
हरित ऊर्जा क्रांति के सन्दर्भ में एक ऐतिहासिक उद्घोष Publish Date : 17/10/2026
हरित ऊर्जा क्रांति के सन्दर्भ में एक ऐतिहासिक उद्घोष
प्रो0 आर. एस. सेंगर
‘‘1000 कि.ग्रा. हाइड्रोजन के भण्ड़ारण की व्यवस्था एवं आधुनिक रिफ्यूलिंग प्रणाली इस परयिोजना को पूर्ण रूप आत्मनिर्भर स्वरूप प्रदान करती हैं। यही मॉडल भविष्य में देश के अन्य रेत मार्गों पर भी विकसित किया जा सकता है। यह परियोजना केवल रेलवे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि, इस परियोजना के माध्यम से भारत हरित हाइड्रोजन मिशन को व्यवहारिक रूप प्रदान करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। वर्तमान समय में जबकि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा की सुरक्षा जैसी चुनौतयों का समाना कर रही है, तो इसमय में स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन व्यवस्था भारत को विश्व के नेतृत्व करने की नई भूमिका भी प्रदान कर सकती है। ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेन संचालन का सबसे बड़ा लाभ यह कि हाइड्रोजन चालित ट्रों को ऐसे रेलमार्गों पर भी संचालित किया जा सकेगा, जहाँ कि विद्युत लाईन का प्रसार करना आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से कठिन होता है।’’
भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियों पर दौड़ने वाली रेलगाड़ियों का एक विशाल नेटवर्क ही नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक शक्ति, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और तकनीकी प्रगति का भी एक सशक्त प्रतीक है। लगभग 150 वर्ष से अधिक की अपनी गौरवशाली यात्रा के दौरान भारतीय रेल के द्वारा अनेक ऐतिहासिक पड़ाव भी पार किए हैं। स्टीम इंजन से प्रारम्भ हुई भारतीय रेल की यह यात्रा पहले डीजल इंजन के बाद विद्युत इंजन तक का सफर तय कर चुकी है और अब भारत हरित ऊर्जा के उस स्वर्णिम युग में प्रवेश करने जा रही है, जहाँ अब भारतीय रेलगाड़ियां केवल जीवाश्म ईंघन ही नहीं बल्कि स्वच्छ हाइड्रोजन ऊर्जा के माध्यम से आगे बढ़ेगी। हरियाणा के ऐतिहासिक जिले जींद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा भारत की प्रथम हाइड्रोजन चालित ट्रेन को हरी झंड़ी दिखाया जाना केवल एक नई रेल सेवा का शुभारम्भ ही है, बल्कि विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और हरित भारत के साझा संकल्प का उद्घोष है। यह क्षण भारतीय रेलवे के इतिहास में उसी प्रकार के स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा, जैसे कि कभी प्रथम रेलगाउ़ी के संचालन, राजधानी एक्सप्रेस, शताब्दि एक्सप्रेस, मेट्रो अथवा वंदे भारत के जैसी ट्रेनों के शुभारम्भ के अवसरों को याद किया जाता है और किया जाता रहेगा।

ठस प्रक्रिया के अन्तर्गत हरियाण्ण के जींद जिले का चयन भी अत्यंत प्रतीकात्मक है। हरियाण का यह नगर केवल एक रेलवे का जंकश नही नहीं बल्कि इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का एक जीवित केन्द्र भी है। महाभारतकालीन परम्पराओं से सम्बन्धित इस क्षेत्र का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक संदर्भों में प्राप्त होता है। जनश्रुतियों के अनुसार इस क्षेत्र का सम्बन्ध देवी जयन्ती की आराधना से भी माना जाता है। आज यही भूमि भारत की आधुनिक वैज्ञानिक चेतना और हरति प्रौद्योगिकी के नए अध्याय की साक्षी भी बनने जा रही है। अतीत की सांस्कृतिक विरासत और भविष्य की वैज्ञानिक सोच का यह अद्भुत संगम जींद को राष्ट्रीय मानचित्र पर भी एक नई पचान प्रदान करता है। भारतीय रेलवे की दृष्टि से भी जींद का महत्व अत्यंत ही महत्वपूर्ण रहा है। उत्तर रेलवे का यह प्रमुख जंक्शन वर्षों से हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और राजस्थान आदि राज्यें को जाड़ने वाला एक रणनीतिक रेल केन्द्र है। बदलते समय के साथ इसका भी आधुनिकीकरण किया गया और अब यही जंक्शन भरत की हरित रेल क्रॉन्ति का भी प्रारम्भिक केन्द्र बन चुका है।
भारतीय रेल ने पिछले एक दशक में परिवर्तन की एक ऐसी गति देखी है, कुछ वर्ष पहले तक जिसकी कल्पना करना भी कठिन था। वंदे भारत ट्रेनों का विस्तार, अमृत भारत एक्सप्रेस की संचालन, समर्पित माल गलियारे ;क्मकपबंजमक थ्तमपहीज ब्वततपकवतेद्धए कवच के जैसी स्वदेशी सुरक्षा प्रणाली, अमृत भारत स्टेशन येजना के अंतर्गत रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास, लगभग सम्पूर्ण ब्रॉडगेज नेटवर्क का विद्युतीकरण, आधुनिक सिंग्लिंग व्यवस्था तथा डिजिटल यात्री सेवाओं ने रेलवे की कार्यसंस्कृति और उसकी छवि दोनों को ही बदल दिया है। अब हाड्रोजन ट्रेन इस परिवर्तन मात्र का अगला औश्र सबसे महत्वपूर्ण पड़ावव के रूप में सामने आई है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक भविष्य के स्वच्छ परिवहन की आधारशिला मानी जा रही है। इस तकनीक के अन्तर्गत डीजल का उपयोग नहीं किया जाता है। ईंधन सेल में हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिसके द्वारा ट्रेन का सचालन सम्भव हो पाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड अथवा अन्य प्रदूषित गैसों का उत्सर्जन नहीं होता है और केवल जलवाष्प ही निकलती है।
यही कारण है कि इसे जीरो एमिशन ट्रांसपोर्ट की दिशा में सबसे अधिक प्रभावी तकनीकों में शामिल किया जाता है। यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश पहले से ही इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। ऐसे में भारत की स्वदेशी तकनीक और अपनी इंजीनियरिंग क्षमता के बल पर इस क्षेत्र में प्रवेश करना केवल एक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि वैरिूवक ऊर्जा के परिवर्तन के अन्तर्गत भारत की सक्रिय भागीदारी के संकेत भी हैं। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का निर्माण भारतीय इंजीनियर्स, वैज्ञानिकों और रेलवे के तकनीकी विशेषज्ञों की क्षमता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री के द्वारा विकसित की गई इस ट्रेन में अत्याधुनिक हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणाली स्थापित की गई है। जींद में स्थापित हाइड्रोजन उत्पादन एवं रिफ्यूलिंग अवसंरचना इस तथ्य का भी प्रमाण हैं कि भारत केवल तकनीकों उपभोक्ता देश ही नहीं, बल्कि उनका विकास, निर्माण और संचालन करने वाले एक अग्रणी राष्ट्र के रूप में भी तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। जींद में स्थापित किया गया हरित हाइड्रोजन संयंत्र इस परियोजना का सबसे अधिक महत्वपूर्ण आधार है। यहाँ स्थापित एक मेगावॉट क्षमता का इलेक्ट्रोलाइजर प्रतिदिन लगभग 420 किलोग्राम हाइड्रोजन का उत्पादन करने की क्षमता रखता है। इसके साथ ही लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन के भण्ड़ारण की व्यवस्था एवं आधुनिक रिफ्यूलिंग प्रणाली इस परियोजना को पूर्णतः आत्मनिर्भर स्वरूप प्रदान करती है। यही मॉडल भविष्य में देश के अन्य रेल मार्गों पर भी विकसित किया जा सकता है।
यह परियोजना केवल रेलवे तक ही सीम्ति नहीं है, बल्कि इस परियोजना के माध्यम से देश हरित हाइड्रोजन मिशन को एक व्यवहारिक रूप प्रदान करने की दिशा में भी अग्रसर है। वर्तमान परिस्थितियों में आज जबकि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, निरंतर बढ़ते कार्बन के उत्सर्जन और ऊर्जा सुरक्षा के जैसी तमाम चुनौतियों से जूझ रही है, तो ऐसे समय में स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित परिवहन व्यवस्था भारत को वैश्विक नेतृत्व नई भूमिका को प्रदान करने भी सक्षम हो सकती है। हाइड्रोजन से चालित ट्रेनों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इन ट्रेनों को ऐसे रेलमार्गों पर भी संचालित किया जा सकता है, जहाँ विद्युत लाईन को बिछाना आर्थिक अथवा तकनीकी दृष्टि से भी कठिन होता है। इस परियोजना के माध्यम से देश के दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों में भी पर्यावरण के अनुकूल रेल सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।