
यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं Publish Date : 06/01/2026
यह नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर
ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
है अपनी ये तो नहीं,
है अपना ये व्यवहार नहीं।
धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है।
बाग बाजारों की सरहद पर,
सर्द हवा का पहरा है।
सूना है प्रकृत का आंगन,
कुछ रंग नहीं, उमंग नहीं,
हर कोई है घर में दुबका हुआ,
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं।
चंद मास अभी इंतजार करो,
नित मन में तनिक विचार करो।
नये साल नया कुछ हो तो सही,
क्यों नकल में सारी अक्ल बही।
उल्लास मंद है जन-मन का,
आयी अभी बहार नहीं।
ये नव वर्ष हमें स्वीकार ही नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
ये धुन्ध कुहासा छंटने दो,
श्रातों का राज सिमटने दो।
प्रकृति का रूप निखरने दो,
फागुन का रंग बिखरने दो।
प्रकृति दुल्हन का रूप धार,
जब स्नेह-सुधा बरसायसेगी।
शस्य - श्यामला धरती माता,
घर-घर खुशहाली लायेगी।
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि,
पर नव वर्ष मनाया जायेगा।
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर,
जय गान सुनाया जायेगा।
युक्ति-प्रमाण से स्वयं सिद्व,
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्व।
आर्यों की कीर्ती सदा - सदा,
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
अनमोल विरासत के धनिकों को,
चाहिए कोई उधार नहीं।
ये नव वर्ष हमें स्वीकार ही नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
है अपनी ये तो रीत नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं,
है अपनी ये तो रीत नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।

प्रस्तुतिः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
