
एआई खोजी हो सकता है, लेकिन लेखक नहीं Publish Date : 02/11/2026
एआई खोजी हो सकता है, लेकिन लेखक नहीं
प्रो0 आर. एस. सेंगर
यह वर्साेलस इलाक़ा, बिल्डिंग का 39वां फ्लोर और एंबेसी की रोशन लाइट से रोशन पेट. ‘द हाउस ऑफ लिविंग रूम’ के दीवान पर मनोज राजन त्रिपाठी बैठे हैं। ‘दो बीघा ज़मीन’, राज कपूर - सुशांत की ‘बूट पॉलिश’ जैसी कहानियों की उड़ान. मुल्क का सुबूत लखनऊ, उत्तर प्रदेश अपने निगरानी छोड़ जा। इसी सुकून में साहब बिजनेस सूट पहने एक सक्षम ज़मीन पर बिछे कारपेट पर विश्लेषकों के साथ आखिरी सांसें गिन रही एक लड़की के कान काट रहा था।
मौत की खांसियों और बर्फ-सी ठंडी सर्दियों का यह दृश्य पढ़कर आपको अंदाज़ा होगा कि लिखने में क्या ताकत होती है और क्या स्टेफन किंग की इसी तरह कर्रस पेलेंट से रस निकालकर पढ़ने बनते हैं। यह मसाला है। कि, अतिरिक्त के चेहरे पर सुकून हो, कि रिकार्ड पनेवार पर बड़ा रहा दो बीघा समीकरणों का गाना कसीतल की इन अर्थव्यवस्था का हिस्सा है कि यह कत्ल, अंततः की कहानी छोड़कर जाना चाहता है।
असल में यह बहस तब शुरू हुई, जब जॉन रीहलर-रोमनच उपन्यासकार जॉन ने रिक्लेमरन इंटरनेशनल बुक सेंसेशन में तार्कदार की आने वाले प्रोडक्शन पर पैसा बचाने के लिए ज़हमत पेश करने से उपन्यास लिखा सकते हैं। एआइ लेखकों के लिए, जबरदस्त संकट खड़ा हो जाएगा। 50 से अधिक उपन्यास लिख चुके विक्रम कह रहे हैं कि उन्हें किसी एआइ की मदद नहीं ली। हालांकि मुझे नहीं लगता कि यह प्रकाशकों के लिए सुनहले का सौदा होगा, क्योंकि एआइ तो नेट से बांटकर हर क्राइम थ्रिलर लिख सकता है। एक ट्रेन में मर्डर या एक महापिश्त में कत्ल की सात-आठ लोगों पर शक का फामूला ही फार्मूला कहलाता है। हो सकता है अनायत का ‘हू डन इट’ का प्लाट इधर-उधर के उत्तरोत्तर अंदाज लिख डालूं, लेकिन स्टेफन किंग की ‘मिस्चीवर बुलेट’ कैसी ख्याति है ? ‘हूट’ के उस जोकर की खतरनाक खानदानी और बच्चों के दर का डअन्वेषण करे स्वप्न? आर्थिक मदद केस पर प्रकाशकों ने घोस्ट राइट्स के नाम से मेरे उपन्यास ‘कसारी मसालों’ को यदि एआइ लिखता तो उसे कैसे पता चलता कि किस तर्क तक दिमाग पिस्तौल से आर्थिक का मर्डर हुआ, वह लारेंस विश्नोई गैंग ने सप्लाई की थी। रोहिणी जेल में बंद लारेंस गैंग के जिंतेंद गोगी की आर्थिक गैंग में क्या रोल था, हिंदुस्तान के टाय वेपन स्मग्लर इरफान खुजवाला ने पाकिस्तान बाहर से सारे पंजाब के उच्च वेपन स्मग्लर इमरान खुजवाला ने पाकिस्तान बाहर से सारे पंजाब के उच्च तकता गांव में क्या ढील की थी? एआइ को ये जानकारियां हो ही नहीं सकतीं, क्योंकि इसके लिए मैंने पांच राज्यों में जाकर कीट मशीन तब रिसर्च की थी। एक वक्त था, जब गुलशन नंदा, इब्ने सफ़ी व सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे लेखकों की मंहगी फीस और रायल्टी के कारण प्रकाशकों ने घोस्ट राइट्स के नाम से क्राइम थ्रिलर छापने शुरू किए थे, लेकिन असल लेखकों की मांग कम नहीं हुई। सच यह है कि एआइ रामचरितमानस को इंटरनेट से नकल कर किताब लिख सकता है, लेकिन राम की मर्यादा व रावण के पांडित्य का अनुभव नहीं कर सकता। कानपुर का केपटाउन, बनारस और मणिकर्णिका की रक्ष में नहाते विश्वनाथ और मर्क के मुक्कार असारी की थ्रिलर और मर्क की रात क्या जाने? मध्य प्रदेश के बयागम कांड में मिली त्रासदी का सच हो या शाहबुद्दीन के सियासी गठजोड़ की कहानी, दक्षिण भारत के डोसा लिंगा की क्राइम हो या फिर बंगाल के मेडिकल कॉलेज में रंग का प्लाट, असल में एआइ रिसर्च हो सकता है, राइसर हो सकता है, सफल अपराध कथाकार बन सकता है एआइ?
रहस्य-रोमांच और अपराध कथाओं के अमेरिकी लेखक जान ग्रिशम ने हाल ही में कहा है कि प्रकाशक पैसा बचाने के लिए रहस्य-रोमांच व अपराध कथा उपन्यास अब लेखकों के बजाय एआइ से लिखा सकते हैं। इससे बहस शुरू हो गई है कि क्या एआइ जासूसी और अपराध कथाओं की शैली और उसकी बारिकियों का निर्वाह कर सकता है, जो रहस्य और रोमांच को बनाए रखने के लिए आवश्यक है? इस विषय पर क्या कह रहे हैं अपराध कथाओं के लेखक...
आजकल पुस्तकें दो तरह की होती हैं। एक, जिन्हें आप बार-बार पढ़ते रहते हैं और दूसरी, जिनका आप रोब खातें पर पढ़ते नहीं। एआइ से लिखी पुस्तकें दूसरे किस्म हैं। लेखक के पूरे वजूद को मयस्कर बनाई गई पुस्तक देती है कल्पना की आत्मा, मस्तिष्क के पंद्रह कल्पवृक्ष की उड़ान और बाकी के हर पहलू, की कहानी। क्या मशीनी पुस्तक इतना कुछ कर सकती है? लेखक की मृत्यु हो जाती है, पर कृति जीवित रहती है। इसे आलोचक कहें, ना, अर्थ का अनुसंधान। इसे लेखन के साथ ऐसा सम्भव है? प्रकाशक यदि एआइ से उपन्यास लिखवाएगा, तो लेखन में प्रतिभा का, अंतःप्रेरण का कोई भूमिका ही नहीं रहेगी। यह दवाहरा परिचय है, लेकिन मेरा पूर्ण विश्वास है कि एआइ व्यक्ती मेवला है।
लेखक के खून-पसीने से उत्पन्न रचना एक जादूई कलवली की तरह होती है, जो आहिस्ता से हम उस दुनिया में सैर कराती है, जहां दूसरी किसी चीज़ (एआइ) के लिए प्रवेश कर नहीं सकती। पाठक सिर्फ नहीं पढ़ता, कहानी के किरदारों के साथ जीता-मरता है, उसके दुख-सुख में डूबता-उतराता है। लेखक के माथे पर पसीना खून की बूंद बनकर कागज पर टपकता है तो सूच कर लग बनता है। इस इशारा करते से, बटन दबाने से अर्थहीन, प्रभावहीन और संवेदनशील वाक्यों का पसारना बहता है।
उदहसन ने पड़ोसी से रोया रोया, ‘हम दोनों एक ही सब्जी बनाती हैं, फिर भी तेरा पति खाना चटका के ले-सेकर खाता है, मेरा पति यूं खाता है, जैसे बस पेट भर रहा हो! मुझे बता, तू मटर-पनीर कैसे बनाती है?’ पड़ोसी ने बताया, ‘मैं पहले कढ़ाई में घी, लहसुन, प्याज डाल के भूनती हूं!’ ‘वो तो मैं भी करती हूं!’ ‘फिर टमाटर हरी मिर्च, हल्दी, मसाले’ ‘मैं भी’ ‘फिर मैं डाल टमाटर के दिल्ली है!’ अनुस्सत खामोश!
यही फर्क है मशीनी और समर्पित लेखन में। एआइ दिल निकाल कर नहीं डाल सकता! मशीनी लेखन कितना भी जोर मारे, लेखक की कल्पना की उड़ान की जगह नहीं ले सकता। संवेदनशील पाठक आज भी पुराने अंदाज के पथ्थर हो रहे, संवेदनहीन रचनाओं की जो यूथियति होती है। कोई एआइ क्यों जार्ज बाचंद्र था, टालस्टय और शेक्सपियर की जगह ले सकता है? जिंसए एड एआइ ‘बार एंड पीस’, ‘पिगमेलियन’और ‘रोमियो एंड जूलियट’लिखेगा, किस गोबेट, जुकर, साहित्य अकादमी अवार्ड मशीन को मिलेगी, उस दिन प्रलय आ जाएगी।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।