
पढ़ाई का दबाव नहीं झेल पाते विद्यार्थी Publish Date : 28/10/2026
पढ़ाई का दबाव नहीं झेल पाते विद्यार्थी
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
शिक्षा का उद्देश्य अब सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना नहीं रह गया है। अच्छे अंक, प्रवेश परीक्षा, डिग्री, नौकरी और करियर की होड़ में यह लगातार बदलता जा रहा है। इसका सबसे गंभीर असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इसी कारण उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
आईआईटी जैसे उच्च प्रतिष्ठित संस्थानों में तो यह समस्या कहीं अधिक गहरी है। आंकड़े इस संकट की गंभीरता बताते हैं। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, एनसीआरबी की 2022 की रिपोर्ट में 13,044 छात्रों की आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जो उस वर्ष देश में हुई कुल आत्महत्याओं का 7.6 प्रतिशत थी। इसी समस्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय कार्य-बल बनाया गया। फरवरी 2026 तक उसके सर्वे में 12.88 लाख से अधिक छात्रों व 16,750 उच्च शिक्षण संस्थानों ने भाग लिया। कार्य-बल ने कई मुद्दों की पड़ताल की थी।

यहां आईआईटी जैसे संस्थानों का जिक्र लाजिमी है। आईआईटी, दिल्ली की छात्र आत्महत्याओं पर बनी समिति ने अत्यधिक अकादमिक दबाव, लगातार प्रतिस्पर्धा और ऐसी ग्रेडिंग व्यवस्था, जो छात्रों में प्रतिस्पर्धात्मक तनाव बढ़ा सकती है, को प्रमुख चिंताओं में रखा। समिति ने कोचिंग के बाद होने वाली थकान और जाति व लैंगिक भेदभाव जैसे दूसरे पहलुओं का भी उल्लेख किया। 2023 और 2024 में आईआईटी, दिल्ली में कई छात्रों की आत्महत्या के बाद यह समिति बनाई गई थी।
इसका अर्थ यह है कि समस्या दूसरी है। असल में, बच्चे बचपन से ही सफलता को अंकों से जोड़ना सीख जाते हैं। स्कूल में अच्छे अंक, फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता, प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश, वहां बेहतर सीजीपीए, इंटर्नशिप और अंततः अच्छी नौकरी-हर चरण में एक नई दौड़ सामने होती है, जो तनाव बढ़ाती है। ऐसे वातावरण में परीक्षा में असफलता या कम अंक आना कई बार विद्यार्थियों को हताश कर जाता है। ऐसे में, उनका हर तरीके से ध्यान रखा जाना आवश्यक हो जाता है।

वैसे, यह समझना भी जरूरी है कि हर तनाव आत्महत्या की ओर नहीं ले जाता और हर आत्महत्या के पीछे एक ही कारण नहीं होता। इसलिए समाधान केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा का बोझ घटाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। छात्रों के लिए आसानी से उपलब्ध और गोपनीय काउंसलिंग, नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच, अकादमिक मेंटरिंग, असफलता से उबरने की व्यवस्था और शिक्षक-छात्र संवाद को संस्थागत रूप देना जरूरी है। उनको यह बताना होगा कि पढ़ाई जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम है, जीवन का विकल्प नहीं।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।