
नदी के किनारे गाँव हैः एक कविता Publish Date : 08/03/2026
नदी के किनारे गाँव हैः एक कविता
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
नदी के किनारे गाँव है
चल कर आए हैं, बहुत दूर से
नदी के किनारे गाँव हैं।
पैरों में कंकड़ चुभते हैं,
फटी बिवाई पाँव हैं।।
रात-दिन दहशत में बीते,
कोई चोर तो कोई साद है।
नाविक गया, विदेश में कमाने,
टूटी सी एक नाव है।।

वोट-सोट सब कने के लिए हैं,
बड़ों-बड़ों का दाव है।
पानी कुछ यों चढ़ गया घरों में।
ज्यों आटे का भाव है।।
जने कौन-कौन आता है,
कोई अफसर है तो कोई राव है।
पैर तो कहीं टिकते ही नहीं हैं?
रेत के ऊपर छांव है।

प्रस्तुतिः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
