
बाजार में पहुंचते ही क्यों बढ़ जाते हैं फसल उत्पाद के भाव Publish Date : 23/10/2026
बाजार में पहुंचते ही क्यों बढ़ जाते हैं फसल उत्पाद के भाव
प्रो0 आर. एस. सेंगर
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चीनी के दामों में हो रही निरंतर वृद्वि ने किसान के लिए उसके उत्पादों के लाभकारी मूल्यों को लेकर एक बार फिर से सवाल खड़ा कर दिया है।
पुराने समय से ही किसान की यह विडम्बना रही है कि जब तक उसकी फसलों के उत्पाद उसके खेत, खलिहान या घर पर होते हैं तो उसके भाव को लेकर उस समय तमाम तर्क दिए जाते हैं, लेकिन जैसे ही उसकी फसलों के उत्पाद व्यापारी, मिल या बाजार व्यवस्था के हाथों में पहुंचते हैं तब उनका भाव भी अचानक ही बढ़ने लगता है। किसान के द्वारा अपनी फसल को बेचने के बाद उसके भाव कुछ समय बाद ही तेजी से ऊपर जाने लगता है।
जब किसान अपने फसल के उत्पादों को बेच देता है तो उसके कुछ समय के बाद ही किसान की फसल के उत्पादों के भाव तेजी के साथ ऊपर जाने लगता है। इसके बाद किसान अपने आपको ठगा हुआ महसूस करता है। इस चीनी के निरंतर बढ़ते दामों ने देश के सामने एक बार फिर यही सवाल लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि चीनी महंगी क्यों हुई? उससे बड़ा सवाल यह है कि जब चीनी के इस बढ़े मूल्य का उचित लाभ किसान तक क्यों नहीं पहुँच पाया?
क्या कहती है चीनी की बैलेंस शीट?

इस पूरे मामले को समझने के लिए भावनाओं से कहीं अधिक आवश्यक है कि पहले हम चीनी उपलब्धता और उसकी खपत के आंकड़ों का अध्ययन करें। वर्ष 2025-26 के लिए सरकार का ताजा अनुमान है कि देश में 306 लाख मीट्रिक टन चीनी के उत्पादन का है, जबकिअ शुरूआती अनुमान की 343 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्पादन का था। इस हिसाब से देखा जाए तो चीनी का उत्पादन शुरूआती अनुमानों की तुलना में लगभग 37 लाख मीट्रिक टन कम हुआ है। सरकार के द्वारा कम उत्पादन के लिए रेड रॉट बौर टॉप बोरर जैसे रोगों के साथ ही अत्याधिक बारिश से जलभराव को प्रमुख कारण बताया गया है।
देश में चीनी की ओवर ऑल खपत लगभग 280 से 290 लाख मीट्रिक टन के आसपास है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार एथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन इस वर्ष लगभग 9 प्रतिशत रहा है, जो कि वर्ष 2022-23 की अपेक्षा 12 प्रतिशत कम रहा है। अतः चीनी के भावों में मौजूद तेजी का पूरा दोष एथेनॉल के उत्पादन पर डालना भी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। इसके उपरांत भी चीनी के भाव में तेजी बनी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई को चीनी का औसत खुदरा भाव करीब 48.18 रूपये प्रति किलोग्राम था, जो कि 20 तक बढ़कर 55.70 रूपये प्रति किलोग्राम तक पहुँच गया था। अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसी रायटर्स के द्वारा 24 अगस्त को जारी की गई रिपोर्ट में भी इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के अध्यया के हवाले से बताया गया है कि चीनी के भाव आई इस तेजी को काफी हद तक स्टॉक की कमी के स्थान पर Speculative Buying अर्थात सट्ठात्मक खरीद से जोड़कर देखा जा रहा है।
इसी रिपोर्ट के अनुसार चालू सीजन के दौरान लगभग 279 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्पादन, के सापेक्ष 280-285 लाख मीट्रिक टन चीनी की घरेलू खपत और लगभग 30 लाख मीट्रिक टन एथेनॉल डायवर्जजन का अनुमान है। अगले सीजन में शुरूआती स्टॉक लगभग 35 लाख मीट्रिक टन तक रहने की उम्मीद है, जो कि पिछले वर्ष के 50 लाख मीट्रिक टन से 15 लाख मीट्रिक टन कम है। इस स्थिति को देखकर कहा जा सकता है कि देश में उपलब्ध चीनी पर निगरानी की आवश्यकता है, परन्तु इसे एक ऐसी स्थिति के रूप में प्रस्तुत करना कि देश में चीनी का स्टॉक समाप्त होने के कगार पर है, किसान और चीनी उपभोक्ता दोनों के ही हित में नहीं है।
उत्तर प्रदेश में गन्ने की उपलब्धता में बड़ी कमी

अब यदि हम उत्तर प्रदेश की स्थिति को देखें तो वर्ष 2025-26 के सीजन में प्रदेश के चीनी को उपलब्ध गन्ने की मात्रा में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 63.12 लाख मीट्रिक टन तक की कमी बात सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टस के अनुसार कम पैदावार के साथ-साथ उपलब्ध गन्ने का कुछ हिस्से की आपूर्ति खांड़सारी इकाईयों के लिए भी की जाती है।
इसके सम्बन्ध में जब खांड़सारी इकाईयों के संचालकों से बात हुई तो उनके द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार भी गत वर्ष की अपेक्षा उन्हें भी इस वर्ष कम गन्ना मिल पाया है। खांड़सारी इकाईयों को यदि केवल 400 रूपये प्रति क्विंटल वर्तमान उत्तर प्रदेश SAP को आधार मानकर देखा जाए तो 6.312 करोड़ क्विंटल ग 400 बराबर 2,524.8 करोड़ रूपये अर्थात लगभग 2,525 करोड़ रूपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों तक कम पहुँच पाया।
इस आंकड़े को भी सीधा-सीधा किसानों का शुद्व नुकसान नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गन्ने का कुछ हिस्सा खांडसारी या गुड़ जैसी अन्य इकाईयों में भी गया है।
यदि हम इस पूरे नुकसान का आकलन करते हैं तो यह लगभग 3,200 करोड़ रूपये का बैठता है। खांडसारी इकाईयों को गए गन्ने का कोई ऑथेंटिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, खांडसारी इकाईयों का रिकार्ड लगभग 100 खांड़सारी इकाईयों के मालिकों से बातचीत के आधार पर यह आंकड़ा तैयार किया गया है, लेकिन यह आंकड़ा यह अवश्य ही स्पष्ट करता है कि उत्तर प्रदेश के गन्ना क्षेत्र के उत्पादन और चीनी मिलों तक पहुँचने वाले कच्चे माल में कितना बड़ा आर्थिक अंतर पैदा हुआ है। यही वह बिन्दु है जिस पर सरकार एवं चीनी उद्योग को गम्भीरता पूर्वक विचार करना चाहिए।
जब चीनी महंगी हो सकती है तो फिर गन्ने का मूल्य क्यों नहीं बढ़ सकता?
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2025-25 के लिए अगेती प्रजाति के गन्ने का भाव 400 रूपये प्रति क्विंटल और सामान्य प्रजातियों के लिए 390 रूपये प्रति क्विंटल तथा अन्य प्रजातियों के लिए 355 रूपये प्रति क्विंटल का मूल्य निर्धारित किया गया है। किसान के लिए यह एक निश्चित मूल्य है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार का काम उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाना है, वहीं दूसरी ओर सरकार की जिम्मेदारी उत्पादक किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य दिलाना भी होती है। जब गन्ना किसान के पास होता है तो उसके सामने गन्ने का भुगतान, लागत और अगली फसल लेने की चिंता होती है, वह अपनी नई फसल को महीनों तक रोककर नहीं रख सकता।
इसलिए अपना गन्ना उसे निर्धारित समय पर ही चीनी मिलों अथवा अन्य प्रसंस्करण इकाईयों तक पहुँचाना पड़ता है। परन्तु यदि किसान के हाथों से गन्ना निकल जाने के बाद चीनी का भाव बढ़ जाता है, तो सरकार स्टॉक लिमिट लागू कर देती है, जमाखोरी की जांच करती है, आयात की अनुमति प्रदान करती है और बाजार में कीमतों को नियत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाती है।
इसी प्रकरण के अन्तर्गत सरकार ने हाल ही में 10 लाख मीट्रिक टन के शुल्क-मुक्त आयात के लिए अनुमति भी प्रदान कर दी है, जिससे कि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनी रहे और उसकी कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके। उपभोक्ता को राहत प्रदान करना आवश्यक है, लंकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि ऐसी ही तत्परता किसान के हितों में कब दिखाई देगी?
महंगाई तो हर चीज की बढ़ती है परन्तु किसान की फसल की कीमत क्यों नहीं बढ़ती?
जूते-चप्पल महंगे होते हैं, कपड़े महंगे होते हैं, दवाईयां महंगी होती है, खाद एवं कृषि रसायनों की कीमत भी बढ़ती है। बीज महंगा होता है, डीजल महंगा होता है, कृषि मशीनरी महंगी होती है और मजदूर की मजदूरी भी बढ़ती है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन में भी समय-समय पर वृद्वि होती है, तो फिर किसान की फसल के मूल्य की बात आते ही लागत और महंगाई के स्थान पर उपभोक्ता की जेब का तर्क सामने क्यों आ जाता है?
आखिर किसान भी तो इसी देश का नागरिक होता है, उसके बच्चों को भी अच्छी शिक्षा की आवश्यकता होती है, उसका परिवार भी बेहतर स्वास्थ्य चाहता है, उसे अपना मकान भी बनाना होता है और उसे अपनी अगली फसल में निवेश करना होता है। किसान को उसकी फसल का लाभकारी मूल्य मिलना किसी का कोई अहसान नहीं होता है बल्कि यह उसके श्रम, पूंजी, जोखिम और प्राकृतिक आपदाओं से लड़कर पैदा की उपज का एक न्यायसंगत प्रतिफल होता है।
असली सवाल चीनी की कीमतों का नहीं बल्कि मूल्य वितरण का है
आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि चीनी 50 रूपये किलो बिके या 55 रूपये किलो, बल्कि सवाल तो यह होना चाहिए कि 55 रूपये किलो की चीनी में उस किसान का हिस्सा कितना है, जिसने गन्ना पैछा किया है? जिस किसान ने खेत तैयार किया, बीज लगाया, खाद डाली, सिंचाई की, मजदूरी दी, गन्ने के रोगों से लड़ा और महीनों के इंतजार के बाद अपनी फसल मिल को दे दी, तो क्या बाजार में अंतिम उत्पाद की बढ़ी हुई कीमतों में उसे उसका उचित हिस्सा नहीं मिलना चाहिए, सरकार को चीनी के स्टॉक और उसकी कीमतों पर निगरानी रखनी चाहिए।
जमाखोरी और सट्ठेबाजी पर कड़ी कार्यवाई करनी चाहिए और उपभोक्ता को अनावश्यक महंगाई से बचाना चाहिए और इसके साथ ही सरकार को किसान के हित में उसी मजबूती के साथ खड़ा होना चाहिए। किसान के घर में फसल सस्ती और उसके बाजार में पहुँते ही महंगी, इस व्यवस्था को बदलना होगा, क्योंकि किसान को राहत नहीं चाएि, किसान को किसी की दया भी नहीं चाहिए किसान को यदि कुछ चाहिए तो वह है उसकी अपनी फसल का लाभकारी मूल्य, क्योंकि यह उसका अधिकार है और ऐसे में चीनी के बढ़ते मूल्यों ने एक बार फिर से देश के सामने यही मूल प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जब किसान की फसल से बने उत्पाद की कीमत बाजार में बढ़ सकती है, तो किसान को फसल का मूल्य क्यों नहीं बढ़ सकता?

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।