जलवायु परिवर्तन से बदल रहा फूलों का चक्र      Publish Date : 06/04/2026

 जलवायु परिवर्तन से बदल रहा फूलों का चक्र

                                                                                         प्रोफेसर आर.सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

धरती के गर्म होने के साथ उष्णकटिबंधीय जंगलों में फूल अब अपने तय मौसम से भटकने लगे हैं। इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है।

प्रकृति की अपनी एक लय होती है। फूल खिलते हैं, मधुमक्खियां आती हैं, फल लगते हैं और फिर जीवन आगे बढ़ता है। लेकिन अब बदलती जलवायु के साथ यह लय गड़बड़ाने लगी है। स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब महज तापमान' या पिघलते ग्लेशियरों तक सीमित नहीं। इसका प्रभाव धरती के सबसे जैव-विविध इलाकों में पेड़-पौधों और फूलों पर भी साफ दिखने लगा है।एक नए अध्ययन में सामने आया है कि दो शताब्दियों में धरती के गर्म होने के साथ उष्णकटिबंधीय इलाकों में फूलों का समय बिगड़ने लगा है। कई पौधों में अब पहले की तुलना में हफ्तों, यहां तक कि महीनों पहले या बाद में फूल खिल रहे हैं।

यानी प्रकृति की घड़ी बदल रही है। भले ही यह बदलाव इतना धीमा है कि हमें आंखों से नहीं दिखता, लेकिन इसके प्रभाव इतने गहरे हैं कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को हिंला सकते हैं।

यह अध्ययन अमेरिका के कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय से जुड़े विज्ञानियों स्काइलर ग्रेव्स और एरिन मैन्जिटो ट्रिप द्वारा किया गया है, जिसके नतीजेप्रतिष्ठित जर्नल 'प्लोस वन' में प्रकाशित हुए हैं। इस स्टडी में विज्ञानियों ने 1794 से 2024 के बीच संजोए 8,000 से अधिक फूलों के नमूनों का अध्ययन किया।

                              

ये नमूने संग्रहालयों और हर्बेरियम (सूखे पौधों के अभिलेखागार) में सुरक्षित रखे गए थे। विज्ञानियों ने कुल 33 उष्णकटिबंधीय प्रजातियों को चुना। इन प्रजातियों में फूल खिलने की अवधि स्पष्ट होती है। शोधकर्ताओं ने इन नमूनों को संजोने की तिथियों को 'ऐतिहासिक घड़ी' की तरह इस्तेमाल किया, ताकि यह समझा जा सके कि समय के साथ फूलों के खिलने का पैटर्न कैसे बदल रहा है। विश्लेषण में सामने आया कि औसतन हर दशक में फूलों के खिलने का समय करीब दो दिन खिसक रहा है। पहली नजर में यह बदलाव छोटा लग सकता है, लेकिन 100 से 200 वर्षों में यही बदलावकई हफ्तों में बदल जाता है।

यह बदलाव मामूली नहीं। ये, इतने बड़े हैं कि पौधों और उन पर निर्भर जीवों के बीच तालमेल बिगड़ सकता है। फूल खिलना वह क्षण है, जिससे परागण शुरू होता है, फल लगते हैं और पक्षियों-जानवरों का भोजन चक्र चलता है। लेकिन यदि कोई पौधा उस समय फूल दे जब उसका परागण करने वाले कीट मौजूद ही न हो, तो बीज नहीं बनेंगे। फल कम लगेंगे। इससे उन फलों पर निर्भर पक्षी और जानवर प्रभावित होंगे। नतीजन सालों से इनके बीच मौजूद संतुलन बिखर सकता है। उष्णकटिबंधीय इलाकों में पौधों, कीटों और जानवरों के बीच रिश्ते बेहद खास और नाजुक होते हैं। ऐसे में समय का थोड़ा-सा भी बदलाव पूरे खाद्य जाल को प्रभावित कर सकता है।

भारत में भी दिख रहे हैं प्रभाव

उष्णकटिबंधीय इलाकों में तापमान साल भर करीव-करीब एक समान रहता है, इसलिए पहले माना जाता था कि वहां फूलों के खिलने का समय जलवायु परिवर्तन से ज्यादा प्रभावित नहीं होगा। लेकिन यह अध्ययन इस धारणा कोगलत साबित करता है। अध्ययन में पुष्टि हुई है कि इनमें बदलाव की दर वही है, जो समशीतोष्ण और ठंडे क्षेत्रों में देखी गई है। यानी उष्णकटिबंधीय पौधे भी जलवायु परिवर्तन के प्रति उतने ही संवेदनशील है और ग्लोबल वार्मिंग दुनिया के किसी भी कोने पर रहम नहीं करेगी (भारत में भी इस तरह के बदलाव देखे गए हैं। कई अध्ययनों में इस बात के सबूत सामने आए हैं कि जलवायु में आता बदलाव पेड़ों पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।

दिसंबर 2022 में ऐसा ही कुछ देखा गया था जब इसके तीसरे सप्ताह से ही तेलंगाना और ओडिशा में आम के पेड़ों में बौरों का आना शुरू हो गया, जो इसके सामान्य समय से कम से कम एक महीना पहले है। संदेश साफ है जंगलों में बदलाव शुरू हो चुका है और यह बदलाव सिर्फ फूलों तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे में प्रकृति कीइस बदली ताल को समझना और उसे संभालना बेहद जरूरी हो गया है!

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।