्वादिष्ट, सुडौल और दृढ़ होते है और यह किस्म ठंढ और रोग प्रतिरोधी भी होती है।

क्ेमारोजाः-

स्ट्रॉबेरी एक शुरुआती छोटे दिन वाली किस्म है, जिससे बड़े से बहुत बड़े, दृढ़, गहरे लाल रंग के फल मिलते है। यह किस्म रोग प्रतिरोधी और 30 डिग्री तक का तापमान सहन कर सकती है, इसके पौधे 12 से 16 इंच तक बड़े होते है और इस किस्म में रोपण के 50 दिनों के बाद फल लगना शुरू हो जाते है।

मिट्टी की गुणवत्ता और भूमि की तैयारी

स्ट्रॉबेरी की खेती करने के लिए सबसे उपयुक्त है अपने खेत की मिट्टी की जांच करवाए जिसे फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की सही मात्रा का अनुमान लगाया जा सके, स्ट्रॉबेरी की खेती करने के लिए तापमान 18 से 30 डिग्री सेल्सियस होना लाभदायक माना जाता हैं, स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए 5.0 से 6.5 तक पीएच वाली मिट्टी अच्छी मानी जाती है, यदि खेत में बलुई दोमट मिट्टी है तो आपके खेत में स्ट्रॉबेरी की उपज दोगुनी हो सकती है।

खेत तैयार करने के लिए जुताई करते समय एक एकड़ में 75-8 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर खाद, नीम की खली 20-40 टन और मिट्टी की जांच के अनुसार आवश्यक मात्रा में पोटाश और फोस्फोरस का उपयोग करना चाहिए।

खाद मिलाने के बाद खेत में क्यारी तैयार करना बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्यारी हमेशा जमीन से 25-30 सेंमी ऊँची उठी हुई होनी चाहिए, चौड़ाई 100 से 120 सेंमी तक रखना चाहिए, दो क्यारियों के बीच 50 से 80 सेंमी की दूरी रखना चाहिए, जिससे अन्य कार्य और टपक सिचाई स्थापित करने में आसानी हो। इसके साथ ही क्यारी को काले मल्च से ढक देना चाहिए जिससे खरपतवार का प्रभाव कम हो सके और मिट्टी की नमी बनाए रखा जा सके, मल्च के 80 mm मोटी मल्च का उपयोग करना चाहिए और एक फिट की दूरी पर छेद बनाना चाहिए।

यदि किसान के मल्चिंग के लिए सुविधा ना हो तो धान के अवशेष का उपयोग कर सकते है और यदि टपक सिचाई की सुविधा ना हो तो दो क्यारी के बीच पानी भरकर भी सिंचाई की जा सकती हैं।

स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए तैयार पोधो का उपयोग किया जाता है, इसे सीधे बीजो से तैयार नहीं किया जाता, इसलिए पौधे हमेशा अपने नजदीकी सरकारी कृषि संस्था, प्रयोगशाला या विश्वसनीय नर्सरी से खरीदना चाहिए, इसके पौधे 5 से 20 रुपए प्रति पौधे की दर से खरीदे जा सकते है, एक एकड़ में लगभग 5000-5500 पौधे लगाए जा सकते हैं। साथ ही आप को ये भी जाना चाहिए की लगभग सभी राज्यों में सरकार 40 से 60 प्रतिशत तक का अनुदान देती है और अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विभाग में संपर्क करना चाहिए।

रोपण का समय और दूरी

यदि आप के पास ग्रीनहाउस की सुविधा नहीं है, तो 10 सितम्बर से 15 अक्टूबर के बीच करना चाहिए लेकिन यदि तापमान अधिक हो तो रोपण उस अनुसार आगे बढ़ाया जा सकता है। रोपण की दूरी किस्मो के अनुसार अलग हो सकती है जो 30 सेमी से एक फिट तक होती है, रोपण अधिक गहराई में नहीं करना चाहिए, और मल्च का उपयोग जरूर करना चाहिए, जिसे रोग और खरपतवार की समस्या कम हो।

स्ट्रॉबेरी की खेती में सही समय पर सिंचाई करना महत्वपूर्ण हैं, इसलिए आपको सिंचाई की सही विधि से और समय पर करना चाहिए, पहली सिचाई पौधे लगाने के तुरंत बाद सिंचाई कर देनी चाहिए। उसके बाद नमी को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर सिंचाई करनी चाहिए, जब स्ट्रॉबेरी के फल आने लगे तब फव्वारे विधि से सिंचाई करना चाहिए, जब फल आ जाए तो पुनः टपक सिंचाई का उपयोग करना चाहिए। यदि सिचाई सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो मौसम को ध्यान में रखते हुए दो क्यारी के बीच पानी दे कर सिचाईं करना चाहिए।

लो टनल का उपयोग

जिन किसानो के पास पॉलीहाउस की सुविधा नहीं है, तो उन्हें लो टनल का उपयोग करना चाहिए, इसलिए 100 से 200 माइक्रोन की पारदर्शी पन्नी का उपयोग करना चाहिए, लो टनल बनाने के लिए लोहे के तार या बास का उपयोग करें। पन्नी से रात के समय क्यारी को ढक दे, जिसे फसल को पाले और ठंड से बचाया जा सके और दिन के समय इसे हटा दे।

रोग एवं कीटो से बचाव

जड़ सम्बन्धी रोगो से बचाव के लिए क्यारी तैयार करते समय नीम की खली का उपयोग करना चाहिए। इसका उपयोग बाद में भी पौधों की जड़ों में डाल कर सकते हैं, इसके अलावा फसल पत्तों के धब्बा रोग, फफूंदी, माहु से प्रभावित हो सकती है। इसके लिए समय समय पर पोधों के रोगों की पहचान कर कृषि वैज्ञानिकों या कृषि विशेषज्ञो की सलाह के अनुसार कीटनाशक दवाइयों का उपयोग करना चाहिए।

फसल की तुड़ाई का सही समय और उत्पादन

फलो की तुड़ाई करते समय इस बात का ध्यान रखे की बाजार आप के खेत से कितना दूर है। सामान्यतः जब फल 60 से 70% तक लाल हो जाये उन्हें डंडी के साथ तोडना चाहिए, जितना जरुरी हो उतना ही फलो की तुड़ाई करना चाहिए। तोड़े गए फलो को छोटे प्लास्टिक के डब्बो में रखना चाहिए और कागज या पत्तो का उपयोग करना चाहिए जिसे फलो की गुणवक्ता खराब न होने पाए।

समयान्तः एक एकड़ से 4 से 7 टन कुल उत्पादन लिया जा सकता है, जिसका बाजार मूल्य 200 से 600 रुपए किग्रा तक मिल जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।