
जब विज्ञान किसान की भाषा बोलता है, तभी ज्ञान खेत में उतरता है Publish Date : 03/10/2026
जब विज्ञान किसान की भाषा बोलता है, तभी ज्ञान खेत में उतरता है
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
भारत में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है; यह हमारी सोच, अनुभव और ज्ञान को समाज से जोड़ने वाली शक्ति है। कृषि के संदर्भ में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। देश का किसान जब मौसम, मृदा, बीज, जल, कीट-रोग, जैविक खेती, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता या जलवायु-अनुकूल कृषि जैसी नई अवधारणाओं को समझता है, तभी वैज्ञानिक अनुसंधान वास्तव में खेत तक पहुँचता है। इसलिए मेरे लिए हिंदी दिवस केवल राजभाषा के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर नहीं, बल्कि विज्ञान को जनभाषा से जोड़ने के संकल्प का दिन है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की मूल प्रतिबद्धता अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार के माध्यम से भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक, टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु-सक्षम बनाना है। इस यात्रा में भाषा हमारे लिए केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी के अंतिम छोर तक पहुँचने की रणनीतिक आवश्यकता है।
आज देश में कृषि अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान को किसान तक पहुँचाने के लिए आईसीएआर का विशाल विस्तार तंत्र कार्य कर रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र इस व्यवस्था की अग्रिम पंक्ति हैं। इनके माध्यम से किसानों, ग्रामीण युवाओं और कृषि से जुड़े हितधारकों को प्रशिक्षण, प्रदर्शन, परामर्श और नई तकनीकों की जानकारी दी जाती है। डिजिटल माध्यमों ने इस संपर्क को और व्यापक बनाया है। किसान सारथी जैसे प्लेटफॉर्म कृषि संबंधी सलाह को किसानों तक उनकी आवश्यकता के अनुरूप पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
यहाँ भाषा का प्रश्न सीधे कृषि उत्पादकता और किसान की आय से जुड़ जाता है। किसान के लिए वैज्ञानिक सलाह तभी उपयोगी है जब वह समय पर मिले, स्थानीय परिस्थिति से जुड़ी हो और ऐसी भाषा में हो जिसे वह सहज रूप से समझ सके। यही कारण है कि आईसीएआर वैज्ञानिक ज्ञान को हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने पर निरंतर बल देता रहा है। हमारी हिंदी पत्रिकाएँ खेती और फल-फूल इसी प्रयास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं।
'खेती' मासिक और 'फल-फूल' द्विमासिक हिंदी पत्रिकाओं के रूप में कृषि एवं बागवानी संबंधी वैज्ञानिक जानकारी को सरल और लोकप्रिय शैली में किसानों तथा कृषि-रुचि रखने वाले पाठकों तक पहुँचाती हैं। हमारा अनुभव बताता है कि ज्ञान का प्रभाव तभी अधिक होता है जब वह स्थानीय अनुभव से संवाद करता है। इसलिए भविष्य की कृषि-संचार व्यवस्था में केवल अंग्रेजी से हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद पर्याप्त नहीं होगा।
हमें किसान की भाषा में विज्ञान और किसान के अनुभव से विज्ञान—दोनों दिशाओं में संवाद विकसित करना होगा। इस दिशा में डिजिटल कृषि एक बड़ा अवसर है। आईसीएआर की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार परिषद की वेबसाइट पर एक वर्ष में 4,613 पृष्ठ अपडेट किए गए और 41.89 लाख से अधिक पेज-व्यू दर्ज हुए। यह दर्शाता है कि कृषि ज्ञान की मांग अब केवल संस्थानों और पुस्तकालयों तक सीमित नहीं है; किसान, विद्यार्थी, शोधार्थी और युवा डिजिटल माध्यमों से भी वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।
हिंदी दिवस विशेष
"मेरे लिए हिंदी दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है— विज्ञान की शक्ति तभी पूर्ण होती है, जब उसकी भाषा समाज की भाषा बनती है। हमारा संकल्प होना चाहिए कि आने वाले वर्षों में भारत का कोई किसान केवल इसलिए किसी वैज्ञानिक अवसर से वंचित न रहे कि वह उसकी भाषा में उपलब्ध नहीं था; और कोई विद्यार्थी केवल इसलिए कृषि अनुसंधान से दूर न हो कि वैज्ञानिक ज्ञान उसके लिए सहज नहीं बनाया गया। जब किसान अपनी भाषा में विज्ञान समझेगा, युवा अपनी भाषा में नवाचार करेगा और विद्यार्थी अपनी भाषा में प्रश्न पूछने का साहस करेगा— तभी भारत की कृषि ज्ञान-आधारित, आत्मनिर्भर और भविष्य-सक्षम कृषि बनेगी। यही हिंदी दिवस की सार्थकता है। यही 'विज्ञान से खेत तक और ज्ञान से युवा तक' हमारी प्रतिबद्धता भी है।"
हिंदी दिवस का एक महत्वपूर्ण आयाम कृषि शिक्षा और विद्यार्थियों से भी जुड़ा है। आज के कृषि विद्यार्थी कल के वैज्ञानिक, उद्यमी, शिक्षक, नीति-निर्माता और कृषि-तकनीकी उद्यमों के नेतृत्वकर्ता होंगे। यदि हम चाहते हैं कि भारत की अगली पीढ़ी कृषि को केवल पारंपरिक आजीविका के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र के रूप में देखे, तो हमें उसके लिए वैज्ञानिक ज्ञान के अधिक व्यापक और समावेशी माध्यम तैयार करने होंगे। आईसीएआर की हैंडबुक ऑफ एग्रीकल्चर इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है।
यह कृषि विज्ञान के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ रहा है और इसकी लगभग दो लाख प्रतियाँ बिक चुकी हैं। हमारा अगला लक्ष्य ऐसे ज्ञान-संसाधनों को अधिकाधिक डिजिटल, बहुभाषी और विद्यार्थी-केंद्रित बनाना होना चाहिए।
लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।