
कभी एक-एक सांस के लिए थे मोहताज और अब लाखों लोगों को दिखा रहे राह Publish Date : 29/07/2026
कभी एक-एक सांस के लिए थे मोहताज और अब लाखों लोगों को दिखा रहे राह
प्रो0 आर. एस. सेंगर
आईआईटियन सौरभ बोथरा बचपन से ही अस्थमा से पीड़ित थे। नौकरी की, और पारिवारिक व्यवसाय में भी हाथ आजमाया, लेकिन कहीं संतोष नहीं मिला। फिर एक ध्यान समूह से हुई छोटी-सी मुलाकात ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। आज वे बतौर योग प्रशिक्षक कई विश्व रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं।
बचपन से ही अस्थमा से जूझता एक लड़का, जिसके लिए ठीक से सांस लेना भी कई बार चुनौती बन जाता था,
एक दिन, जब वह बनारस से नागपुर की यात्रा कर रहा था, तभी उसकी मुलाकात ध्यान करने वाले एक समूह से हुई। सफर के दौरान हुई साधारण-सी बातचीत ने उसके भीतर एक नई उम्मीद जगा दी। उसने झिझकते हुए उस समूह से योग सत्र में शामिल होने की इच्छा जताई। उसकी सीखने की ललक को देखकर समूह ने उसे निःशुल्क ध्यान सत्र में शामिल होने की अनुमति दे दी। उसे समय किसी को अंदाजा नहीं था कि यह छोटी-सी मुलाकात उसकी पूरी जिंदगी बदल देगी। उस सत्र के बाद उसने नियमित रूप से ध्यान करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ कि उसका अस्थमा, जो बचपन से उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था, अब कम होने लगा है। पहली बार उसने सुकून की सांस ली-सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक भी। वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि छह 'विश्व रिकॉर्ड अपने नाम करने वाले सौरभ बोथरा हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से न केवल खुद की पहचान बनाई, बल्कि लाखों लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने का भी काम किया।
छोटे गांव से देखे बड़े सपने

सौरभ बोथरा का जन्म महाराष्ट्र के वाशिम जिले के छोटे-से गांव धनज में हुआ। उनका बचपन संघर्षों से भरा था। जब सौरभ मात्र चार वर्ष के थे, तब उनके पिता ने नागपुर जाने का फैसला किया, जिसने पूरे परिवार की दिशा बदल दी। पिता ने अपने बड़े भाई के साथ एक व्यवसाय शुरू किया, जो न केवल उनके परिवार की जीविका का साधन बना, बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार प्रदान करने का जरिया बना। हालांकि, शुरुआत आसान नहीं थी। यहां सौरभ, उनकी बहन त्रिशाला, माता-पिता और रिश्तेदार-कुल आठ लोग एक छोटे-से घर में रहते थे।
कई वर्षों का संघर्ष और बेरोजगारी
समय के साथ उनके माता-पिता की मेहनत रंग लाई। सौरभ ने उनसे प्रेरणा ली और पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए आईआईटी, बीएचयू में प्रवेश पाया। हालांकि, इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद भी उन्हें संतोषजनक नौकरी नहीं मिली। तब उन्होंने पारिवारिक व्यवसाय में हाथ आजमाया, लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और मात्र तीन महीने में ही उन्होंने व्यवसाय छोड़ दिया। यह एक बड़ा और जोखिम भरा फैसला था। इसके बाद उन्होंने एक ध्यान समूह के साथ स्वयंसेवक के रूप में काम करना शुरू किया और पूरे भारत में घूम-घूमकर योग सिखाने लगे।
तीन छात्रों से शुरु हुई यात्रा
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान सौरभ ने ऑनलाइन योग कक्षाएं शुरू कीं। पहले दिन केवल तीन लोग जुड़े, लेकिन सौरभ ने हार नहीं मानी। उन्होंने लगातार कई महीनों तक मुफ्त में योग सत्र लेना जारी रखा। धीरे-धीरे लोगों की संख्या बढ़ी, लेकिन एक समस्या थी। लोग इससे ज्यादा देर तक जुड़ें नहीं रहते थे। तभी सौरभ के दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न योग सत्र के लिए कुछ फीस रखी जाएं, ताकि लोग इसके प्रति गंभीरता दिखाएं। इससे लोगों में प्रतिबद्धता भी बढ़ी। यही छोटा-सा कदम उनकी सफलता की नींव बन गया। आगे चलकर उन्होंने अपने प्लेटफॉर्म 'हैबिल्ड' की स्थापना की।
वर्चुअल योग कक्षा में ऐतिहासिक रिकॉर्ड
सौरभ की मेहनत और निरंतरता ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। वर्ष 2023 में हैबिल्ड ने वर्चुअल योग कक्षा में सबसे अधिक उपस्थिति का विश्व रिकॉर्ड बनाया, जिसमें 1,34,057 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इसके बाद जनवरी 2024 में यूट्यूब लाइव स्ट्रीम पर सबसे अधिक दर्शकों के साथ गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम हुआ, जहां 2,46,252 लोग जुड़े। उसी वर्ष उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल करते हुए एक ही दिन में 5,99,162 लाइव दर्शकों का रिकॉर्ड बनाया और साथ ही 2,87,711, प्रतिभागियों के साथ सबसे बड़ी वर्चुअल मेडिटेशन क्लास भी आयोजित की। वर्ष 2025 में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर हैबिल्ड ने नया इतिहास रचते हुए 169 देशों के 7,52,074 लोगों को एक साथ जोड़ा। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सितंबर 2025 में सौरभ ने सबसे लंबी चलने वाली वर्चुअल योग कक्षा का अपना छठा विश्व रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया।
युवाओं को सीख
- कंठिनाइयां ही आपको मजबूत बनाती हैं।
- अगर इरादा मजबूत हो, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
- एक सही निर्णय आपकी पूरी जिंदगी बदल सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
