मधुमक्खी पालन पर संकट      Publish Date : 12/10/2025

                          मधुमक्खी पालन पर संकट

                                                                                                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

“छोटे छत्तेदार भृंग कीट का प्रसार के कारण मधुमक्खी पालन उद्योग पर छाया घोर संकट”

मधुमक्खी पालकों के लिए अलर्ट: मधुमक्खी कॉलोनियों में छोटे छत्तेदार भृंग कीट का हमला, जारी की गई चेतावनी

Alert for Beekeepers: मधुमक्खी कॉलोनियों में छोटे छत्तेदार भृंग कीट के हमले का पता चला है। सीएसकेएचपीकेवी, पालमपुर ने मधुमक्खी पालकों को ICAR के सुझावों का पालन करने की सलाह दी है। साथ ही, मधुमक्खी कॉलोनियों को मजबूत बनाए रखने, नियमित निरीक्षण, जाल का इस्तेमाल, मिट्टी उपचार और संक्रमित छत्तों को इधर-उधर न ले जाने की सलाह दी गई है।

छोटे छत्तेदार भृंग कीट (Small Hive Beetle) के हमले का पता चला है, जिसने मधुमक्खी पालकों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय (CSKHPKV), पालमपुर ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के दिशानिर्देशों का पालन करने की सलाह दी है। मधुमक्खी पालकों को कॉलोनियों को मजबूत रखने, नियमित निरीक्षण करने, जाल का उपयोग करने, मिट्टी का उपचार करने और संक्रमित छत्तों को इधर-उधर न ले जाने की हिदायत दी गई है। यह कीट न केवल भारत, बल्कि वैश्विक स्तर पर मधुमक्खी पालन के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है।

मधुमक्खी पालन पर संकट

                                                                    

भारत में मधुमक्खी पालन केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण आजीविका, परागण, जैव विविधता संरक्षण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का आधार माना जाता है। देश में लगभग 58 लाख किसान कॉटन, सूरजमुखी और सरसों जैसे फसलों के लिए मधुमक्खियों के परागण पर निर्भर हैं। हालांकि, छोटे छत्तेदार भृंग कीट ने इस उद्योग को जोखिम में डाल दिया है। वैश्विक स्तर पर मधुमक्खियों की घटती संख्या पहले से ही चिंता का विषय है, और भारत में यह संकट और भी गहरा है, जहां मधुमक्खी पालन का आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व अत्यधिक है।

छोटे छत्तेदार भृंग कीट का प्रसार

छोटा छत्तेदार भृंग (Aethina tumida) मूल रूप से सहारा के दक्षिणी अफ्रीका का निवासी है। इसकी अनुकूलन क्षमता और आक्रामक प्रवृत्ति ने इसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, एशिया और अब भारत तक पहुंचा दिया है। भारत में इसकी मौजूदगी पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, असम, कर्नाटक और हाल ही में हिमाचल प्रदेश में दर्ज की गई है। यह कीट मधुमक्खी कॉलोनियों के लिए एक विनाशकारी शिकारी, परजीवी और अपमार्जक है, जो शहद, पराग और मधुमक्खियों को नष्ट करता है।

कीट का जीवन-चक्र और नुकसान

                                                                 

यह कीट मधुमक्खी कॉलोनियों में घुसकर अंडे, लार्वा, पराग, शहद और मोम को खा जाता है। इसके लार्वा छत्तों में मल छोड़ते हैं, जिससे शहद और पराग किण्वित होकर सड़ जाते हैं। लार्वा मिट्टी में जाकर प्यूपा अवस्था पूरी करते हैं और फिर नए छत्तों पर हमला करते हैं। इसका जीवन-चक्र 3 से 12 सप्ताह का होता है, जिससे इसकी आबादी तेजी से बढ़ती है।

यह कीट मधुमक्खी छत्तों से निकलने वाली विशिष्ट गंध को सूंघकर दूर से ही उनका पता लगा लेता है। कुछ क्षेत्रों में इसने 80% तक कॉलोनियों को नष्ट कर दिया है, जिससे शहद उत्पादन में भारी कमी और मधुमक्खी पालकों को आर्थिक नुकसान हुआ है।

हिमाचल प्रदेश में छोटे छत्तेदार भृंग कीट का प्रकोप एक चेतावनी है कि भारत को अपने मधुमक्खी पालन उद्योग को बचाने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे। यह कीट न केवल मधुमक्खी कॉलोनियों को नष्ट कर रहा है, बल्कि पूरे कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल रहा है। मधुमक्खी पालकों को ICAR और CSKHPKV के दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। साथ ही, सरकार, अनुसंधान संस्थानों और मधुमक्खी पालकों को मिलकर जैव-नियंत्रण और दीर्घकालिक समाधान खोजने की जरूरत है।

प्रबंधन और नियंत्रण के उपाय:

विशेषज्ञों ने इस कीट से निपटने के लिए कई उपाय सुझाए हैं, लेकिन अभी तक कोई प्रभावी जैव-नियंत्रण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, CSKHPKV और ICAR की सलाह और इन दिशा-निर्देशों पर अमल करने की सलाह दी गई हैं:

नियमित निगरानी: कॉलोनियों का हर हफ्ते निरीक्षण करें।

स्वच्छता: छत्तों को साफ रखें और मृत मधुमक्खियों या अवशेषों को हटाएं।

जाल का उपयोग: बीटल ट्रैप्स जैसे नालीदार प्लास्टिक या तेल-आधारित जाल लगाएं।

मिट्टी उपचार: मिट्टी में कीटनाशक जैसे परमेथ्रिन का उपयोग करें, जहां लार्वा प्यूपा बनते हैं।

संक्रमित छत्तों का प्रबंधन: प्रभावित कॉलोनियों को नष्ट करें और उन्हें अन्य क्षेत्रों में न ले जाएं।

कॉलोनियों को मजबूत रखना: स्वस्थ मधुमक्खी कॉलोनियां इस कीट का बेहतर मुकाबला कर सकती हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।