
चुनौतियों की नींव सफलता की इमारत Publish Date : 27/02/2026
चुनौतियों की नींव सफलता की इमारत
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
लोको पायलट समता कुमारी ने मालगाड़ी चलाकर ट्रेन को फर्राटे से दौड़ाने का बचपन का सपना साकार किया है। काजल खारी को जेसीबी चलाने में कोई परहेज नहीं है। देश की महिलाओं द्वारा चुनौतियां चुनने का अभियान जारी है। कठिन यह चुनने वाली ऐसी ही महिलाओं ने चुनौतियों की नींव पर खड़ी की है सफलता की इमारत
मैंने सोचा नहीं था कि जहां मैं खड़ी होऊंगी वहां कोई लड़की नहीं होगी और पुरुषों के बीच अपनी जगह बनानी होगी। मैंने परवाह नहीं की कि लोग क्या कहेंगे या रास्ते में आने वाली कठिनाइयों का सामना कैसे किया जाएगा? मैंने समझ लिया कि खुद को साबित करना होगा, कमजोर नहीं पड़ना होगा। तभी आज मैं सफल हूं और संतुष्ट भी। ऐसा कह सकती हैं वे लड़कियां, जिन्होंने अलग हटकर काम करने में न कोई शर्म महसूस की और न ही डर।
जेसीबी क्यों नहीं चला सकती
जेसीबी आपरेट करना अब काजल खारी के लिए आम बात है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के बिल्लू खारी की जेसीबी में एक बार बड़ी खराबी आ गई। मरम्मत में काफी रुपये खर्च होगए। ड्राइवर रखने की स्थिति नहीं थी। तब बेटी काजल ने पिता से जेसीबी चलाने की इच्छा जताई। पहले तो उन्होंने असहमति जताई। उन्हें लगा कि लड़की है, पता नहीं चला पाएगी या नहीं। बाद में काजल के संकल्प के आगे वह झुक गए और स्वीकृति दे दी। काजल ने भी कम समय में जेसीबी चलाना सीख लिया और पिता की मददगार बनीं। काजल का कहना है कि जबहत्प्रीत एडी सिंहमहिलाएं ट्रेन और हवाई जहाज चला सकती हैं तो मैं जेसीबी क्यों नहीं चला सकती? इसी सोच ने मुझे जेसीबी चलाने को प्रेरित किया। बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा काजल कहती हैं कि जब जेसीबी का चालक काम पर नहीं आता था तो मुश्किल होती थी। तभी से जेसीबी सीखने का मन बनाया। पुरुषों के वर्चस्व वाले पेशे को अपनाकर खुद पर गर्व महसूस करतीहूं। मैं दर्जनों किसानों के खेतों को समतल कर चुकी हूं साथ ही गांव के तालाब को गहरा किया है। छोटे-छोटे काम तो रोज के हैं। अब तो मेरी छोटी बहन भी जेसीबी चलाना सीख रही है। वह कहती हैं कि दो साल पहले गड्ढा खोदते समय गलती के कारण जेसीबी फंस गई, तब मन में खयाल आया कि यह काम छोड़ दें, लेकिन पापा ने हौसला बढ़ाया।
लाइनवुमेन बन तोड़े बाड़े
अभी तक तो देश में लाइनमैन ही होते आए हैं, लेकिन तेलंगाना की सिरिशा ने देश की पहली महिला लाइनवुमेन बनने का गौरव प्राप्त किया है। एक मिनट में वह बिजली के खंभे पर चढ़ जाती हैं और खराबी ठीक कर देती हैं। । वह मात्र 20 साल की हैं। जब लाइनमैन की भर्ती के लिए उन्होंने आवेदन देखा तो उसमें महिलाओं के लिए वर्जित लिखा था, लेकिन उन्होंने इस बात का विरोध किया और लंबी लड़ाई लड़कर अतंतः जीत हासिल की।
तांगेवाली पड़ गया नाम
पंजाब के गुरुदासपुर की भोली को ज्यादातर लोग भोली तांगेवाली के नाम से ही पुकारते हैं। शराबी पति अचानक घर छोड़कर चला गया तो घर चलाने के लिए उन्होंने तांगा चलाना शुरू किया और स्वाभिमान के साथ परिवार को पाला। जब हालात सुधरे तो ऑटो खरीद लिया, लेकिन लोग उन्हें तांगेवाली ही बुलाते हैं। वह अपने दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रही हैं। वह कहती हैं कि कोई काम छोटा नहीं होता।
पंजाब के होशियारपुर की पोलियोग्रस्त बेबी बंगा का जीवन काफी संघर्षमय रहा है। उन्होंने भजन गाना शुरू किया, लेकिन कोरोनाकाल में भगवती जागरण नहीं हुए तो घर चलाने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने का फैसला किया। अब वह ऑटो चलाकर परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं। लुधियाना रेलवे स्टेशन पर महिला कुली माया और लाजवंती यात्रियों का सामान उठाती हैं। हिसार की पिंकी सबसे युवा प्रोफेशनल ट्रैक्टर ड्राइवर हैं। वह खुद तो आगे बढ़ ही रही हैं। अन्य लड़कियों को भी प्रेरणा दे रही हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
