चीनी के बढ़ते दामों के चलते गन्ना किसानों की उम्मीदें भी बढ़ी      Publish Date : 20/08/2026

चीनी के बढ़ते दामों के चलते गन्ना किसानों की उम्मीदें भी बढ़ी

                                                                                             प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

उत्तर प्रदेश में चीनी के बढ़ते दामों ने गन्ना किसानों की उम्मीदों को एक बार फिर मजबूत कर दिया है। थोक बाजार में चीनी की कीमत करीब 4,400 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई है, जिसे पिछले सात वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। चीनी के दाम में इस तेजी के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसका फायदा गन्ना किसानों को भी मिलेगा और क्या आने वाले गन्ना पेराई सत्र के लिए उत्तर प्रदेश सरकार गन्ने का भाव बढ़ाएगी। खासकर इसलिए क्योंकि अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं और गन्ना किसान प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रभाव रखने वाला वर्ग हैं।

उत्तर प्रदेश में गन्ना सिर्फ एक फसल नहीं बल्कि लाखों किसान परिवारों की आय का प्रमुख आधार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर सहित कई जिलों में बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं। अकेले बिजनौर जिले में करीब 2.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होने की बात सामने आई है। ऐसे में गन्ने के दाम और चीनी की कीमत में होने वाला बदलाव किसानों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर डालता है। किसान लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि गन्ने की खेती में बढ़ती लागत को देखते हुए उन्हें बेहतर कीमत मिलनी चाहिए।

मौजूदा स्थिति किसानों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कई वर्षों से चीनी की कीमतों पर दबाव बना हुआ था। कोविड महामारी के बाद लंबे समय तक चीनी का थोक भाव करीब 3,900 रुपये प्रति क्विंटल या उससे नीचे रहा। उस समय गन्ने का उत्पादन बढ़ने से चीनी का उत्पादन भी बढ़ गया था। बाजार में चीनी का स्टॉक बढ़ने लगा और उपलब्धता ज्यादा होने के कारण कीमतों पर दबाव बना रहा। चीनी मिलों के सामने भी आर्थिक चुनौतियां बनी रहीं और उन्हें चीनी के अलावा एथेनॉल जैसे विकल्पों पर ध्यान बढ़ाना पड़ा।

अब परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं। इस बार गन्ने का उत्पादन कम बताया जा रहा है। इसके साथ ही चीनी का स्टॉक भी पिछले वर्ष की तुलना में काफी नीचे है। गन्ने के एक हिस्से का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में होने और कुछ गन्ने के पारंपरिक क्रशरों तथा कोल्हुओं में जाने से चीनी मिलों के लिए उपलब्ध गन्ने की मात्रा भी प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर चीनी के उत्पादन और बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर पड़ा है। जब बाजार में उपलब्धता कम होती है और मांग बनी रहती है तो कीमत बढ़ने की संभावना स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।

बिजनौर की चीनी मिलों के आंकड़े भी इसी बदलाव की तरफ इशारा करते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जिले की चीनी मिलों के पास इस समय करीब 20.62 लाख क्विंटल चीनी का स्टॉक बचा हुआ है, जबकि पिछले वर्ष यह स्टॉक करीब 35.50 लाख क्विंटल था। यानी एक साल के भीतर उपलब्ध स्टॉक में बड़ी कमी आई है। जिले की मिलों ने इस सीजन करीब 90,86,458 क्विंटल चीनी का उत्पादन किया है। हालांकि इन आंकड़ों में चांदपुर चीनी मिल को शामिल नहीं किया गया है।

गन्ने की पेराई के आंकड़ों में भी कमी दिखाई देती है। बिजनौर की मिलों ने पिछले वर्ष की तुलना में इस सीजन करीब 1.30 करोड़ क्विंटल कम गन्ने की पेराई की है। गन्ने का उत्पादन कम होने के साथ-साथ पारंपरिक कोल्हुओं और क्रशरों में अधिक गन्ना जाने के कारण भी चीनी मिलों तक पहुंचने वाले गन्ने की मात्रा कम हुई। जब मिलों के पास कम गन्ना पहुंचा तो चीनी का उत्पादन भी प्रभावित हुआ और बाजार में उपलब्ध स्टॉक कम होता गया।

इसी बीच चीनी के थोक भाव में तेजी आई और यह करीब 4,400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। यह स्तर पिछले सात वर्षों में सबसे ऊंचा बताया जा रहा है। अगर बाजार में मांग मजबूत बनी रहती है तो एक्स-फैक्ट्री चीनी की कीमत करीब 5,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की संभावना भी जताई जा रही है। हालांकि यह भविष्य की संभावना है, इसकी कोई गारंटी नहीं है। बाजार की मांग, उत्पादन, स्टॉक, सरकारी नीतियों और अन्य परिस्थितियों के आधार पर कीमतों में बदलाव हो सकता है।

चीनी के खुदरा बाजार में भी कीमतों में तेजी दिखाई दे रही है। खुदरा चीनी का भाव 52 रुपये प्रति किलो या उससे अधिक तक पहुंचने की बात सामने आई है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर सीमित रहने की उम्मीद है, क्योंकि घरेलू खपत कुल चीनी खपत का 6 प्रतिशत से भी कम बताई गई है। इसलिए चीनी की कीमत में मौजूदा तेजी का बड़ा प्रभाव औद्योगिक और अन्य बड़े उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

लेकिन किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल चीनी के खुदरा या थोक भाव से भी आगे का है। किसान जानना चाहता है कि जब चीनी मिलों को बाजार में बेहतर कीमत मिल रही है, तो उसके गन्ने का मूल्य कितना बढ़ेगा। गन्ने की खेती में बीज, खाद, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी, मशीनरी, कटाई और ढुलाई जैसी लागत लगातार बढ़ती जा रही है। किसान का कहना है कि अगर उत्पादन लागत बढ़ रही है और चीनी की कीमत भी बेहतर हो रही है तो गन्ने का मूल्य भी उसी अनुपात में बढ़ना चाहिए।

भारतीय किसान यूनियन गैर-राजनीतिक के युवा प्रदेश अध्यक्ष दिगंबर सिंह ने भी इसी दिशा में बात रखी है। उनका कहना है कि चीनी की कीमत पिछले वर्षों की तुलना में काफी बेहतर है और मिलें फिलहाल मुनाफे की स्थिति में हैं। ऐसे में सरकार को ऐसा गन्ना मूल्य तय करना चाहिए, जिससे किसान गन्ने की खेती जारी रखने के लिए प्रोत्साहित हों। यह मांग केवल गन्ने के भाव में बढ़ोतरी तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों की खेती की आर्थिक व्यवहार्यता से जुड़ी हुई है।

गन्ना किसान के सामने एक और महत्वपूर्ण समस्या समय पर भुगतान की है। चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने पर किसानों को उम्मीद रहती है कि उनका गन्ना भुगतान भी तेजी से होगा। बिजनौर शुगर मिल के यूनिट हेड रविंद्र शुक्ला ने भी कहा है कि इस वर्ष चीनी की कीमतों में सुधार हुआ है और इससे मिलों को किसानों का गन्ना भुगतान अधिक तेजी से करने में मदद मिल सकती है। अगर ऐसा होता है तो किसानों को नकदी प्रवाह में राहत मिलेगी और अगली फसल की तैयारी में मदद मिल सकती है।

हालांकि किसानों की उम्मीद केवल भुगतान तक सीमित नहीं है। किसान चाहते हैं कि चीनी के अच्छे बाजार भाव का लाभ गन्ने के खरीद मूल्य में भी दिखाई दे। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश में गन्ने का मूल्य राज्य सरकार द्वारा तय किया जाता है। इसलिए चीनी के बाजार भाव में तेजी आने के बाद किसानों की नजर सीधे राज्य सरकार के फैसले पर टिक गई है।

अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे समय में गन्ना किसानों की उम्मीदें और राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में किसान गन्ने के भाव को लेकर सरकार के फैसलों को बेहद गंभीरता से देखते हैं। इसलिए किसानों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सरकार चुनाव से पहले गन्ने का भाव बढ़ाकर किसानों को राहत देगी।

किसानों की नजर सिर्फ भाव बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी है कि नया मूल्य उनकी वास्तविक लागत को कितना कवर करता है। यदि गन्ने की खेती में लागत लगातार बढ़ती रहती है और किसान को मिलने वाला मूल्य उस अनुपात में नहीं बढ़ता, तो लंबे समय में किसानों के लिए गन्ने की खेती आकर्षक बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। दूसरी तरफ चीनी मिलों के लिए भी यह जरूरी है कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में गन्ना मिलता रहे, क्योंकि चीनी उद्योग की पूरी अर्थव्यवस्था गन्ने की उपलब्धता पर निर्भर करती है।

यही वजह है कि किसानों का तर्क है कि गन्ने का ऐसा मूल्य तय होना चाहिए जिससे किसान को उत्पादन लागत निकालने के बाद उचित आय मिल सके। यदि किसान को बेहतर मूल्य मिलता है तो वह समय पर खेत की तैयारी, उर्वरक, सिंचाई और फसल प्रबंधन पर खर्च कर पाएगा। इससे लंबे समय में गन्ने की उत्पादकता और चीनी मिलों को मिलने वाले गन्ने की गुणवत्ता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी तरफ चीनी उद्योग के लिए भी मौजूदा स्थिति महत्वपूर्ण है। कम स्टॉक और बेहतर बाजार भाव मिलों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। अगर मिलों को चीनी की बिक्री से बेहतर आय मिलती है तो उनके लिए किसानों का भुगतान समय पर करना आसान हो सकता है। यही कारण है कि किसान अब चीनी के बढ़े हुए भाव को केवल बाजार की खबर के रूप में नहीं देख रहे, बल्कि इसे अपने गन्ने के भाव और भुगतान से जोड़कर देख रहे हैं।

मौजूदा आंकड़े किसानों की उम्मीद को मजबूत जरूर करते हैं, लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि चीनी का भाव बढ़ने से स्वतः ही गन्ने का मूल्य उतनी ही तेजी से बढ़ जाएगा। चीनी की कीमत बाजार की मांग और आपूर्ति से प्रभावित होती है, जबकि गन्ने का मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है। दोनों के बीच संबंध जरूर है, लेकिन दोनों की कीमतें एक जैसी प्रक्रिया से तय नहीं होतीं।

फिर भी किसान का सवाल बिल्कुल स्पष्ट है। अगर चीनी का भाव सात साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, मिलों का स्टॉक पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम है और बाजार में चीनी की मांग बनी हुई है, तो गन्ना किसान को इसका हिस्सा क्यों नहीं मिलना चाहिए? किसान ने ही वह गन्ना पैदा किया है जिससे चीनी मिलों को कच्चा माल मिला और बाजार में चीनी तैयार हुई। इसलिए किसानों को उम्मीद है कि सरकार नए सत्र के लिए ऐसा गन्ना मूल्य घोषित करेगी जो बढ़ती लागत और मौजूदा बाजार परिस्थितियों के अनुरूप हो।

चुनाव से पहले सरकार के सामने यह एक महत्वपूर्ण अवसर भी है और चुनौती भी। यदि सरकार किसानों को बेहतर गन्ना मूल्य देती है और भुगतान व्यवस्था को मजबूत करती है तो इससे गन्ना किसानों को सीधा आर्थिक लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि चीनी के बढ़े हुए बाजार भाव का लाभ किसानों तक नहीं पहुंचता और केवल मिलों की आर्थिक स्थिति में सुधार दिखाई देता है, तो किसान इस अंतर पर सवाल जरूर उठाएंगे।

इस समय गन्ना किसान की सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि चीनी के बढ़े हुए दाम का असर उसके खेत तक भी पहुंचे। किसान सिर्फ यह नहीं चाहता कि चीनी बाजार में महंगी बिके; वह चाहता है कि उसकी मेहनत से पैदा हुए गन्ने का मूल्य भी उसकी लागत और मेहनत के हिसाब से तय हो। साथ ही समय पर भुगतान उसकी दूसरी बड़ी जरूरत है।

आने वाले दिनों में सरकार गन्ने का नया मूल्य किस स्तर पर तय करती है, यह लाखों किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा। चीनी की कीमत 4,400 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास पहुंच चुकी है और आगे करीब 5,000 रुपये प्रति क्विंटल तक जाने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में किसानों की निगाहें अब सरकार के अगले फैसले पर हैं।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीनी कितने रुपये किलो बिक रही है। असली सवाल यह है कि उस चीनी के पीछे खड़े किसान को उसके गन्ने का कितना दाम मिल रहा है। जब बाजार में चीनी के भाव में तेजी है, मिलों का स्टॉक घटा है और किसानों की उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है, तब गन्ने के भाव में भी सम्मानजनक बढ़ोतरी होना किसानों की सबसे बड़ी उम्मीद है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।