
बेल की किस्मों का प्रजननः वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य की संभावनाएं Publish Date : 24/03/2026
बेल की किस्मों का प्रजननः वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य की संभावनाएं
डॉ0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
बेल एगल मार्मेलोस (एल.) कोरिया एक्स रॉक्सब रुटेसी परिवार से संबंधित है तथा सबसे पुराने ज्ञात स्वदेशी फलों में से एक है। इसका व्यापक वितरण विभिन्न प्रकार की मृदा-जलवायु स्थितियों के प्रति इसके अनुकूलन को दर्शाता है। बेल में कठोर जलवायु और गर्मी, सूखा और नमी की कमी की स्थितियों को सहन करने की क्षमता है। इस लेख में भारत में बेल की खेती की वर्तमान स्थिति, अपनाई गई नवीनतम प्रौद्योगिकियों यानी बेल की उन्नत किस्मों पर चर्चा करने के प्रयास किए गए हैं। बेल को देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कहीं इसे बेलगिरी तो कहीं बेलघाट या कैथा नाम से भी जाना जाता है। बेल का फल औषधीय गुणों से भरा हुआ है। इस फल का सेवन मात्र ही दर्जन भर से अधिक गंभीर बीमारियों की रोकथाम में सफल साबित हुआ है।
क्षेत्रफल एवं उत्पादन

भारत में अभी भी बेल की खेती व्यवस्थित रूप में एवं व्यावसायिक स्तर पर नहीं की जा रही है जिस कारण से बेल के अन्तर्गत क्षेत्रफल और कुल फलोत्पादन के सटीक आँकड़ें उपलब्ध नहीं हैं। विगत कुछ वर्षों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के विभिन्न संस्थानों एवं राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा बेल के आनुवांशिक सुधार हेतु कई अनुसंधान योजनाएं चलाई गई हैं जिनसे उन्नत प्रजातियों का विकास सम्भव हुआ है। अधिक उत्पादक प्रजातियों के पौधों की सुगम उपलब्धता भी सुनिश्चित हुई है। इस कारण से कुछ प्रगतिशील किसानों ने बेल की व्यावसायिक खेती में रूचि लेना प्रारम्भ किया है और वो बेल की व्यावसायिक खेती कर भी रहे हैं। छोटे स्तर पर व्यावसायिक खेती के अतिरिक्त भारत के कुछ भागों में जंगलों एवं सड़कों के किनारे बेल के बीज से प्रवर्धित वृक्ष भी पाए जाते हैं। वर्तमान में भारत में बेल का कुल फलोत्पादन लगभग 1,000 टन है।
बेल की प्रजातियाँ और किस्में
हाल ही में, इस वंश में दो प्रजातियां भी शामिल हुई हैं, वे हैं एगल डेकेंड्रा फर्नविल और एगल ग्लूटिनोसा (ब्लैको)मेर. रुटेसी के अन्य सदस्य साइट्रस, कासिमिरोआ, क्लॉसेना, एरेमोसिट्रस, लिमोनिया, फेरोनिएला, फॉर्च्यूनेला, पोन्सिरस, ट्राइफेसिया आदि हैं। आनुवंशिक नाम एगल ग्रीक मूल का है और मार्मेलोस प्रजाति पुर्तगाली मूल की है।
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सारणी 1. बेल उत्पादन करने वाले राज्य एवं उनकी साझेदारी |
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क्रम संख्या |
राज्यों के नाम |
2021-22 उत्पादन (000 टन में) |
साझेदारी (%) |
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1. |
ओडिशा |
45.29 |
55.31 |
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2. |
झारखण्ड |
33.38 |
40.76 |
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3. |
मध्य प्रदेश |
2.01 |
2.45 |
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4. |
हरियाणा |
0.78 |
0.95 |
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5. |
छतीसगढ़ |
0.43 |
0.53 |
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6. |
हिमांचल प्रदेश |
0.01 |
0.01 |
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कुल उत्पादन 81.90 |
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बेल के औषधीय गुण
बेल (एगल मार्मेलोस), जिसे बंगाल क्विंस के नाम से भी जाना जाता है, भारत और अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का मूल निवासी के रूप में फल देने वाला पेड़ है। पोषक तत्वों से भरपूर और अपने औषधीय गुणों के लिए मूल्यवान, बेल का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है जैसे ताजे फल, सूखे, पाउडर, शर्बत और कैंडी जैसे उत्पादों में संसाधित किया जाता है। बेल के फल को आमतौर पर ताजा, सुखाकर या जूस के रूप में उपयोग में लाया जाता है।
फल के गूदे (प्रति 100 ग्राम) में नमीः 61-64.20% प्रोटीनः 1.60-1.80, वसाः 0.2-0.43, अम्लताः 0.30, रेशाः 2.90-4.80, राखः 2.63-2.83, अपचायी शर्कराः 4.42, अनपचायी शर्कराः 9.93, खनिजः 1-70, गोंद (म्यूसिलेज) 12-70-19-00 प्रतिशत, बीटा कैरोटिनः 55-56 मिग्रा, थायमिनः 0.9-0.13 मिग्रा, राइबोफ्लेविनः 1-19 मिग्रा, नियासिनः 1-10 मिग्रा, विटामिनः 186 आई-विटामिन सीः 8-18 मिग्रा, आदि भी प्रचुर मात्रा में होता है।
खनिज पोषक तत्वा के रूप में बेल के फल में (प्रति 100 ग्राम गुदा में) तांबाः 0.19-0.20 मिलीग्राम, जस्ताः 0.28 मिलीग्राम, कैल्शियमः 80-85 मिलीग्राम, फास्फोरसः 50-51.60 मिलीग्राम, पोटैशियमः 585-603 मिलीग्राम, मैग्नीशियमः 4.0 मिलीग्राम, आयरनः 0.5-0.8 मिलीग्राम होता है।
बेल फल में मौजूद कार्बोहाइड्रेट (31.8-34.5%) के अलावा कई विभिन्न सक्रिय घटक जिनमें स्किमियानाइन, एगेलिन, ल्यूपॉल, सिनेओल, सिट्रल, सिट्रोनेलल क्यूमिनलडिहाइड (4-आइसोप्रोपाइल बेंजाल्डिहाइड), यूजेनॉल, मार्मेसिनिन, मार्मेलोसिन, लुवैन्गेटिन, ऑराप्टेन, सोरालेन, मार्मेलाइड, फागेरिन, मार्मिन और टैनिन आदि शामिल हैं। ये घटक कई बीमारियों के खिलाफ जैविक रूप से सक्रिय होते हैं जैसे गैस्ट्रोडोडोडेनल विकार, मलेरिया और कैंसर आदि।
बेल के किस्मों के विकास का इतिहास

पिछले कुछ वर्षों में, बढ़ती खेती और मांग के साथ, भारत में कृषि अनुसंधान संस्थानों ने उपज बढ़ाने, फलों की गुणवत्ता में सुधार और विशिष्ट जलवायु परिस्थितियों में गुणवत्तायुक्त उत्पादन हेतु विभिन्न बेल किस्मों का विकास किया है। आइए अपनी अनूठी विशेषताओं के साथ अनुसंधान के माध्यम से विकसित बेल की विविध किस्मों का पता लगाएं।
वृक्ष आकार व आकृति के अतिरिक्त, फूल और फल संबंधी लक्षणों में भी प्रचुर विविधता देखी गई है। बेल के विभिन्न प्रारूपों में फलों के आकार व आकृति, औसत फल भार, गूदे का गठन, मात्रा व रंग, रेशे की मात्रा, शर्करा की मात्रा आदि लक्षणों में प्रचुर विभिन्नता पायी जाती है। इसी प्रकार फलों में बीजों की संख्या, कोष्ठकों की संख्या और फलभित्ति की मोटाई जैसे लक्षणों में भी प्रारूप एक दूसरे से बहुत भिन्न होते है।
भारत में बेल की आनुवांशिक विविधता को मुख्यतः दो समूहों में विभक्त किया जा सकता है। पहले समूह में छोटे फल आकार वाली प्रजातियाँ व प्रारूप आते हैं जिनमें गूदे की मात्रा कम, बीजों की संख्या अधिक व म्यूसिलेज तथा रेशे की मात्रा अधिक होती है।
दूसरे समूह में बड़े फल आकार वाली प्रजातियाँ व प्रारूप आते हैं जिनमें गूदे की मात्रा अधिक, फलभित्ति की मोटाई कम, बीजों की संख्या कम व रेशे तथा म्यूसिलेज की मात्रा कम होती है। पहले समूह में आने वाले फलों को मुख्यतः औषधीय प्रयोग के लिए अच्छा माना जाता है क्योंकि उनके गूदे में मार्मेलोसिन व सोरालेन की मात्रा अधिक होती है। इसी प्रकार दूसरे समूह में आने वाले प्रारूप व प्रजातियाँ ताजा खाने व प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे शरबत बनाने हेतु अधिक उपयुक्त होते हैं।
पहले बेल की अधिकांश किस्मों का नाम आम तौर पर उस इलाके के नाम पर रखा जाता था जहां वे प्राकृतिक रूप से उगते रहे हैं। जैसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल राज्यों से उत्पादित किस्में हैं जैसे बस्ती नं. 1, गोण्डा नं. 1, 2 व 3. कागजी इटावा, सीवान बड़ा, देवरिया, बड़े, चकैया, लाम्बा, खमरिया, और बघेल आदि। केवल उत्तर प्रदेश में ही बेल की स्थानीय छह किस्मों का वर्णन किया गया है जैसे मिर्ज़ापुरी, दरोगाजी, ओझा, रामपुरी, आजमती और खमरिया। जिनमें से 'कागजी गोंदा' को सर्वोत्तम पाया गया।
पुराने समय में उत्तर प्रदेश में बहुत पहले व्यावसायिक रोपण हेतु 'मिर्जापुरी', 'दरोगाजी', 'ओझा', 'रामपुरी', 'आज़मती', 'खमरिया' किस्में लगायी जाती थीं। सबसे अच्छा 'मिर्जापुरी था, जिसका छिलका बहुत पतला होता था, जो अंगूठे, गूदे के हल्के दबाव से टूट जाता था। अभी भी पतले छिलके और कुछ ही बीजों वाली एक प्रतिष्ठित बड़ी किस्म को 'कागज़ी' के नाम से जाना जाता है।
बेल के आनुवंशिक संसाधन का संरक्षण
भाकृअनुप संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के विभिन्न क्षेत्रीय जीन बैंकों में बेल के जननद्रव्य को संरक्षित किया जाता है। उदाहरण के तौर पर चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, बावल (हरियाणा) में 10 जर्मप्लाज्म को संरक्षित किया जा रहा है। आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी कृषि विश्वविद्यालय, अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में 22 जर्मप्लाज्मः केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर में 16 जर्मप्लाज्मः केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ में 180 जर्मप्लाज्म; गोविन्द बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर (उत्तराखंड) में 10 जर्मप्लाज्म; केंद्रीय रुक्ष अनुसन्धान संस्थान, जोधपुर में 5 जर्मप्लाज्म तथा केंद्रीय बागवानी प्रायोगिक केंद्र, गोधरा (गुजरात) में 167 जर्मप्लाज्म को संरक्षित किया जा रहा है।
बेल की किस्मों के प्रजनन हेतु
बेल की फल की गुणवत्ता तीन कारकों पर निर्भर करती हैः गोंद (म्युसिलेज), चीनी और कुल फिनोलिक्स की मात्रा। फल में उच्च चीनी की मात्रा, विशेष रूप से गैर-अपघटित होने वाली शर्करा, कम फिनोलिक्स और म्यूसिलेज (गोंद) बेल फल को अधिक स्वादिष्ट बनाती है। यह देखा गया है कि छोटेफलों की तुलना में बड़े आकार के फलों में अधिक गूदा, अक्सर मोटा छिलका, कम बीज, कम चीनी, कम फिनोलिक्स और कम म्यूसिलेज (श्लेष्मा) इत्यादि होता है।
बेल को लोकप्रिय बनाने में, प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उपज और फलों में अधिक खाद्य भाग का होना, रंग हल्का पीला होना, आकार गोल लिए बेलनाकार होना, स्वाद और स्वाद के प्रतिशत के संदर्भ में फलों की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु बेल का प्रजनन महत्वपूर्ण है। बेल की किस्म के प्रजनन हेतु विशेषताओं वाले बेल के पेड़ एकत्र किए जाते हैं, वानस्पतिक विकास विशेषताओं, फूल आने, फल लगने के व्यवहार का मूल्यांकन किया जाता हैं और गुणवत्ता संबंधी विशेषताएं जो कई उन्नत किस्मों के विकास का नेतृत्व करती हैं, के अनुसार बेल की किस्मों का विकास किया जाता है।
अनियमित कृषि-जलवायु परिस्थितियों के कारण अधिकांश व्यावसायिक किस्में अधिक फल गिरने, फल के फटने, पाले का प्रभाव, धूप की चपेट में आने और कुछ शाखाओं के टूटने से पीड़ित होती हैं। बेल की सबसे प्रचलित किस्म नरेन्द्र बेल-5 में तो फलों की सिकुरण की समस्या बढ़ गयी है। इस प्रकार एक आदर्श किस्म में कॉम्पैक्ट कैनोपी होनी चाहिए और उच्च फल गुणवत्ता के साथ परिपक्वता तक अधिक संख्या में पेड़ पर फल बरकरार रहने चाहिए। बेल की किस्मों के विकास हेतु कुछ अन्य प्रजनन उद्देश्य नीचे सूचीबद्ध हैं:
- पेड़ों का बौना कद, जल्दी पकने वाली, अधिक और नियमित उपज देने वाली, कम फल गिरने वाली, शाखा न टूटने वाली और धूप में न जलने वाली किस्म होनी चाहिए।
- एक आदर्श किस्म में मध्यम आकार के फल (1-1.5 कि. ग्रा. होने चाहिए, जिनका आकार एक समान एवं गोल, छिलका पतला, कम फाइबर, कम बीज और श्लेष्मा सामग्री और परिपक्वता के समय गूदे का रंग सुनहरा पीला भी होना चाहिए।
धूप की झुलसन से बचने के लिए कॉम्पैक्ट कैनोपी के साथ कांटा रहित किस्म या कम काँटों की संख्या वाली प्रजाति विकसित करना भी एक उद्देश्य है।
- विविधता में समृद्ध जैसे अधिक कुल घुलनशील पदार्थ, न्यूट्रास्यूटिकल्स वैल्यू और बायोएक्टिव यौगिकों के साथ कम स्तर के टैनिन, म्यूसिलेज और उच्च स्तर की सुगंध होनी चाहिए।
- प्रसंस्करण के उद्देश्य से किसी किस्म में फल का आकार बड़ा, गूदे की अधिक मात्रा अधिकता के साथ नारंगी पीले रंग की अधिक होनी चाहिए और बीज की मात्रा सुखद सुगंध के साथ कम होनी चाहिए।
वर्तमान में बेल की उन्नत किस्में
पिछले कुछ वर्षों में बेल की कई उन्नत प्रजातियों का विकास हुआ है। जिनमें कई अच्छे गुण जैसे-पेड़ का बौना आकार, फलों का मध्यम वजनः 1.0-1.50 किलोग्राम, कम रेशा, कम बीज, अधिक कुल घुलनशील ठोस पदार्थ, पतला छिलका, कम म्यूसिलेज व उत्कृष्ट स्वाद आदि गुण सम्मिलित हैं। इसी के साथ इन उन्नत प्रजातियों में फल फटने व गिरने की समस्या भी कम होती है और उन्हें विभिन्न कृषि जलवायुवीय दशाओं में व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त पाया गया है। ऐसी कुछ उन्नत प्रजातियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैः
गुजरात के गोधरा स्थित केन्द्रीय बागवानी परीक्षण केन्द्र ने बेल की कई किस्में विकसित की हैं, इसमें से गोमा यशी किस्म भी एक है।
गोमा यशी किस्म, किसानों के बीच एक लोकप्रिय किस्म है, जो अपने कांटे रहित, कागजी खोल की मोटाई, उच्च गुणवत्ता वाले फलों और छोटे कद के लिए जानी जाती है, जो इसे उच्च घनत्व वाले रोपण के लिए आदर्श बनाती है। गोमा यशी किस्म विभिन्न भारतीय राज्यों में 600 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैली हुई है। गोमा यशी किस्म का विस्तार गुजरात से आगे राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश तक हो गया है।
सबसे आधुनिक बेल की नयी किस्म सीएचईएसबी 11 जिसकी अपनी उच्च उपज और अच्छे स्वाद के लिए जाना जाता है, यह मध्यम आकार के फल पैदा करता है, जिसका गूदे में कुल घुलनशील पदार्थ 38° ब्रिक्स और श्लेष्मा 50 प्रतिशत तक होता है। यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है और शर्बत, मुरब्बा और पाउडर बनाने के लिए उपयुक्त है। एक अन्य किस्म सीएचईएसबी-16 जो देर से पकने वाली किस्म है, जिसकी वृद्धि रुक-रुक कर होती है और यह उच्च एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि वाले फल पैदा करती है। फल आरटीएस (रडी-टू-सर्व) पेय, कैंडी और मुरब्बा बनाने के लिए उत्कृष्ट हैं। इसी तरह बेल की एक अन्य नवीनतम किस्म सीएचईएसबी-21 है जो उच्च 39° ब्रिक्स मान के साथ बड़े फल पैदा करती है। यह शर्बत, उपज और अच्छे स्वाद के साथ, गूदे में कुल घुलनशील पदार्थः कैंडी, जैम और पाउडर बनाने के लिए अत्यधिक उपयुक्त है।
उत्पादन क्षमता
बेल से प्रति पेड़ फलों की संख्या वृक्ष के आकार के साथ बढ़ती रहती है। 10-15 वर्ष के पूर्ण विकसित वृक्ष से 200-300 फल प्राप्त किये जा सकते हैं। बेल में कई औषधीय गुण होते हैं, इसके फल, फूल, तना, पत्ती, छाल सब किसी न किसी काम आता है। बेल फल आम तौर पर ₹15-20 प्रति फल के बीच बिकता है। 5वें और 6वें साल में किसान प्रति हेक्टेयर ₹75,000 से 100,000 तक कमा सकते हैं। फल लगना दूसरे साल से शुरू हो जाता है, लेकिन आर्थिक उपज वर्षा आधारित अद्ध 'शुष्क परिस्थितियों में अंकुर फूटने के 5वें वर्ष के बाद मिलती है। अध्ययन के नतीजों से पता चला कि जैसे-जैसे पेड़ की उम्र बढ़ती गई, फल लगने और फल धारण करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है। 9वें और 10वें साल में पेड़ों की छंटाई कर देनी चाहिए।
निष्कर्ष
बेल की नई किस्मों के विकास हेतु देश के विभिन्न भागों में सर्वेक्षण और श्रेष्ठ गुणों वाली जननद्रव्य का चयन, अनुकूल गुणवत्ता वाले लक्षणों वाले जीनोटाइप की सख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। शुष्क भूमि/जलवायु की स्थितियों में उत्पादन बढ़ाना, विशिष्ट लक्षणों के आधार पर जीनोटाइप की जांच करना भी आवश्यक है। सुधरित किस्मों के विकास से बंजर भूमि पर बेल वृक्षारोपण को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी एवं व्यावसायीकरण भी होगा। देश में उपलब्ध जैव-विविधता के चयन के माध्यम से किस्मों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। हालाँकि, अभी भी वांछनीय गुणों वाली विकसित किस्मों का अभाव है जिनमें सुधार किया जा सकता है। जैव प्रौद्योगिकी तकनीको का उपयोग कर विशिष्ट लक्षण वाले जननद्रव्यों के सुधार के लिए बेल के इन क्षेत्रों में ध्यान देने की अत्यधिक आवश्यकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
