भारतीय परम्परा में वनों की उपयोगिता एवं उनकी महत्वता      Publish Date : 12/09/2026

भारतीय परम्परा में वनों की उपयोगिता एवं उनकी महत्वता

                                                                                             प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

हमारे दूरदर्शी मनीषियों के द्वारा वनों एवं वृक्षों के महत्व, भूमिका एवं उनकी आवश्यकता के दृष्टिकोण को अपनाते हुए वनों एवं वृक्षों को देवतुल्य मानते हुए समस्त प्राकृतिक संसाधनों को समेकित रूप से परम्परा, संस्कृति एवं धार्मिक कर्मो का एक अनिवार्य अंग बनाया गया है। इस क्रम में वट सावित्री व्रत के अवसर पर बरगद और आंवला नवमी के अवसर पर आंवला के वृक्षों का पूजन तथा धर्मिक कार्यों के अन्तर्गत आम, केला, अशोक, बेल और कुश आदि के सहित विभिन्न वनस्पतियों के अंगों का प्रयोग करने से वृक्षों के संरक्षण और संवर्धन को आम जन से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। इसके परिणामस्वरूप वर्तमान समय में अत्याधिक जैविक दबाव होने के उपरांत भी हमारा देश एवं विशेष रूप से प्रदेश प्राकृतिक संपदा की दृष्टि से बेहद समृद्व एवं सम्पन्न है।

प्रदेश सरकार के द्वारा विकास एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति समन्वय, हरीतिमा संवर्धन तथा वृक्षारोपण के साथ वानिकी गतिविधियों के माध्यम से रोजगार एवं आजीविका सृजन की दिशा में तीव्र गति के साथ कार्य किए जा रहे हैं। पिछले 9 वर्षों में 247 करोड़ से अधिक पौधों का रोपण, प्राकृतवास में सुधार, वनाच्छादित और वृक्षाच्छादित क्षेत्र में अभूतिपूर्व वृद्वि, माँ की स्मृति एवं सम्मान के  नारे के अन्तर्गत प्रदेश में सर्वाधिक संख्या में पौधों का रोपण, गत वर्षों में अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के 13 वेलैंड्स को रामसर साइट्स के रूप में अधिसूचित किए जाने के जैसे अनेक प्रयासों के माध्यम से प्रदेश को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक दिन में पांच करोड़ पौधा रोपण कर प्रदेश में ‘वृक्षारोपण महायज्ञ’का शुभारम्भ भी किया जा चुका है।

वनों और स्वच्छ वातावरण की अंक में मानव जीवन सदैव ही फलता-फलता रहा है। वन एवं वृक्ष पर्यावरण से कार्बन को अवशोषित कर हमारे वातावरण को स्वच्छ और संतुलित बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। इसलिए पौधों का रोपण अधिक से अधिक संख्या में करना अत्यंत आवश्यक है। यह एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में अपनाया जाना बहुत आवश्यक है। इसी के सन्दर्भ में वर्षा काल के दौरान आयोजित किए जा रहे ‘वृक्षारोपण महायज्ञ’ के अन्तर्गत समस्त प्रदेश वासियों के सहयोग एवं अभूतपूर्व समर्थन के चलते ही 35 करोड़ पौधों के रोपित करने का संकल्प लेकर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं।

वन महोत्सव को मनाने का सबसे प्रमुख उद्देश्य आमजन में प्रकृति के प्रति जागरूकता एवं प्रेम उत्पन्न करना है। वन महोत्सव प्रत्येक वर्ष 01 से 07 जुलाई तक औपचारिक रूप से शुरूआत कर पूरे वर्षाकाल के दौरान अनवरत चलने वाले एक कार्यक्रम के रूप में मनाया जाता है। जुलाई माह के प्रथम सप्ताह में मानसून के आगमन के साथ ही प्रदेश में चारों ओर वर्षा होने लगती है, इससे मिट्ठी में नमी आ जाती है और इसी कारण पौधों के रोपण के लिए इस समय को सबसे अधिक उपयुक्त माना जाता है।

इस क्रम में वन महोत्सव 2026 के अवसर पर वन, पर्यावरण, जन्तु उद्यान एवं जलवायु परिवर्तन विभाग उत्तर प्रदेश के द्वारा पूरे प्रदेश में व्यापक स्तर पर पौध रोपण कार्यक्रम सहित जन जागरूकता से सम्न्धित विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन भी किया ज रहा है। इतिहास गवाह है कि जब-जब मानव ने प्रकृति के साथ अपना सामजस्य स्थपित किया है, तब-तब समृद्वि, शांति और विकास के भी नए आयाम स्थापित होते आए हैं। इसके विपरीत जब भी प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन किया गया है, तो इसके परिणम स्वरूप पर्यावरणीय असंतुलन, जल-संकट, जैव-विविद्यता में कमी और जलवायु परिवर्तन के जैसी गम्भीर चुनौतियाँ भी उत्पन्न होकर सामने आई हैं। वर्तमान समय में पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक आपदाओं के जैसी समस्याओं से जूझने को विवश है।

हमारा प्रदेश के वन न केवल लाखों वन्य जीवों और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, बल्कि जल सरक्षण, मृदा संरक्षण, स्वच्छ वायु तथा जैव-विविद्यता के संवर्धन में भी एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः प्रदेश को हरित समृद्व बनाने, प्रदूषण की समस्या को नियंत्रित करने तथा अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित पर्यावरण प्रदान करने के लिए व्यापक रूप से पौधा रोपण ही एक महत्वपूर्ण और आवश्यक माध्यम है। वृक्ष न केवल पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी साधन है, बल्कि यह जीवन, स्वास्थ्य, आजीविका और आर्थिक समृद्वि का आधार भी होते हैं। इसी उददेश्य से प्रदेश सरकार के द्वारा एक बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान संचालित किए जा रहे हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।