बासमती की 25 से अधिक प्रजातियां विकसित करने पर मिला सम्मान      Publish Date : 26/06/2026

बासमती की 25 से अधिक प्रजातियां विकसित करने पर मिला सम्मान

                                                                                         प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

  • पद्मश्री से सम्मानित डा. अशोक सिंह ने भारतीय बासमती को दिलाई वैश्विक पहचान, बचपन से ही खेती से लगाव

                                                  

भारतीय बासमती चावल को पारंपरिक खुशबू और स्वाद के साथ आधुनिक कृषि की जरूरतों से जोड़कर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने वाले कृषि विज्ञानी डा. अशोक कुमार सिंह को इस वर्ष पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा उनके उसी कृतित्व की सार्वजनिक स्वीकृति है, जिसने खेती की लागत घटाई, किसानों की आय बढ़ाई और देश के निर्यात को नई ऊंचाई दी। डा. अशोक द्वारा विकसित बासमती की 25 से अधिक उन्नत किस्में आज कम अवधि, अधिक उपज और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण देशभर में बड़े पैमाने पर अपनाई जा रही हैं। इन्हीं किस्मों के बल पर 20 लाख से अधिक किसान करीब 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बासमती की खेती कर रहे हैं और देश को प्रति वर्ष 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा अर्जित हो रही है। डा. अशोक सिंह का कृतित्व इस बात का प्रमाण है कि जब अनुसंधान किसानों की जरूरतों से जुड़ता है, तो उसका प्रभाव केवल फसल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है। डा. अशोक सिंह का सबसे बड़ा योगदान पारंपरिक बासमती की गुणवत्ता से समझौता किए बिना उसकी उत्पादकता बढ़ाने में रहा। अध्यापन और शोध में रुचि होने के कारण भारतीय कृषि सेवा परीक्षा छोड़कर आइएआरआइ में कृषि विज्ञानी के रूप में काम करना चुना। 1994 से बासमती चावल प्रजनन कार्यक्रम से जुड़े डा. अशोक ने 2007 में बासमती अनुसंधान विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली। उस समय पारंपरिक बासमती किस्मों की अवधि करीब 160 दिनों की थी और पैदावार मात्र दो से ढाई टन प्रति हेक्टेयर होती थी। लंबी अवधि और कम उत्पादन के कारण किसान इन किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने से हिचकते थे। इस चुनौती को डा. अशोक ने अवसर में बदला और ऐसी किस्मों के विकास पर काम किया, जो कम समय में तैयार हों, अधिक उपज दें।

दूसरी फसलों की मिला बोआई का अवसर

डा. अशोक सिंह के शोध का परिणाम पूसा बासमती 1509 और 1692 जैसी किस्मों के रूप में सामने आया, जो लगभग 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इससे किसानों को समय की बचत के साथ दूसरी फसलों की बोआई र्को अवसर मिला। माड्‌यूल ब्रीडिंग के जरिये विकसित इन किस्मों में रोग कम लगते हैं, जिससे कीटनाशकों का उपयोग घटता है और निर्यात के लिए जरूरी गुणवत्ता मानकों पर ये खरी उतरती है। इसके बाद पूसा बासमती 1509, 1692, 1718, 1728, 1847, 1885, 1886, 1979, 1985 सहित 25 से अधिक उन्नत प्रजातियों का विकास हुआ, जिसने बासमती को अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूती दी।

गुणवत्ता बनाए रखने पर जोर

डा. अशोक का शोध भारत रत्न प्रो. एमएस स्वामीनाथन की उस अवधारणा पर आधारित रहा, जिसमें उच्च उपज के साथ पारंपरिक गुणवत्ता बनाए रखने पर जोर दिया गया था। यही कारण है कि डॉ. अशोक के कार्य का असर केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहां, बल्कि खेतों और किसानों की आमदनी में सीधे दिखाई दिया। कीटनाशकों पर घटता खर्च, पर्यावरण के प्रति अनुकूल खेती और बेहतरं निर्यात मूल्य-इन तीनों मोचों पर उनके योगदान ने भारतीय कृषि को लाभ पहुंचाया।

बोरलाग अवार्ड भी मिला

उत्तर प्रदेश में गाजीपुर जिले के बरहट गांव में किसान केदारनाथ सिंह के घर जन्मे अशोक कुमार सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही शुरू हुई। बचपन में खेतों और पशुपालन से जुड़ा जीवन आगे चलकर उनके शोध की जमीन बना। इंटरमीडिएट के बाद बीएचयू से बीएससी और एमएससी (कृषि आनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन) में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान और गोल्ड मेडल प्राप्त करने के. बाद उन्होंने आइएआरआइ, पूसा नई दिल्ली से पीएचडी की। अध्यापन और शोध के प्रति झुकाव के कारण उन्होंने भारतीय कृषि सेवा के बजाय अनुसंधान को चुना। आइएआरआइ में आने से पहले डा. अर्शाक टाटा इंस्टीट्यूट में रिसर्च एसोसिएट रहे और 1994 से 2009 तक हिसार स्थित बायोसीड जेनेटिक्स में कर्पास ब्रीडर के रूप में भी कार्य किया। 2009 में वे आइएआरआइ में प्रधाने विज्ञानी बने और 2019 से 2024 तक संस्थान के निदेशक के रूप में जिम्मेदारी निभाई। उनके योगदान को 2012 में बोरलाग अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।