हरित पटाखों को लेकर इतनी हाय-तौबा क्यों      Publish Date : 01/11/2026

 हरित पटाखों को लेकर इतनी हाय-तौबा क्यों

                                                                                                             प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

सर्दी शुरू होने के पहले ही दिल्ली में प्रदूषण का खतरा गहराने लगा है। राज्य सरकार आगामी 1 नवंबर से निजी-सरकारी दफ्तरों के लिए हफ्ते में दो दिन घर से काम करने, ऑफिस का समय बदलने जैसे नियम लागू करने जा रही है। दूसरी तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पटाखों पर पूर्ण पाबंदी लगाने से इनकार कर दिया है। वायु प्रदूषण से गैस चैंबर बनते शहरों, खासकर दिल्ली के लिए इस फैसले के मायने पर दो राय।

नई पीढ़ी के हरित पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति देने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सुखद है। अदालत ने तय मानक और बेचे जाने की बात कही है। यह समझना चाहिए कि किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके प्रभावी नियंत्रण के साथ-साथ बचाव संबंधी निर्देशों पर निर्भर करती है। शीर्ष अदालत के इस निर्देश में नियंत्रण और बचाव, दोनों की झलक दिखती है। उसने हरित पटाखों की वकालत की है, यानी पटाखों में रसायनों का कम इस्तेमाल होना चाहिए।

                              

पटाखों को प्रतिबंधित करने से कई तरह के नुकसान हो सकते हैं। पटाखों को प्रतिबंधित करने की बजाय उनमें रसायनों का कम इस्तेमाल हो और बचाव के उपायों पर ध्यान दिया जाए। पटाखों में पोटेशियम नाइट्रेट, पोटेशियम क्लोरेट, पोटेशियम परक्लोरेट जैसे ऑक्सीकरण एजेंट होते हैं, जो जलने में मदद करते हैं। जो चीज जलती है, वह सल्फर होता है, जिससे सल्फर डाई ऑक्साइड गैस पैदा होती है। इसमें चारकोल का भी इस्तेमाल होता है, जो जलने के बाद कार्बन डाई ऑक्साइड गैस पैदा करती है।

फिर, रंग देने वाले कारक भी इसमें मिलाए जाते हैं, जैसे स्ट्रॉन्शियम का यौगिक का उपयोग पटाखों में चटख व गहरा लाल रंग पैदा करने के लिए किया जाता है, तो बेरियम निकलता है। इन जैसे तमाम रासायनिक यौगिकों का उपयोग बतौर ‘कलरिंग एजेंट’ किया जाता है। पटाखे को बांधने के लिए डेक्सट्रिन जैसा स्टार्च ‘बाइंडर’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

ग्रीन पटाखे में भी यह सब होता है, लेकिन पारंपरिक पटाखों से कुछ अलग। मिसाल के लिए, हरित पटाखे में बेरियम क्लोराइड का विकल्प इस्तेमाल किया जाता है। इसमें तमाम पटाखों के शुद्ध रूप होते हैं; और तो और बाइंडर के रूप में शेलैक लगाया जाता है, जो गोंद जैसा होता है, जिस कारण जलने के बाद उत्सर्जन अंदर ही फंसा रहता है, बाहर नहीं निकलता।

हरित पटाखे पारंपरिक पटाखों से कुछ अलग मिसाल के लिए, हरित पटाखे में बेरियम क्लोराइड का विकल्प इस्तेमाल किया जाता है। इसमें सल्फर और पोटेशियम की मात्रा भी कम होती है। इसलिए सोच-विचारकर ही इन पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है।

सेफ वाटर रिलीज जैसे हरित पटाखे जलने के बाद पानी की छोटी-छोटी बूंदें, यानी जल-वाष्प पैदा करते हैं, जिससे जले हुए पटाखे से आग नहीं लगती। ये जल-वाष्प हवा को ठंडा करने में भी मदद करते हैं।

हरित पटाखों में बेरियम क्लोराइड या बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पारंपरिक पटाखों में हो, यही हरित पटाखे में जियोलाइट, सिलिका आदि का इस्तेमाल होता है, जिससे प्रदूषण कम होता है।

त्योहार है, तो फिर पटाखों पर जोर क्यों? बेशक, उनकी बातों का सम्मान है, लेकिन सच यह भी है कि दीवाली आनंद और प्रकाश का उत्सव है, जिसका रूप अब बदल गया है। पहले के जमाने में सिर्फ दीपक जलाए जाते थे, लेकिन अब दीवाली में हम रंग-बिरंगी रोशनी देखते हैं। जब प्रकाश का स्वरूप बदल गया, तो आनंद मनाने के लिए पटाखों के इस्तेमाल को गलत कैसे माना जाए?

                           

  • हरित पटाखों की कीमत पारंपरिक पटाखों से अधिक होती है। हालांकि, इनको पहचानने का तरीका आसान है। हरित पटाखे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से प्रमाणित होते हैं, इसलिए उन पर बोर्ड का लोगो लगा होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने हरित पटाखे चलाने को अनुमति को लेकर जो आदेश दिया है, वह निराशाजनक है। पटाखे के लिए अस्पतालों में कितनी मुश्किलें आती हैं। इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
  • आज मजबूरी में किसान फसल-सब्जियों पर रासायनिक कीटनाशक करते हैं। उसी पैमाने से करोड़ों पर असर पड़ सकता है। इसलिए जरूरत ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने की है। पहले हम देखते थे कि गांव में मवेशी हैं, तो उनके गोबर से खाद बनता था और उस खाद से हमारे खाद्य पदार्थ पोषक होते थे।
  • जहां तक हरित पटाखे की बात है, तो ये भी हवा को दूषित करते हैं। ये चाहे जितने भी हरित हों, लेकिन जब आप इसे आग लगाकर हवा में छोड़ते हैं, तो इससे आकाश में पक्षियों को भी नुकसान पहुंचता है। कई पक्षी मर जाते हैं।
  • पटाखों से 80 से लेकर 125 डेसिबल या उससे भी अधिक तक का शोर होता है, जो कानों के लिए हानिकारक हो सकता है। जबकि इंसानों में सामान्य बातचीत लगभग 60 डेसिबल की होती है।
  • हरित पटाखे आम पटाखों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत कम प्रदूषण फैलाते हैं, पर ये पूरी तरह से प्रदूषण-मुक्त नहीं होते हैं। इनसे भी पीएम 2.5 और पीएम10, सल्फर डाई-ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड हवा में घुलते हैं, जिनसे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है।
  • प्रदूषण दो प्रकार के होते हैं। एक तो वायु प्रदूषण है और दूसरा वह है जिसमें हवा, पानी या धरती प्रदूषित होती है। एक चीज को ठीक करने के क्रम में हम कई दूसरी चीजों को खराब कर देते हैं।
  • पक्षी तो सबसे अधिक संवेदनशील प्राणी होते हैं। यह तथ्य है कि वे एक खास समय में मैदानी इलाकों में आते हैं और गर्मी बढ़ने पर पहाड़ों-जंगलों में चले जाते हैं। पक्षी तो मारे जाते हैं।
  • आज कई बातों पर सावधानी बरतने की जरूरत है देश का वातावरण दूषित करने के लिए। हम नदियों में कचरा डालकर उनको नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे जैव-विविधता को लगातार नुकसान पहुंच रहा है। इन चीजों पर भी ध्यान देना होगा।
  • पटाखों को प्रतिबंधित करने से लाखों लोगों के रोजगार खत्म हो जाएंगे, ऐसा कहा जाता है। लेकिन इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि आज स्वास्थ्य समस्या को देखते हुए पटाखों से होने वाला नुकसान उसके फायदे से बहुत ज्यादा है।
  • कुल मिलाकर, हम चीजों को अलग-अलग करके नहीं देख सकते, क्योंकि कोई भी प्रदूषण पूरे वातावरण में फैलता है, तो उससे कुछ बचा नहीं रहता। इसलिए हमें पर्यावरण संरक्षण को समग्रता में देखने की जरूरत है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।