
किसान की फसल के उत्पाद बाजार में पहुँचते ही क्यों हो जाते हैं कीमती Publish Date : 08/09/2026
किसान की फसल के उत्पाद बाजार में पहुँचते ही क्यों हो जाते हैं कीमती
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
हमारे किसान भाईयों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब उसकें फसलीय उत्पाद उसके खेत, घर या खलिहान आदि में होती है, तो उस समय उसके बाजार भाव को लेकर तमाम तर्क दिए जाते हैं, लेकिन जैसे ही वही फसलीय उत्पाद, व्यापारी, मिल या बाजार की व्यवस्था के हाथों में पहुँचती है तो उसकी कीमतों में अचानक ही वृद्धि होने लग जाती है। किसान के द्वारा अपने फ़सल के उत्पादों के बेचने के कुछ समय के बाद ही उसी फ़सल के उत्पाद का बाज़ार भाव तेजी से ऊपर चला जाता है। ऐसे में किसान अपने आपको स्वभाविक रूप से ठगा हुआ महसूस करता है।
इस बार चीनी के बढ़ते दामों ने यही सवाल किया कि एक बार फिर देश के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में प्रश्न केवल यह ही नहीं है कि चीनी इतनी महंगी क्यों हुई? बड़ा सवाल यह है कि जब चीनी के दाम बढ़े तो इस बढ़ी हुई कीमतों का उचित लाभ गन्ना किसानों तक क्यों नहीं पहुंच सका?
क्या कहती है चीनी की बैलेंस शीट
इस पूर मामले को समझने के लिए भावनाओं से अधिक आवश्यक है कि हम चीनी की उपलब्धता एवं खपत के आंकड़ों का गहराई के साथ विश्लेषण करके देखें। वर्ष 2025-26 के लिए सरकार का ताजा अनुमान, देश में लगभग 306 लाख टन चीनी उत्पादन का है, जबकि प्रारंभिक अनुमान करीब 343 लाख टन चीनी के उत्पादन का था। इसका अर्थ यह है कि चीनी के शुरूआती उत्पादन अनुमानों की तुलना में लगभग 37 लाख टन चीनी का उत्पादन कम हुआ।
सरकार के द्वारा इसके पीछे गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसे रोगों और अत्याधिक बारिश के चलते होने वाले जल-भराव को प्रमुख कारण बताया है।
हाल ही में सरकार ने 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त किराये की मात्रा भी कम कर दी है, ताकि घरेलू बाजार में संतुलन बनाए रखा जा सके और निर्यात पर नियंत्रण रखा जा सके। उपभोक्ताओं को राहत देना जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि किसानों के हित में ऐसी ही तत्परता कब दिखाई देगी?
कहा जा रहा है कि हाल की तेजी से वास्तविक कमी की बजाय काफी हद तक सट्टा खरीद याने सट्टा खरीद से जुड़ा हुआ देखा जा रहा है। इसी रिपोर्ट के अनुसार स्टॉक एक्सचेंज में करीब 279 लाख टन का उत्पादन, करीब 280-285 लाख टन का घरेलू सामान और करीब 30 लाख टन का एथेनॉल डायवर्जन का अनुमान है। अगले सीज़न में शुरुआती स्टॉक में लगभग 35 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के लगभग 50 लाख टन से 15 लाख टन कम है। इसका मतलब यह है कि जिस देश में चीनी लगभग खत्म होने वाली है और ऐसा होना देश में किसान और उपभोक्ता दोनों के हित में नहीं है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।