सफलता की कहानी      Publish Date : 09/05/2026

                       सफलता की कहानी

                                                                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेगर

चॉल में पले-बढ़े, 11,000 रुपये के वेतन से की शुरुआत और अब हैं तीन कंपनियों के मालिक, यह उस दौर की कहानी है, जब ग्यारहवीं में पढ़ने वाला एक साधारण-सा छात्र अपनी सीमित परिस्थितियों से जूझ रहा था। उसके पास स्कूल ड्रेस के नाम पर केवल एक ही शर्ट थी, जिसकी जेब पर स्याही का गहरा दाग लगा हुआ था। फिर भी मजबूरी ऐसी थी कि उसे हर दिन वही दागदार शर्ट पहनकर स्कूल जाना पड़ता था। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि बस का किराया तक नहीं जुट पाता, इसलिए वह रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचता था।

कहते हैं, हालात इन्सान को तोड़ भी सकते हैं और बना भी सकते हैं और उस लड़के ने टूटने के बजाय खुद को बनाने का फैसला किया। यह कहानी है सुशील सिंह की, जिन्होंने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया और आज तीन सफल कंपनियों के मालिक होने के साथ-साथ एक एनजीओ के संस्थापक भी हैं।

प्राइमरी स्कूल में की पढ़ाई

सुशील सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक गरीब परिवार में हुआ। उनके पिता आदित्य नारायण सिंह एक बैंक में सुरक्षा गार्ड थे, जबकि मां गृहिणी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि रोजमर्रा की जरूरतें भी मुश्किल से पूरी होती थीं। सुशील की शुरुआती पढ़ाई एक साधारण प्राइमरी स्कूल से शुरू हुई, जिसकी छत बारिश में टपकती थी। लेकिन किस्मत ने उन्हें बचपन में ही बड़ा मोड़ दिया। मात्र चार साल की उम्र में वह अपने पिता के साथ मुंबई चले गए, जहां डोंबिवली की एक छोटी-सी चॉल में उनका परिवार रहता था। मुंबई में जीवन आसान नहीं था। दस्तावेज न होने के कारण स्कूल में दाखिला तक नहीं मिल पा रहा था। जैसे-तैसे दाखिला मिला और सुशील ने पढ़ाई जारी रखी।

बारहवीं में हुए फेल

सुशील पढ़ाई में शुरू से अच्छे थे, लेकिन ग्यारहवीं के बाद उनका ध्यान भटकने लगा। परिणामस्वरूप, वह बारहवीं कक्षा में असफल हो गए। यह उनके जीवन का एक बड़ा झटका था, लेकिन यहीं से उनकी असली यात्रा शुरू हुई। उन्होंने हार नहीं मानी, दोबारा मेहनत की और बारहवीं पास की। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास कर ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज में दाखिला लिया। हालांकि, यहां भी उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा और उन्होंने ग्रेजुएशन बीच में ही छोड़ दिया।

कॉल सेंटर में किया काम

पढ़ाई छोड़ने के बाद सुशील दिल्ली आ गए। इसी दौरान उन्हें टीबी जैसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया, लेकिन बीमारी को हराकर उन्होंने फिर से काम शुरू किया। उन्होंने टेलीकॉलर और सेल्स एग्जीक्यूटिव के रूप में काम किया, जहां उनकी सैलरी सिर्फ 11,000 रुपये थी। बाद में उन्होंने कॉल सेंटर में भी काम किया। यहीं उन्हें एक महत्वपूर्ण बात समझ आई, कंपनियां छोटे ग्राहकों को नजरअंदाज करती है और केवल बड़े ग्राहकों पर ध्यान देती हैं। इस अनुभव ने उनके भीतर एक उद्यमी बनने की लौ जगा दी।

पहला कदम, खुद की कंपनी

नोएडा की एक कंपनी में काम करते हुए उनकी मुलाकात सरिता से हुई, जो आगे चलकर उनकी जीवन संगिनी बनीं। दोनों ने मिलकर एक बड़ा सपना देखा, अपनी खुद की कंपनी शुरू करने का। अमेरिका के एक व्यवसायी की मदद से उन्होंने एक छोटा-सा बीपीओ शुरू किया। एक को-वर्किंग स्पेस में सिर्फ आठ सीटों में से चार सीट किराये पर लेकर उन्होंने एसएसआर टेक विजन की शुरुआत की। यह शुरुआत छोटी थी, लेकिन सपने बहुत बड़े थे।

सफलता की उड़ान

लगभग ढाई साल बाद सुशील ने एक बड़ा जोखिम लिया, नोएडा में अपनी खुद की बिल्डिंग खरीदी। इसके बाद उन्होंने अपनी दूसरी कंपनी डीबाको शुरू की, जो एक ग्लोबल बीटूसी ऑनलाइन कपड़ों का ब्रांड है। फिर 2019 में उन्होंने तीसरी कंपनी साइवा सिस्टम्स इंक शुरू की, जो एक मल्टीनेशनल आईटी कंसल्टिंग कंपनी है। आज उनकी कंपनियां भारत ही नहीं, विदेशों में भी सफलतापूर्वक काम कर रही हैं और उनकी कुल संपत्ति करोड़ों रुपये आंकी जाती है।

युवाओं को सीख

  • असफलता अंत नहीं, एक नई शुरुआत है।
  • गरीबी कमजोरी नहीं, प्रेरणा बन सकती है।
  • बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखो।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।