
केले के साथ सहफसली खेती का कमाऊ मॉडल Publish Date : 28/02/2026
केले के साथ सहफसली खेती का कमाऊ मॉडल
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
लखीमपुर खीरी जिले के नवोन्मेषी किसान नारायण बालाजी ने केले की सहफसली खेती अपनाकर ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिससे वो सालभर लगातार आमदनी अर्जित कर रहे हैं। लखीमपुर खीरी की कृष्णा नगर कॉलोनी के किसान नारायण बालाजी अपने एक एकड़ खेत में केले के बीच आलू खीरा और करेला उगाते हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष खीरा और करेला मिलाकर लगभग ₹12,000 की कमाई हुई। आलू की बिक्री से लगभग ₹25,000 का लाभ हुआ। इन फसलों से केले की मुख्य फसल की पूरी लागत निकल जाती है। केले बिकने पर मिलने वाला पैसा उनका शुद्ध मुनाफा बन जाता है।
जैविक खेती से कम हुई लागत

नारायण जैविक खेती करते हैं। वे जीवामृत, गोबर, गुड़ और गोमूत्र से जैविक खाद तैयार करते हैं। ठंड के मौसम में केले की मजबूती के लिए चूने का पानी भी देते हैं। इससे रासायनिक खाद पर खर्च कम होता है और प्रति एकड़ लगभग ₹20,000 की बचत होती है। खरपतवार प्रबंधन और मल्चिंग का भी ध्यान रखा जाता है। करेला और खीरा की रोपाई के समय जैविक खाद और मल्चिंग कर के फसल सुरक्षित रहती है।
ऐसे तैयार किया मॉडल

उन्होंने एक एकड़ में लगभग 1250 केले के पौधे लगाए है। कतारों में केले की दूरी 8 फुट और पौधों के बीच दूरी 6 फुट रखी है। बीच में 4 फुट का नाला बनाया ताकि पानी और नमी का बेहतर प्रबंधन हो सके। बेड बनाकर आलू भी लगाई, जिससे उन्हें 5 क्विंटल बीज से एक एकड़ में लगभग 50 क्विंटल आलू का उत्पादन मिला है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
