
केले की खेती से अधिक लाभ कमायें Publish Date : 16/07/2025
केले की खेती से अधिक लाभ कमायें
डा. आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
हमारे देश के फलों में कैले का प्रमुख स्थान है। केले का फल बहुत पौष्टिक होता है। इसमें शर्करा एवं खनिज लवण जैसे फास्फोरस तथा कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। भारत में केले की सर्वाधिक उत्पादकता लगभग 61.2 टन प्रति हेक्टेयर महाराष्ट्र और न्यूनतम 20.4 टन कर्नाटक की है। उत्तर प्रदेश में केले की खेती के प्रति रुझान बढ़ रहा है। छोटे और सीमान्त कृषक भी केले की खेती से लाभान्वित हो रहे हैं।
भूमि

दोमट भूमि जिसका जल निकास अच्छा हो और भूमि का पीएच मान 6 से 7.5 के बीच हो।
गड्ढे की खुदाई का समय
अप्रैल-मई
गड्ढ़े की लम्बाई, चौड़ाई एवं गहराई
60 × 60 × 60 सेमी
गड्ढ़े की भराई
गोबर या कम्पोस्ट की सड़ी खाद (20-25 किग्रा या 2- 3 टोकरी) तथा 100 ग्राम बी.एच.सी. प्रति गड्ढ़ा, उपरोक्त पदार्थों को गड्ढे की ऊपर की मिट्टी में मिलाकर जमीन की सतह से लगभग 10 सेमी ऊचाई तक भरकर सिंचाई कर देनी चाहिए जिससे मिट्टी मिश्रण गड्ढे में अच्छी तरह से बैठ जाए।
पौधों की दूरी एवं सख्या
पौधों एवं कतार की दूरी 1.5 × 1.5 मीटर, 4400 पौधे प्रति हेक्टेयर
लगाने का समय
15 मई से 15 जुलाई का समय सबसे उपयुक्त है।
उन्नत प्रजातियां
1. ड्वार्फ कैवेन्डिशः यह सबसे प्रचलित एवं पैदावार देने वाली किस्म है। इस पर पनामा उकठा नामक रोग का प्रकोप नहीं होता है। इस प्रजाति के पौधे बौने होते हैं व औसतन एक घाँद (गहर) का वजन 22-25 किग्रा होता है जिसमें 160-170 फलियां आती है। एक फली का वजन 150-200 ग्राम होता है। फल पकने पर पीला एवं स्वाद में उत्तम होता है। फल पकने के बाद जल्दी खराब होने लगता है।
2. रोवेस्टाः इस किस्म का पौधा लम्बाई में ड्वार्फ कैवेन्डिश से ऊँचा होता है, और इस की घाँद या गहर का वजन अपेक्षाकृत अधिक और सुडौल होता है। यह किस्म प्रवर्चित्ती रोग से अधिक प्रभावित होती है, परन्तु पनामा उकठा के प्रति पूर्णतया प्रतिरोधी है।
3. मालभोगः यह जाति अपने लुभावने रंग, सुगन्ध एवं स्वाद के लिये लोगों को प्रिय है, लेकिन पनामा उकठा रोग के प्रकोप से फसल को हानि होती है। इनके पौधे बड़े होते हैं और फल का आकार मध्यम और उपज औसत होती है।
4. चिनियाचम्पाः यह भी खाने योग्य और स्वादिष्ट किस्म है जिसके पौधे बड़े किन्तु फल छोटे होते है। इस किस्म को परिवार्षिक फसल के रूप में उगाया जाता है।
5. अल्पानः यह वैशाली क्षेत्र में उगाये जाने वाली मुख्य किस्म है। इस जाति के पौधे बड़े होते है जिस पर लम्बी घाँद लगती है। फल का आकार छोटा होता है। फल पकने पर पीले एवं स्वादिष्ट होते है जिसे कुछ समय के लिये बिना खराब हुए रखा जा सकता है।
6. मुठिया/कुठियाः यह सख्त किस्म है। इसकी उपज जल के अभाव में भी औसतन अच्छी होती है। फल मध्यम आकार के होते हैं जिनका उपयोग कच्ची अवस्था में सब्जी हेतु एवं पकने पर खाने के लिये किया जाता है। फल का स्वाद साधारण होता है।
7. बत्तीसाः यह किस्म सब्जी के लिये काफी प्रचलित है जिसकी घाँद लम्बी होती है और एक गहर में 250-300 तक फलियां आती है।
पुतियों का चुनाव
2-3 माह पुरानी, तलवारनुमा पुत्तियां हों। टीसू कल्चर से प्रवर्धित पौधे रोपण के लिए सर्वोत्तम होते हैं क्योंकि इनमें फलत शीघ्र तथा समय पर होती है।
फर्टिगेशन
टपक विधि से सिंचाई के पानी के साथ घुलनशील (उर्वरकों का प्रयोग फर्टिगेशन कहलाता है। इस विधि द्वारा प्रयोग करने से उर्वरकों की कम मात्रा अधिक कारगर और लाभप्रद सिद्ध होती है। टपक सिंचाई प्रणाली में जल की आपूर्ति वाली प्लास्टिक की नलियों को भूमि की सतह से थोड़ी गहराई पर रखने से उर्वरकों और जल फलोत्पादन में भारी वृद्धि होती है।
सिंचाई
चूंकि भूमि में गंधक जैसे गौण तत्व और जिंक एवं बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी व्यापक कमी देखी जा रही है अतः पौध रोपण के तीन माह बाद 70 ग्राम जिप्सम/फास्फोजिप्सम, 10 ग्राम जिंक सल्फेट और 2.5 ग्राम वोरेक्स प्रति पौधे की दर से नाइट्रोजन और पोटाश के साथ मिलाकर करें। फूल आने के एकमाह पहले 19:19:19 जल विलेय उर्वरक के दो प्रतिशत घोल का छिड़काव एक सप्ताह के अन्तर पर कर देने से उपज में सार्थक वृद्धि होती है। सामान्यतया बरसात में (जुलाई-सितम्बर) सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। गर्मियों में (मार्च से जून तक) सिंचाई 5-6 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। सर्दियों में (अक्टूबर से फरवरी तक) 12-13 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
पुती निकलना
पौधे के बगल से निकलने वाली पुत्तियों को 20 सेमी तक वृद्धि करने के पहले ही भूमि की सतह से काटकर निकालते रहना चाहिए। मई-जून के महीने में एक पुत्ती हर पौधे के पास अगले वर्ष पेड़ी की फसल के लिए छोड़ देना चाहिए।
नर फूल से गुच्छे काटना
फल टिकाव हो जाने पर घार के अगले भाग पर लटकते नर फूल के गुच्छे को काट देना चाहिए।
सहारा देना
घार निकलते समय बांस/बल्ली की कैंची बनाकर पौधों को दो तरफ से सहारा देना चाहिए।
मिट्टी चढ़ाना
बरसात से पहले एक पंक्ति के सभी पौधों को दोनों तरफ से मिट्टी चढ़ाकर बाँध देना चाहिए।
कीट एवं रोग नियन्त्रण
पत्ती विटिलः यह कीट कोमल पत्तों तथा ताजे बने फलों के छिल्के को खाता है। प्रकोप अप्रैल-मई में प्रारम्भ होकर सितम्बर-अक्टूबर तक रहता है। रोकथाम के लिए इन्डोसल्फान 2 मिली अथवा कार्बरिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव फूल आने के तुरन्त बाद तथा दूसरा इसके 15 दिन बाद करना चाहिए।
केले का घुन (बनाना विविल): इस कीट के प्रौढ़ तथा सूंडियाँ दोनों हानिकारक होते हैं। इसका प्रकोप बरसात में अधिक होता है। भूमि सतह के पास तने अथवा प्रकन्द में छेद बनाकर मादा अंडे देती है। इनसे सुंडियाँ निकलकर तने में छेद करके खाती रहती है। इसके फल स्वरूप सड़न पैदा हो जाती है तथा पौधा कमजोर होकर गिर जाता है।
रोकथाम
(क) स्वस्थ कन्द लगाने चाहिए।
(ख) कंदों को लगाने से पहले साफ करके एक मिली फास्फेमिडान अथवा 1.5 मिली. मोनोक्रोटोफास प्रति लीटर पानी के बने घोल में 12 घंटे तक डुबोंकर उपचारित कर लेना चाहिए।
(ग) अधिक प्रकोप होने पर एक मिली फास्फेमिडान प्रति 3 लीटर पानी अथवा डाईमेथियोयेट 1.0 मिली अथवा आक्सीडीमेटान मिथाइल 1.25 मिली का प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 15-20 दिन बाद यह छिड़काव दुबारा कर देना चाहिए।
पनामा बिल्टः यह रोग कवक के कारण होता है। इस के प्रकोप से पौधें की पत्तियां पीली पड़कर डंठल के पास से नीचे झुक जाती है। रोकथाम के लिये बावेस्टीन के 1.5 मिग्रा प्रति लीटर पानी मेंघोलसे पौधों के चारों तरफ की मिट्टी को 20 दिन के अंतर से दो बार तर कर देना चाहिए।
तनागलन: यह रोग फफूंदी के कारण होता है। इसके प्रकोप से निकलने वाली नई पत्ती काली पड़कर सड़ने लगती है। इससे पौधें की वृद्धि रूक जाती हैऔर पौधा पीला पड़कर सूखने लगता है। रोकथाम हेतु डाइथेन एम- 45 के 2 ग्राम अथवा बावेस्टीन के 1.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल के 2-3 छिड़काव 10-15 दिन के अन्तर से करना चाहिए।
लीफ-स्पाटः यह रोग कवक के कारण होता है। पत्तियों पर पीले भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। पौधा कमजोर हो जाता है तथा बढ़वार रूक जाती है। रोकथाम हेतु डाइथेन एम- 45 के 2 ग्राम अथवा कापर आक्सीक्लोराइड के 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 2-3 छिड़काव 10-15 दिन के अंतर से करना चाहिए।
बन्चीटापः यह विषाणु रोग होता है तथा माहूँ द्वारा फैलता है। रोगी पौधों की पत्तियाँ छोटी होकर गुच्छे का रूप धारण कर लेती हैं। पौधों की वृद्धि रूक जाती है तथा फ्लत नहीं होती है। रोकथाम हेतु प्रभावित पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए। अगली फसल के रोपण हेतु रोग प्रभावित बाग से पुत्तियां नहीं लेनी चाहिए। माहूँ के नियन्त्रण के लिए डाईमथियोयेट 1.0 मिली प्रति लीटर पानी अथवा 1.0 मिली फास्फेमिडान प्रति 3 लीटर पानी के घोल का छिड़काव करना चाहिए।
उपज
एक हेक्टेयर बाग से 60-70 टन उपज प्राप्त की जा सकती है जिससे शुद्ध लाभ रु. 4-6 लाख तक मिल सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
